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एक खेल का बवाल में बदल जाना
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भास्कर साई
आखिरकार तमिलनाडु विधानसभा ने एक विशेष बैठक में सर्वसम्मति से बैलों को वश में करने वाले राज्य के पारंपरिक खेल जल्लीकट्टू पर लगे प्रतिबंध को हटाने का विधेयक पारित कर दिया। लेकिन इससे पहले ही इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी, क्योंकि हफ्ते भर से चल रहा शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन अचानक हिंसक हो उठा, जिससे चेन्नई में हाल के दशकों की सबसे भीषण अराजकता पैदा हो गई। एक समय ऐसा आया, जब सब कुछ सुखद अंत की तरफ बढ़ रहा था, पर अचानक स्थितियां विरोध के चरम पर पहुंच गईं। पुलिस वाले और प्रदर्शनकारी एक-दूसरे को इस हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। लेकिन जो भी हो, दोनों तरफ भारी नुकसान हुआ।
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जल्लीकट्टू एक पारंपरिक तमाशा है, जिसमें बैल को भीड़ के बीच छोड़ दिया जाता है और इस खेल में शामिल बहुत से लोग हथियारों के साथ बैल की कूबड़ पर कब्जा जमाने की कोशिश करते हैं, जबकि बैल भागने की कोशिश करता है। खेल में शामिल लोग जब तक संभव हो सके, बैल को रोकने की कोशिश करते हैं। कुछ मामलों में लोग बैल की सींग पर बांधे गए झंडे हटाने की कोशिश करते हैं। आम तौर पर जल्लीकट्टू चार दिन के पोंगल समारोह का एक हिस्सा है, जो दक्षिणी तमिलनाडु में प्रचलित है। माना जाता है कि इसका प्रचलन तमिल शास्त्रीय काल (400-100 ईसा पूर्व) के दौरान से है। यह प्राचीन आर्यों में भी प्रचलित था। बाद में यह वीरता प्रदर्शन का मंच बन गया और प्रतिभागियों को प्रोत्साहित करने के लिए इनाम भी रखा गया। सिंधु घाटी सभ्यता के एक मुहर पर इसका चित्रण है, जो नई दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में संरक्षित है। मदुरई के निकट एक गुफा पेंटिग खोजी गई है, जिसमें एक व्यक्ति बैल को खींचने की कोशिश करता दिखता है। अनुमानतः यह पेंटिंग 2,500 वर्ष पुरानी है।
पशु प्रेमियों ने इस खेल के दौरान बैल के साथ की जाने वाली क्रूरता पर आपत्ति जताई, हालांकि खेल प्रेमियों ने इन आरोपों को खारिज कर दिया है। उनका कहना है कि बैल की सुरक्षा के लिए पर्याप्त सावधानी रखी जाती है और बैलों को हानि नहीं पहुंचती। वे यह भी कहते हैं इन पशु प्रेमियों के पीछे कुछ निहित विदेशी हित हैं। भारत के पशु कल्याण बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में एक मुकदमा दायर किया कि जल्लीकट्टू पर प्रतिबंध लगाया जाए, क्योंकि इसमें पशुओं के साथ क्रूरता होती है और लोगों की सुरक्षा को भी खतरा है।
वर्ष 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को साल में पांच महीने जल्लीकट्टू की इजाजत दी और जिला कलेक्टरों को निर्देश दिया कि यह सुनिश्चित करें कि इस खेल में हिस्सा लेने वाले पशु का पंजीकरण पशु कल्याण बोर्ड में हो और बोर्ड इस खेल की निगरानी के लिए अपना प्रतिनिधि भेजे। लेकिन वर्ष 2011 में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने एक अधिसूचना जारी कर जल्लीकट्टू पर प्रतिबंध लगा दिया। पर तमिलनाडु के जल्लीकट्टू ऐक्ट के तहत इसका आयोजन जारी रहा। सात मई, 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के कानून को निरस्त कर जल्लीकट्टू पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया। आठ जनवरी, 2016 को केंद्र सरकार ने जल्लीकट्टू के उन आयोजनों को इजाजत दे दी, जिनमें बैल का इस्तेमाल नहीं होता है, जो कि प्रतिबंध के उलट था। हालांकि 14 जनवरी, 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने प्रतिबंध को कायम रखा, जिसके खिलाफ पूरे तमिलनाडु में प्रदर्शन हुए।
इस वर्ष जल्लीकट्टू के लिए राज्य भर में छिटपुट प्रदर्शन शुरू हुए। लेकिन 18 जनवरी को मरीना बीच पर छात्रों के एक छोटे-से दल ने विरोध प्रदर्शन शुरू किया, जो सोशल मीडिया के प्रचार के कारण एक बड़े जन आंदोलन में बदल गया। तमिल गौरव की भावना ने लोगों को आंदोलित करना शुरू कर दिया। इस तरह बंगाल की खाड़ी के निकट एक जनसमुद्र लहराने लगा। प्रदर्शनकारी शांतिपूर्ण थे, वे स्वयं अच्छी तरह से आंदोलन चला रहे थे, ट्रैफिक संभालते थे और बीच को साफ रखते थे। एक पुलिस कांस्टेबल ने कहा कि वे उन लोगों के साथ हैं।
नतीजतन मुख्यमंत्री ओ पन्नीरसेलवम ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भेंट कर प्रतिबंध हटाने की गुहार लगाई। केंद्र सरकार ने तमिलनाडु को पूरा सहयोग देने का वायदा करते हुए राज्य सरकार से कहा कि इस संबंध में वह स्वयं अपना एक अध्यादेश लाए, क्योंकि यह स्थानीय मामला है। चौबीस घंटे के भीतर ही यह अध्यादेश विभिन्न मंत्रालयों, राष्ट्रपति और राज्य के राज्यपाल की ओर से मंजूर हो गया।
और फिर राज्य विधानसभा ने पशुओं के साथ क्रूरता रोकने संबंधी कानून के संशोधन विधेयक को पारित कर दिया। राज्य के सभी दलों ने इसका स्वागत किया। लेकिन इस संशोधन विधेयक के पारित होने से कुछ घंटे पहले ही शहर के विभिन्न हिस्सों में हिंसा भड़क उठी, जब पुलिस ने मरीना बीच को खाली कराने की कोशिश की। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि पुलिस ने लाठी चार्ज किया, आंसू गैस के गोले छोड़े और उनके वाहनों में आग लगाई। जबकि पुलिस का आरोप है कि प्रदर्शनकारियों ने उन पर पत्थरबाजी की, थाने को जलाया, वाहनों को नुकसान पहुंचाया।
चूंकि यह राज्य का एक पारंपरिक खेल है और इससे व्यापक लोगों की भावनाएं जुड़ी हुई हैं, इसलिए कोई भी राजनीतिक दल इस पर प्रतिबंध नहीं चाहता। अब दोनों द्रविड़ पार्टियां एक-दूसरे पर आरोप लगा रही हैं कि उसके कारण ही इस पर प्रतिबंध लगा था। हालांकि दूसरे राजनीतिक दल जल्लीकट्टू पर प्रतिबंध के लिए द्रमुक और अन्नाद्रमुक, दोनों को दोषी ठहरा रहे हैं। राज्य के फिल्म जगत (कोलीवुड) के कुछ लोग जहां पुलिस की बातों का समर्थन करते हैं, वहीं कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं कि जब प्रदर्शनकारी शांतिपूर्वक विधानसभा के कदम की प्रतीक्षा कर रहे थे, तो पुलिस कार्रवाई क्यों की गई। लेकिन पूरा तमिल समुदाय इस हिंसा की घटना से परेशान हैं, हालांकि उन्हें इस बात की खुशी भी है कि जल्लीकट्टू को आयोजित करने की इजाजत मिल गई है।