World Day Against Child Labour 2020: त्रासदी के भंवर में फंसा मासूम बचपन
बाल श्रमिकों के रूप में समाज में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने वाले नन्हे मासूम बच्चों का त्रासदीपूर्ण जीवन भारत ही नहीं आज समस्त विश्व की समस्या बन चुका है। हंसने-खेलने और स्कूल जाने की उम्र में भूखे पेट कंधों पर परिवार की जिम्मेदारी का बोझ उठाए, कुपोषण और अन्य अनेक बीमारियों के शिकार ये बच्चे चिंता का विषय है।
बाल श्रम 'मानवाधिकार' का स्पष्ट उल्लंघन है। यह बच्चों के मानसिक शारीरिक तथा बौद्धिक विकास को भी बाधित करता है। ये बाल श्रमिक घरेलू नौकर बनकर, होटलों, कारखानों, सेवा केंद्रों, दुकानों आदि में काम करके अपने मासूम बचपन से कहीं बहुत दूर जा चुके हैं।
बाल श्रम का विरोध करने तथा इसके प्रति जागरूकता का प्रसार करने के उद्देश्य से अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने 2002 से 12 जून को 'विश्व बाल श्रम निषेध दिवस' के रूप में मनाना प्रारंभ किया। संगठन के अनुमान के अनुसार, विश्व में लगभग 21 करोड़ बाल श्रमिक हैं।
एक आंकलन के अनुसार भारत में बालश्रमिकों का अनुमानित आंकड़ा डेढ़ करोड़ के लगभग है। भारत जैसे देश में जहां की संस्कृति में प्राचीन काल से ही बच्चों को भगवान का रूप माना जाता रहा है। बाल श्रमिकों का अस्तित्व नितांत दुखद है।
जहां ध्रुव, प्रहलाद, लव-कुश एवं अभिमन्यु जैसे बाल चरित्र भारतीय संस्कृति का हिस्सा रहे, आज उसी भारत देश में वर्तमान परिस्थितियों में भारतीय परिदृश्य में गरीब और बेसहारा बच्चों की जो छवि दिखाई देती है, वह हृदय विदारक है।
बाल श्रमिकों की समस्याओं को दृष्टिगत रखते हुए 1979 में भारतीय सरकार द्वारा बाल श्रम को रोकने के उद्देश्य से 'गुरुपाद स्वामी समिति' का गठन किया गया। समिति ने अध्ययन के बाद प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में बाल श्रम का प्रमुख कारण गरीबी को स्वीकार किया तथा खतरनाक क्षेत्रों में बाल श्रम को प्रतिबंधित करने तथा उनके कार्य क्षेत्रों में सुधार करने का सुझाव दिया।
साथ ही इन बाल श्रमिकों की समस्याओं के निराकरण के लिए एक बहुआयामी नीति की आवश्यकता पर भी जोर दिया, जिसके फलस्वरूप '1986 में बाल मजदूरी प्रतिबंध विनियमन अधिनियम' अस्तित्व में आया तथा 1987 में बाल श्रम से संबंधित एक विशेष नीति के अंतर्गत जोखिम भरे व्यवसाय एवं कार्यों में लिप्त बच्चों के पुनर्वास पर ध्यान देने की आवश्यकता पर बल दिया गया।
भारत में बाल श्रम के विरुद्ध कार्यवाही में महत्वपूर्ण न्यायिक हस्तक्षेप 1986 में उच्चतम न्यायालय के उस फैसले से आया, जिसमें संघ और राज्य सरकारों को खतरनाक प्रक्रियाओं और पेशों में काम करने वाले बच्चों की पहचान करने, उन्हें काम से हटाने तथा उन्हें गुणवत्ता युक्त शिक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया गया।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सर्वप्रथम 1990 में न्यूयॉर्क में एक विश्व शिखर सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसमें 151 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया तथा गरीबी और भूखमरी के शिकार विश्व भर के करोड़ों बच्चों की समस्याओं पर विचार किया गया।
भारत में ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन संघ, भारतीय मजदूर संघ, सेंटर ऑफ इंडिया ट्रेड यूनियंस, हिंद मजदूर सभा, बाल श्रम उन्मूलन एवं कल्याण कार्यक्रम आदि संगठन बाल श्रम के संबंध में अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।
भारतीय संविधान का 'अनुच्छेद 23' खतरनाक उद्योगों में बच्चों के रोजगार पर प्रतिबंध लगाता है। 1950 का 'अनुच्छेद 24 'स्पष्ट करता है कि 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को कारखाने इत्यादि में ना रखा जाए, जहां उनकी सुरक्षा को खतरा हो।
भारत में बाल श्रमिकों की संख्या सरकारी आंकड़ों के अनुसार तो लगभग 2 करोड़ है, परंतु अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार यह संख्या लगभग 5 करोड़ के आसपास है, जिनमें से लगभग 19% बच्चे घरेलू नौकर के रूप में काम करते हैं।
इसके अतिरिक्त इन बाल श्रमिकों को पटाखे बनाना, कालीन बुनना, वेल्डिंग करना, ताले बनाना, पीतल उद्योग का काम, कांच उद्योग, हीरा उद्योग, माचिस, बीडी बनाना, खेतों में काम करना, कोयले की खानों ,पत्थर की खदानों, सीमेंट उद्योग, होटलों एवं ढाबों में में काम करना तथा इसके साथ ही साथ मालिकों की इच्छानुसार काम ना होने पर आधे पेट भोजन के साथ शारीरिक मानसिक प्रताड़ना सहना उनके जीवन का हिस्सा बन जाता है।
इनमें से अधिकांश तो अनाथ और बेसहारा होते हैं, परंतु जिनके परिवार हैं, वे भी गरीबी के कारण अपने बचपन को श्रम की भट्टी में झोंक कर ये मासूम बच्चे अपने परिवारों का पेट पालते हैं।
मां की ममता व पिता के दुलार से महरूम इन बच्चों के लिए स्कूल, शिक्षा, खेल खिलौने आदि का कोई अर्थ ही नहीं है। वेल्डिंग की चमक से अपनी आंखों की रोशनी खो देना, फैक्ट्री के खतरनाक धुएं को श्वास के साथ शरीर का अंग बना लेना, जहरीली गैसों के संपर्क में रहने के कारण टीवी, कैंसर आदि रोगों का शिकार होना, यौन शोषण के कारण एड्स तथा अन्य यौन रोगों से ग्रस्त होकर श्रापित जीवन जीना इनकी नियति बन जाता है।
इन बाल श्रमिकों की समस्याएं अनंत है। कई बार तो इन्हें तस्करी आदि के कार्य में भी लगा दिया जाता है। नशीले पदार्थों तथा अन्य अवैध वस्तुओं की तस्करी में लिप्त कर इनकी मजबूरियों का लाभ उठाया जाता है। मानवता की हद से गिरकर कई बार इन बच्चों को दूर देशों में जानवरों की तरह बेचा भी जाता है।
बच्चों की यह स्थिति किसी भी शिक्षित और सभ्य समाज के माथे पर एक कलंक है और विश्व बाल श्रम निषेध दिवस का उद्देश्य लोगों को इन बाल श्रमिकों के विषय में सोचने व उनके हित के लिए कार्य करने के लिए प्रेरित करना है।
प्रत्येक राष्ट्र की सरकार का तो इन मासूमों के प्रति दायित्व है ही, साथ ही राष्ट्र के प्रत्येक नागरिक का भी दायित्व है कि वे उनके प्रति मानवतापूर्ण दृष्टिकोण रखें।
यद्यपि बाल श्रमिकों के हित को ध्यान में रखते हुए सरकारों तथा निजी संस्थाओं द्वारा अनेक प्रयास किए गए, परंतु वे पर्याप्त नहीं हैं। उनमें अभी बदलाव तथा विकास की आवश्यकता है। इन बच्चों के त्रासदीपूर्ण जीवन की समस्याएं विकराल हो सकती हैं, निरूपाय नहीं।
आवश्यकता है सरकारों के निष्ठा पूर्ण प्रयासों की, समाज की सक्रिय भागीदारी की तथा प्रत्येक व्यक्ति की निजी जागरूकता की। इन बाल श्रमिकों के उदास बचपन व त्रासदीपूर्ण जीवन की मांग है। इनके हित के लिए उठाए जाने वाले ऐसे ठोस कदमों की जो इन्हें इनका बचपन लौटा सकें तथा एक सामान्य जीवन दे सकें।
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