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एक दिन पागलपन का
योगेंद्र शर्मा
Updated Mon, 02 Mar 2015 07:41 PM IST
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मनोवैज्ञानिकों का मत है कि एक स्वस्थ, सामान्य व्यक्ति के मस्तिष्क में चौबीस घंटे में एक बार मूर्खतापूर्ण विचार अवश्य आता है। लेकिन स्वस्थ आदमी अगर उस क्षणिक पागलपन वाले विचार को कार्यरूप में परिणत कर दे, तो सत्यानाश हो जाएगा। हमारे बुजुर्गों ने मूर्खताओं का एक दिन नियत कर दिया है कि लो बेटा, एक दिन, जी भरकर कर लो गधापन।
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गब्बर सिंह ने सांभा से पूछा था, होली कब है? जवाब में सांभा ने लंबा भाषण झाड़ दिया, सरदार, जिस दिन आप खुली आंखों से सपना देखें कि आप देश के प्रधानमंत्री बन गए हैं, कई घोटाले और विपक्ष के दबाव के बावजूद आपने अंतरात्मा की आवाज पर इस्तीफा नहीं दिया है, तो होली है। एक दिन देर से ऑफिस आने पर बॉस की डांट पर, और देर से घर लौटने पर पत्नी की डांट पर शहरी बाबू उल्टा जवाब देने की सोचे, तो समझ जाओ, होली है। जिस दिन अपने राहुल बाबा संसद में कांग्रेस का नेतृत्व करते दिखें, और पार्टी के बड़े नेताओं में छुट्टी का आवेदनपत्र देने की होड़ मचे, समझो, वह होली है।
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अपने शहरी मध्यवर्ग का क्या है! उसकी जिंदगी की कितनी होली बेरंग बीत गई। जिंदगी की जद्दोजहद में वह यह भी भूल गया है कि खुशी का रंग कौन-सा है, विषाद का रंग कौन-सा। अचानक एक दिन आप उसे कहें कि कल होली है, तो वह थोड़ा मुस्कराएगा। सोचिए कि होली के दिन उसकी पत्नी पकवान बनाने में व्यस्त है। वह पीछे से जाकर उसके चेहरे को रंग देता है। यही एक साहस है, जो वह साल में एक बार बगैर पूछे कर सकता है। मुंह धोते हुए उसकी पत्नी मानो धमकी देती है, कित्ता गाढ़ा रंग लगा दिया। जाइए, आपको पकवान नहीं मिलेंगे। पत्नी के चेहरे का रंग साबुन के साथ नाली में बह रहा है और रंग की इस कदर बेकदरी देख वह उदास है। तभी एक नर्म, नाजुक स्पर्श उसे अचानक गुदगुदा देता है।
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हमारे राजनेताओं का गुजारा एक दिन के पागलपन से नहीं होता। इनकी होली साल भर चलती है। फिर इन्हें रंग से ज्यादा कीचड़ पसंद है।