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देखो, ये हैं मेरे पांच रत्न

Tue, 04 Sep 2012 12:00 PM IST
Yashwant Vyas
Yashwant Vyas Updated Tue, 04 Sep 2012 12:00 PM IST
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कन्नौज राज्य की एक विधवा ब्राह्मणी अत्यंत गरीबी के बावजूद अपने पांच पुत्रों को गुरुकुल में अच्छी शिक्षा दिला रही थी। वह स्वयं संस्कृत की विद्वान थी। स्वाभिमानी प्रवृत्ति की होने के कारण प्रतिदिन चरखे पर सूत कातकर मेहनत करके अपना तथा पुत्रों का जीवन यापन करती। कभी किसी के सामने हाथ नहीं फैलाती थी।
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कन्नौज के एक धार्मिक सेठ ने ब्राह्मणी की विद्वता तथा गरीबी में दिन गुजारने की बात सुनी, तो वह उसके पास पहुंचे। उन्होंने विनम्रता से कहा, क्या मैं आपकी आर्थिक सहायता करके खुद को धन्य कर सकता हूं? ब्राह्मणी ने कहा, सेठ जी, मैं दरिद्र बिलकुल नहीं हूं। मेरे पास तो पांच अमूल्य रत्न हैं। आपकी सहानुभूति के प्रति मैं कृतज्ञ हूं। सेठ ने कहा, मुझे अपने अमूल्य रत्न तो दिखाइए। कुछ ही समय बाद उस ब्राह्मणी के पांचों पुत्र गुरु जी के आश्रम से वापस लौटे, तो उन्होंने आते ही अपनी मां के चरण स्पर्श किए। इसके बाद सामने बैठे सेठ जी का विनम्रता के साथ हाथ जोड़कर अभिवादन किया। ब्राह्मणी ने संस्कृत में कहा, पश्य मम पंच रत्नानि।
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और सेठ उन 'पंच-रत्नों' को देखकर कह उठे, माता जी, आपके इन अनूठे मातृभक्त-संस्कारी पंचरत्नों के होते हुए आपको दरिद्र समझना मेरी भारी भूल थी। जिसकी संतान आज्ञाकारी, संस्कारी तथा योग्य है, उससे बड़ा धनवान कोई नहीं है। इतना कहकर सेठ ब्राह्मणी को प्रणाम कर वहां से विदा हो गया।
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