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एक यात्रा और इतनी उम्मीदें

Sun, 25 Jan 2015 08:01 PM IST
पुष्पेश पंत
पुष्पेश पंत Updated Sun, 25 Jan 2015 08:01 PM IST
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A trip and so expectations

जब भी कोई अमेरिकी राष्ट्रपति इस देश का दौरा करता है, तब यह माथापच्ची शुरू हो जाती है कि उभयपक्षीय रिश्तों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा। इस बार अंतर यह है कि छह महीनों के भीतर नरेंद्र मोदी और बराक ओबामा की दूसरी मुलाकात हुई है।

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इस मुलाकात में सबसे ज्यादा अहमियत परमाणविक समझौते को दी गई। पर इतनी ही संवेदशील गुत्थी कट्टरपंथी इस्लामी दहशतगर्दी वाली है। क्या ओबामा के दौरे के बाद पाकिस्तान हाफिज सईद या लखवी को भारत को सौंप देगा? क्या अब दाऊद इब्राहीम की नाक में नकेल कसी जा सकेगी? जो बात भुलाई नहीं जानी चाहिए, वह यह है कि आज का भारत नेहरू युगीन या इंदिरा के राज वाला भारत नहीं। गुटनिरपेक्षता अथवा रूस (सोवियत संघ) के साथ सामरिक घनिष्ठता की वजह से अमेरिका के साथ मनमुटाव की कोई संभावना नहीं। आर्थिक सुधारों के सूत्रपात के बाद से विकास के विकल्प को लेकर भी कोई बड़ा मतभेद बचा नहीं है। आज भारतीय नेता बेहिचक यह कुबूल करते हैं कि अमेरिका हमारा सामरिक साझीदार है। इस घड़ी भारतीयों का आत्मविश्वास बढ़ा-चढ़ा है, क्योंकि उन्हें पता है कि ‘हमारा बाजार’ कितना बड़ा है। अमेरिका हो या कोई अन्य पूंजीवादी देश, वह लाभ-लागत के आकलन के बाद अपने राष्ट्रहित परिभाषित करेगा।
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यहां तत्काल यह जोड़ने की जरूरत है कि दोतरफा रिश्ते में आगे की राह आसान नहीं। भारत-अमेरिकी संबंधों में जितना सुधार हो सकता था, वह लगभग पूरा हो चुका है। मनमोहन सिंह के कार्यकाल में इस दिशा में लंबा सफर तय किया जा चुका है। इससे पहले एनडीए के शासन काल में जसवंत सिंह ने राह के बहुत सारे रोड़े हटाने में कामयाबी हासिल की थी। दो देशों के रिश्ते उनके नेताओं के बीच दोस्ती या मनमुटाव-मतभेद भर से संचालित नहीं होते, आर्थिक-सामरिक हितों का सन्निपात या संयोग ही इन्हें निर्धारित करता है। इसी लिए यह सोचना, कि मोदी-ओबामा की शख्सियत के ‘साम्य’ या करिश्माई आकर्षण के कारण इस बार अप्रत्याशित सफलता अनायास हाथ लगेगी, बचपना है।
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यह सोचना व्यर्थ है कि अमेरिका पाकिस्तान को सहायता देना बंद या कम कर देगा। इसी तरह अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी का यह अर्थ नहीं है कि वहां हमें कोई निर्णायक जिम्मेदारी सौंपने के लिए अमेरिका जमीन तैयार कर रहा है। कुछ वर्ष पहले की तुलना में जो फर्क आया है, वह इतना भर है कि आज पश्चिम एशिया में इराक तथा सीरिया में हालात अफगानिस्तान से अधिक विस्फोटक हैं, इसी वजह से अमेरिका का ध्यान दक्षिण एशिया से जरा हटा है।

शपथ ग्रहण करने के साथ ही नरेंद्र मोदी ने यह एहतियात बरती है कि भारतीय राजनय संतुलित रहे। जापान, नेपाल, भूटान को साथ रखने की कोशिश उन्होंने की है। हथियार हों या नागरिक तकनीक-अमेरिका से इतर विकल्प अब तक भारत ने खुले रखे हैं। परमाणविक ईंधन की आपूर्ति के लिए ऑस्ट्रेलिया की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया जा चुका है। लेकिन क्या इनमें से कोई भी देश अमेरिका को नाराज करने का जोखिम उठा सकता है? शायद इसीलिए मोदी ने ओबामा की मेहमाननवाजी की पहल की। वह उन्हें आश्वस्त करना चाहते हैं कि ये सब अमेरिका के विकल्प नहीं, पूरक हैं।


यहां एक और बात का जिक्र जरूरी है। वर्षों से मंदी की चपेट में घायल अमेरिकी अर्थव्यवस्था फिर गतिशील हो रही है। जबकि तेल की निरंतर घटती कीमतों के कारण रूस की हालत खस्ता है। कई साल बाद चीन की विकास दर अवरुद्ध हो रही है। भारत फिलहाल इन दोनों से बेहतर हालत में है। अपनी खुशहाली के लिए अमेरिका को भारत इस वक्त पस्त पड़े यूरोप की तुलना में आकर्षक लग रहा है। जाहिर है कि बराक ओबामा का यह दौरा महत्वपूर्ण है, पर इससे तत्काल असाधारण लाभ की अपेक्षा बहुत तर्कसंगत नहीं।

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