समाज और मानसिकता: "औरतों के क्लीवेज आमंत्रण देने वाले तो आदमियों की खुली छाती भी जुगुप्सा जगाती है.!"
महिलाओं के कपड़ों पर कमेंट करने वालों को कभी आधे कपड़ों में सड़क पर या सार्वजनिक स्थानों पर शरीर उघाड़े घूमते आदमी नजर नहीं आते?
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पिछले दिनों एक फिल्म आई- 'दसवीं'। हर अन्य फिल्म की ही तरह इस फिल्म के प्रमोशन का भी चक्र चला। फिल्म कैसी रही, उसका प्लॉट क्या था, उसके कलाकार कैसे थे? इन सबसे इतर जिस चीज की सबसे ज्यादा चर्चा गर्म रही, वो था फिल्म की एक हीरोइन के खुले गले की ड्रेस। लोगों को ये बात पसंद नहीं आई कि वो अभिनेत्री ऐसी ड्रेस में किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में कैसे पहुंच सकती थी भला.!
एक भले मानुष ने इस पर सोशल मीडिया पर सवाल कर डाला। सवाल बड़ा ही मासूम सा था। उन्होंने पूछा-
लेडीज, मैं सच मे यह जानने का इच्छुक हूं कि इस तरह क्लीवेज (गहरे गले वाले परिधान से दिखती वक्षों के बीच की रेखा) दिखाने के पीछे आपका प्रयोजन आखिर क्या है? यदि यह पुरुषों को आकर्षित करने के लिए है तो भी क्यों? और यदि नहीं, तो भी क्यों?
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ये पहली बार नहीं था कि किसी अभिनेत्री को सार्वजनिक संपत्ति समझकर उसे स्त्री सुबोधिनी सिखाने का प्रयास किया गया हो। आश्चर्य की बात है कि इस तरह का कमेंट करने वालों को कभी आधे कपड़ों में सड़क पर या सार्वजनिक स्थानों पर शरीर उघाड़े घूमते आदमी नजर नहीं आते?
ओह सॉरी, मैं तो भूल ही गई। हमारे देश में आदमियों को तो इसकी छूट है। शर्म, मर्यादा, इज्जत और संस्कारों की सारी पाठशालाएं सिर्फ औरतों के लिए खुली हैं।
औरतों के तन ढंकने सम्बन्धी शिक्षाएं हर वर्ग के मर्द से मिल सकती हैं। चाहे वो कॉरपोरेट में इंटरनेशनल टेरिटरी हेड हो या कोई कम पढ़ा लिखा। ये उनकी मॉरल रिस्पांसिबिलिटी है भाई! औरतों को क्या पहनना चाहिए इसके लिए घर से लेकर बाहर तक मॉरल पुलिसिंग के कॉनवॉय साथ चलते हैं। हालांकि उक्त सज्जन का द्वारा की गई पोस्ट पर कई लोगों ने गुस्सा दिखाते हुए उन्हें अपनी हद में रहने की ताकीद भी की। लेकिन कई लोग ऐसे भी थे जिन्हें उक्त सज्जन से ऐतबार था।
मां अक्सर एक किस्सा बताया करतीं-
उनकी एक बहन का ब्याह जिस घर मे हुआ वहां सिर पर घूंघट लेना अनिवार्य था। वह बहन पढ़ी-लिखी थीं और एक खुले विचारों वाले परिवार में पली-बढ़ी थीं। लेकिन उन्होंने बिना किसी विरोध शादी, नए परिवार और रिवाजों के साथ घूंघट को भी स्वीकार लिया। मुश्किल तब होती जब गांव के घर के छोटे दरवाजों से निकलना पड़ता और इस कवायद में हर बार सिर फूटता। तो जब तक इसकी आदत पड़ती, सिर में कई जगह ससुराल के दरवाजों के आशीष फूले हुए गुम्मों के रूप में अंकित हो गए।
समस्या और बढ़ गई जब शर्म और झिझक में नई बहू उस तकलीफ को किसी से कह नहीं पाई और उन गुम्मों में पस पड़ने लगा। हालांकि जब परिवार को पता चला तो उन्होंने तुरन्त इलाज भी करवाया और बहू को कहा भी कि उसने पहले तकलीफ क्यों नहीं बताई लेकिन इससे सिर पर घूंघट काढ़ने से मुक्ति नहीं मिली। क्योंकि घूंघट तो भले घर की स्त्रियों की पहचान होता है।
पूरे देश में फिलहाल बुर्के से लेकर जीन्स टॉप तक पहनने वाली लड़कियों को सुधारने का कार्यक्रम तेजी से जारी है। कुछ लोगों का मानना है कि कपड़े पहनने की आजादी लड़कियों को 'बिगाड़' देती है। तो कुछ मानते हैं कि इससे लड़के बिगड़ जाते हैं।
जीन्स, स्कर्ट और फ्रॉक जैसे पाश्चात्य परिधानों को आप आधुनिकता का रूप मानते हैं तो यह जानना जरूरी है कि विदेशों में भी औरतों के कपड़ों को लेकर आदमियों की सोच कोई खास आधुनिक नहीं है। आज से करीब डेढ़ दशक पहले इटली के सुप्रीम कोर्ट ने एक 18 वर्षीय युवती से बलात्कार के आरोपी को इसलिए छोड़ दिया क्योंकि जज साहब का मानना था कि युवती ने टाइट जीन्स पहन रखी थी और जज साहब का यह मानना था कि टाइट जीन्स को बिना किसी की मदद से उतारना चूंकि सम्भव नहीं है, इसलिए जरूर युवती ने इस रेप में अभियुक्त की मदद (!) की होगी। वरना रेप कैसे होता भला।
दुनिया का नजरिया और समाज
इतिहासकारों की मानें तो प्राचीन रोम में अलग महिलाओं के लिए अलग तरह की व्यवस्था की गई थी। सभ्य और ऊंचे घरानों की महिलाएं अलग तरह के कपड़े पहनती थीं ताकि वे पहचानी जा सकें और कोई भी राह चलता उनके साथ गुस्ताखी न कर सके, (यह अधिकार सिर्फ उनके पतियों तक सीमित था)। जिन स्त्रियों के बदन पर इस तरह के वस्त्र नहीं होते थे, वे सार्वजनिक रूप से गुस्ताखियों के लिए उपलब्ध थीं।
वहीं ग्रीस में तो महिलाओं के पहनावे पर नजर रखने के लिए बकायदा एक मजिस्ट्रेट तैनात था, जिसे गायनाकोनॉमी यानी 'कंट्रोलर ऑफ द वीमन' के रूप में पहचाना जाता था। वह तय करता था कि महिलाओं को कब और क्या पहनना चाहिए, उन्हें कपड़ों पर कितना खर्च करना चाहिए और सार्वजनिक रूप से सभ्य दिखने के लिए उन्हें कैसे रहना चाहिए। इन मजिस्ट्रेट्स को बकायदा चुना जाता था।
मतलब आज से सैकड़ों साल पहले दुनियाभर में औरतों के कपड़ों पर नजर रखना और उन्हें सभ्य ! तरीके से कपड़े पहनने की हिदायत देना, भले मर्दों की जिम्मेदारी रहा है और वे आज भी इसे पूरी शिद्दत से निभा रहे हैं। उन्हें मालूम है कि अगर औरतों को उनकी मर्जी के कपड़े पहनने की छूट दी गई तो वे 'हाथ से निकल जाएंगी।'
कपड़े किसी व्यक्ति का बहुत निजी मसला होता है। हाँ, निजी तौर पर मैं भी इस बात से सहमत हूँ कि हर अवसर, स्थिति और समय के अनुकूल कपड़े पहनना शिष्टता के अंतर्गत ही आता है। समुद्र तट पर बिकनी पहने महिलाएं सामान्य बात है। लेकिन किसी ब्याह- शादी या ऐसे ही अन्य अवसर पर बिकनी पहनी किसी महिला को देखकर अजीब नहीं लगेगा?
ठीक जैसे चड्ढी-बनियान या सॉफिस्टिकेटेड शब्दों में आजकल अंडरपेंट्स में सड़क पर तफरीह करते आदमियों को देखकर लगता है। उन आदमियों के लिए वो अंडरपेंट्स यूनिवर्सल परिधान हैं। वे पूरे गर्व से उसे कहीं भी पहनकर निकल सकते हैं।
मैं यहां अजीब शब्द का इस्तेमाल इसलिए ही कर रही हूं क्योंकि ये अशोभनीय और शोभनीय से अलग अजीब सा एहसास होता है। सभ्य समाज मे ड्रेस कोड होना बुरा नहीं है जब तक कि यह दबाव या जबरदस्ती का मामला न बने। स्कूल में यूनीफॉर्म इसलिए होती है ताकि सारे विद्यार्थी बिना किसी भेदभाव, ऊँच-नीच के एक जैसे परिधान पहनकर रह सकें। उनमें अपने कमतर कपड़ों को लेकर हीनभावना न आए।
निमृत कौर उस इंडस्ट्री से हैं जहां ग्लैमर, जिंगदगी का महत्वपूर्ण लेकिन सहज हिस्सा होता है। ऐसे में उनके कपड़ों से अगर उन्हें खुद कोई फर्क नही पड़ता, तो दूसरों के लिए वे चर्चा का विषय होना ही नहीं चाहिए। मामला नजरिए का है। जब तक औरतों के बदन को लेकर समाज का और खुद औरतों का भी नजरिया नहीं बदलेगा, तब तक इस तरह की समझाइशें औरतों के लिए आम रहेंगी। जरूरी है कि इन ट्रोलर्स को निमृत कौर की तरह मुंह तोड़ जवाब देना सीख लिया जाए।
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