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अतीत की छाया में दोस्ती का नया दौर

Tue, 02 May 2017 08:01 PM IST
सलमान हैदर
सलमान हैदर Updated Tue, 02 May 2017 08:01 PM IST
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A new round of friendship in the shadow of the past
सलमान हैदर

तुर्की के राष्ट्रपति रीसेप तैयप एर्दोगन की यात्रा ने भारत और तुर्की के बीच घनिष्ठ संबंधों की संभावनाओं को पुनर्जीवित किया है। दोनों देशों के बीच गहरा ऐतिहासिक रिश्ता रहा है और दोनों ने एक दूसरे के विकास में बड़े पैमाने पर योगदान किया है। ये दोनों आत्मीय सांस्कृतिक क्षेत्र हैं, जो अतीत में एक-दूसरे के साथ घुले-मिले रहे हैं। चाहे वह युद्ध की कला हो या शांति का कौशल अथवा धार्मिक-सांस्कृतिक विकास, दोनों ने एक-दूसरे से सीखकर उन्नति और प्रगति की है। यहां तक कि जब बढ़ते उपनिवेशवाद ने प्राचीन रिश्तों को ढक लिया, तब भी भारत और तुर्की ने अपने पारंपरिक रिश्तों का निर्वाह किया। दूसरे देश में अगर कुछ होता था, तो उसका असर दोनों देशों पर दिखता था, जैसा कि खिलाफत आंदोलन के दौरान देखा गया, जब भारत के मुसलमान गांधी जी के नेतृत्व में तुर्की के खलीफा के लिए उठ खड़े हुए थे, जिन्हें ब्रिटिश साम्राज्यवाद से खतरा था। तुर्की ने स्वयं ही मुस्तफा कमाल के नेतृत्व में खलीफा व्यवस्था को खत्म कर एक नई व्यवस्था शुरू की।

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सुधारवादी तुर्की द्वारा अपनाई गई हठधर्मी आधुनिकता ने पारंपरिक समाजों के पूरे समूह पर एक गहरा प्रभाव डाला, जो एक नई दुनिया में आने की कोशिश कर रही थी, जिसमें उनकी प्राचीन परंपराओं के पिछड़ेपन की निंदा होती थी। सुधारकों के सुस्पष्ट और देशभक्त समूह द्वारा सरकार, संस्कृति, धर्म, अर्थव्यवस्था के थोक आधुनिकीकरण ने तुर्की को बदल दिया और दूसरों के लिए उसे प्रकाशस्तंभ बना दिया।
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विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद भारत और तुर्की के रिश्तों में उतनी मजबूती नहीं आई, जितनी मजबूत नींव पहले के रिश्तों में थी। यह अनिवार्य रूप से शीतयुद्ध की दूरी के कारण था। तुर्की अपनी सुरक्षा के लिए काफी हद तक पश्चिम पर निर्भर हो गया और नाटो की रक्षात्मक दीवार बन गया, जबकि भारत ने गुटनिरपेक्षता का स्वतंत्र मार्ग अपनाया। और फिर गड़बड़ी यह हुई कि पाकिस्तान तुर्की के करीब आ गया और पश्चिम के नेतृत्व में गठित नाटो के सदस्य देशों का उसे समर्थन प्राप्त हुआ। नतीजतन तुर्की भारत से दूर होता चला गया। वर्षों तक विभिन्न अवसरों पर रिश्तों को ताजा करने के लिए कई प्रयास किए गए, इतिहास में अंतर्निहित निकटता की विरासत को पुनः खोजने की कोशिश हुई। उदाहरण के लिए, दो दशक पहले तुर्की के प्रधानमंत्री ओजल भारत दौरे पर आए थे, जिसने दिखाया था कि दोतरफा रिश्ते के प्रति दोनों देश कभी उदासीन नहीं रहे और दोनों सहयोग के लिए तैयार थे।
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एर्दोगन की यात्रा उस दिशा में एक नया और महत्वपूर्ण प्रस्थान बिंदु हो सकता है। उन्होंने अपने देश के लिए एक नई विदेश नीति बनाने का विश्वास जताया है, जिसे उनके पूर्ववर्तियों ने परिचित रास्ते से दूर कर दिया था। सीरिया में वह अनिश्चित अमेरिकी नेतृत्व का अनुसरण करने के प्रति संतुष्ट नहीं हैं, बल्कि साहसिक ढंग से स्वयं उससे बाहर निकल आए हैं, खासकर कुर्दों के साथ अपने रवैये के कारण। उन्होंने अपनी सत्ता बनाए रखने का रास्ता साफ करते हुए जिस तरह से संसदीय सरकार के बजाय राष्ट्रपति प्रणाली लागू करने के लिए सांविधानिक संशोधन किया, जिसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना हुई है। उनका निर्णायक और हठी दृष्टिकोण उन्हें एक दुर्जेय नेता के रूप में दर्शाता है, जिसके साथ दुनिया को आगे कई वर्षों तक निभाना होगा, अतातुर्क की तरह का एक प्रभावशाली व्यक्तित्व। कुछ मामलों में वह प्रधानमंत्री मोदी से अलग नहीं हैं और संभवतः दोनों नेता एकसाथ मिलकर दोतरफा रिश्तों को वास्तव में आगे बढ़ा सकते हैं।

एर्दोगन की यात्रा के दौरान कई तरह के समझौते को चिह्नित किया गया है, जो भविष्य की साझा महत्वाकांक्षाओं को दर्शाते हैं। बुनियादी संरचनाओं के क्षेत्र में तुर्की अपने कौशल के लिए प्रसिद्ध है और इस क्षेत्र में वह भारत का साझेदार बन सकता है। व्यापार के क्षेत्र में सुधार की संभावनाएं हैं, जो फिलहाल मामूली है और यह आर्थिक लेन-देन में प्रगति का सामान्य अवसर है।

हालांकि कई आर्थिक समझौतों पर हस्ताक्षर हुए हैं, लेकिन इस यात्रा का मुख्य मकसद राजनीतिक मुद्दे थे, जिनमें से कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जहां भारत और तुर्की का नजरिया एक-दूसरे से अलग है। इनमें एक प्रमुख मुद्दा कश्मीर है। एर्दोगन ने इस मुद्दे पर बहुपक्षीय संवाद का आह्वान किया, जिसे भारत ने अच्छा नहीं माना। इसमें कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि भारत ने लगातार कश्मीर पर दोतरफा संवाद किया है और इस मुद्दे के अंतरराष्ट्रीयकरण से इन्कार किया है।

अंतरराष्ट्रीय महत्व के अन्य मामलों में हालांकि दोनों देशों के बीच कुछ समानताएं देखी जा रही थीं, जिनमें परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में भारत की सदस्यता भी शामिल है, हालांकि तुर्की की नजर में भारत की आकांक्षाओं को पाकिस्तान के साथ जोड़ा गया। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की सदस्यता के लिए एर्दोगन के स्पष्ट समर्थन का भारत में स्वागत किया गया, जैसा कि आतंकवाद के खिलाफ संयुक्त मुकाबले के उनके बयान का स्वागत किया गया।

गौरतलब है कि तुर्की को अपने पड़ोसी से मुकाबला करने में कुछ समस्याएं हैं। इसमें सबसे प्रमुख साइप्रस समस्या है, जिसका कभी समाधान नहीं हुआ। तुर्की के पड़ोस में कुर्द समस्या एक दूसरा अनसुलझा मुद्दा है, जहां प्रतिद्वंद्वी हमेशा विवादों में रहते हैं। अर्मेनिया का नरसंहार भी विवाद का विषय बना हुआ है, जो हुआ तो था एक शताब्दी पहले, पर यह अब भी इस क्षेत्र में भावनात्मक मतभेद का मुद्दा बना हुआ है।


इन सबसे पता चलता है कि भारत के तुर्की के साथ रिश्ते दोस्ताना हैं, पर उसे सावधानीपूर्वक सहेजने की जरूरत है। इतिहास अपनी छायाएं छोड़ता है और दोनों देश से जुड़े क्षेत्रीय मुद्दे जूनुन और जटिलताएं पैदा कर सकते हैं। फिर भी ये दोनों तेजी से बढ़ते हुए देश हैं, जो द्विपक्षीय और क्षेत्रीय मामलों में एक-दूसरे से काफी कुछ हासिल कर सकते हैं। उम्मीद करनी चाहिए कि एर्दोगन की यात्रा से दोनों देशों के बीच परस्पर विश्वास और सहयोग बढ़ेगा।

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