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आओ तो कभी, देखो तो जरा

Sat, 26 Mar 2016 05:56 PM IST
देव प्रकाश चौधरी/अमर उजाला, दिल्ली।
देव प्रकाश चौधरी/अमर उजाला, दिल्ली। Updated Sat, 26 Mar 2016 05:56 PM IST
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aao to kabhi, dekho to zara

बाप ने कहा,''लाला! रिवायती पठान हो, गाना-बजाना छोड़ दो।'' बेटे ने रात के दो बजे घर ही छोड़ दिया। सड़कों पर मटरगश्ती करते हुए गाते रहे-''सांस लेता हूं तो जख्मों को हवा लगती है, जिंदगी तू ही बता, तू मेरी क्या लगती है?''

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ये उस जमाने की बात है जब पाकिस्तान के बहुत सारे लोग दुबई नौकरी के लिए जाते थे और लौटते तो साथ में टेपरिकॉर्डर जरूर लाते थे। उन्हीं में से किसी एक शख्स ने गाना टेप कर लिया और फिर फैसलाबाद की ‘रहमत ग्रामोफोन कंपनी’ तक पहुंचा दिया।
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आवाज नई थी और एक दर्द था। ग्रामोफोन कंपनी के मालिक रहमत साहब भागे-भागे उस बेघर शख्स तक पहुंचे और फिर कुछ दिनों के बाद ही पान की दुकानों पर और ट्रक ड्राइवरों के बीच धूम मच गई। कहीं 'इधर जिंदगी का जनाजा उठ रहा था...' तो कहीं 'दिल लगाया था िदल्लगी के लिए'। ट्रक ड्राइवरों के साथ यहीं से एक शख्स के सुर का सफर भी शुरू हुआ और आज वह शख्स पूरी दुनिया में  'लाला' और अताउल्लाह खान इसाखेलवी के नाम से मशहूर है।
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बीते दिनों की कहानी सुनाते हुए अताउल्लाह खान इसाखेलवी भावुक हो उठते हैं-''पहला गाना घरवालों से छिपकर हाईस्कूल के अंग्रेजी शिक्षक के सामने गाया था। वह गाना सलीम राज का था-'ऐ दिल किसी की याद में होता है बेकरार क्यों, जिसने भुला दिया तुझे उसका है इंतजार क्यों?' गाना सुनकर अंग्रेजी के शिक्षक ने हौसला बढ़ाया। और फिर मुकेश साहब और रफी साहब को सुनते हुए चोरी-चोरी गाने का रियाज चलता रहा।

घर छोड़ने के बहुत बाद 1972 में पहली बार पाकिस्तान रेडियो पर गाने का मौका मिला और 1973 में पहली बार मियांवली में सार्वजनिक कार्यक्रम में गाया।'बढ़ती लोकप्रियता के बीच एक सवाल भी उठा कि इस गायक के सुर में शास्त्रीयता तो है ही नहीं।

उस समय तो शायद लाला ने किसी को कोई जवाब नहीं दिया था, लेकिन आज बहुत संजीदा होकर वह कहते हैं-'मैंने बलुचिस्तान, पंजाब, सिंध और अफगानिस्तान की लोकगीतों को लेकर काम किया था। वह कितना शास्त्रीय था, मुझे आज भी नहीं पता। सिर्फ इतना पता है कि लोगों ने मेरे गानों को बहुत पसंद किया।'

यह वही दौर था जब अताउल्लाह खान के गाने 'कमीज तेरी काली', 'चिमटा तां वजदा,' पाकिस्तान, हिंदुस्तान, अफगानिस्तान और सउदी अरब के कई इलाकों में धूम मचा रहे थे। इसके बाद तो बाबा फरीद और बुल्ले शाह को गाकर लाला ने अपनी लोकप्रियता को और विस्तार दे दिया।

कैसेट पर कैसेट और सड़कों पर भागते बसों, ट्रकों और कारों में गूंजती आवाजें...'इसका गिला नहीं कि बहुत गम उठाए हैं', बर्बादियां तो नसीब में लिखाकर आए हैं', ‘अच्छा सिला दिया तूने मेरे प्यार का', 'किसी से बोलना और देखना अच्छा नहीं लगता'....और यह लिस्ट बहुत लंबी हो सकती है, क्योंकि लाला दुनिया भर में सबसे ज्यादा एलबम के लिए भी जाने जाते हैं।

लगभग 500 एलबम उनके नाम हैं और सार्वजनिक कार्यक्रमों, टीवी और रेडियो पर गाए गए गानों की संख्या अलग है। लाला कहते हैं- 'सात भाषाओं में मैंने गाने गाए हैं। खुद के लिखे गाने सबसे ज्यादा और फिर सादिक साहब के लिखे गाने। मेरी हमेशा से यही कोशिश रही है कि शायरी इतनी आसान हो कि सबको समझ में आए, भले ही शास्त्रीयता की कसौटी पर उसे कामयाब नहीं माना जाए।

लेकिन मैं अपने हर उस गाने को कामयाब मानता हूं, जो लोगों के दिलों में उतरते हैं।' सच है कि ऐसे गानों की संख्या लाला के पास सबसे ज्यादा है। हिंदुस्तान में भी उन्हें पसंद करने वालों की तादात बहुत बड़ी है और उन्हें खुद हिंदुस्तान बार-बार आने का मन करता है।

लाहौर के बेहद पॉश इलाके 'डीएच' में रहते, शान की जिंदगी जीते, अपने बड़े बेटे सांवल को गायक बनते देखते और अपने कैसेट्स को आने वाली पीढ़ियों के लिए संग्रहित करते अताउल्लाह खान इसाखेलवी के पास आज खुद पर गर्व करने की कई वजहें हैं, लेकिन जिंदगी का संघर्ष अब भी नहीं भूले वह- ‘मुझे तो अपने फैंस पर गर्व है कि उन्होंने एक सड़क के गायक को उठाकर सेलेब्रेटी बना दिया और मेरी आवाज में जो दर्द है, वह अल्लाह की देन है।

इसमें मेरा कहीं कुछ नहीं। हां, एक ईमानदार मेहनत को मैंने हमेशा साथ रखा है।’इसमें कोई शक नहीं कि मंच पर उनके परफार्मेंस को पसंद करने वालों में दुनिया भर में हर उम्र के लोग शामिल हैं। उनकी दर्द भरी आवाज की सफलता का अंदाजा पाकिस्तान में उन पर प्रचलित एक जोक से लगाया जा सकता है कि एक शख्स ने बेटा होने पर अपने ने मित्र से पूछा कि क्या नाम रखें तो मित्र ने बहुत सोच-समझ कर जवाब दिया कि अताउल्लाह खान रख दो क्योंकि बाद में कोई रोने वाला भी तो हो।


सफलता के बाद कई तरह के किस्से भी आते हैं, जैसे एक किस्सा यह भी था कि 'अताउल्लाह खान ने मर्डर किया है और मौत की सजा हुई है।' लेकिन सच तो यह था कि वह अताउल्लाह खान कोई और थे। उस घटना से  'लाला अताउल्लाह खान इसाखेलवी का कोई रिश्ता नहीं था। ऐसे किस्सों पर मुस्कुराते हुए लाला इतना भर कहते हैं-'जिंदगी कभी राजी, तो कभी मुझसे खफा लगती है।'

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