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बंगाल की राजनीति: अभिषेक के लिए सैकड़ों कुर्बान को तैयार ममता, लेकिन क्या थमेगा तृणमूल का असंतोष?
सार
मदन मित्रा का भी खेमा बदलना केवल एक नेता की नाराजगी नहीं, बल्कि तृणमूल कांग्रेस में नेतृत्व, उत्तराधिकार और संगठनात्मक संकट के गहराते संकेत भी हैं।
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ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
पश्चिम बंगाल की राजनीति में मदन मित्रा का 'ममता तृणमूल' छोड़कर 'ऋतोब्रत तृणमूल' में शामिल होना महज एक और दल-बदल नहीं है। यह उस राजनीतिक बदलाव का प्रतीक है, जिसकी आहट तृणमूल कांग्रेस के भीतर लंबे समय से सुनाई दे रही थी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह फैसला किसी सामान्य नेता ने नहीं, बल्कि उस व्यक्ति ने लिया है जिसे वर्षों तक ममता बनर्जी की 'परछाईं' माना जाता रहा।
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असंतोष के केंद्र में केवल अभिषेक क्यों?
पश्चिम बंगाल की राजनीति का सबसे बड़ा प्रश्न आज यह नहीं है कि कौन तृणमूल छोड़ रहा है, बल्कि यह है कि लगभग हर असंतुष्ट नेता के निशाने पर केवल एक ही नाम क्यों है- अभिषेक बनर्जी?
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विडंबना यह है कि कल तक जो नेता अभिषेक को पार्टी का भविष्य, नई पीढ़ी का चेहरा और संगठन का सेनापति बताते नहीं थकते थे, वही आज उनके नेतृत्व पर सबसे तीखे सवाल उठा रहे हैं। पूर्व मंत्री मदन मित्रा हों, पार्टी छोड़ चुके अन्य नेता हों, पूर्व या मौजूदा सांसद हों, विधायक हों या संगठन के पुराने पदाधिकारी- लगभग सभी की शिकायतों का केंद्र अभिषेक बनर्जी हैं।
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तृणमूल कांग्रेस के गठन से लेकर उसके संघर्ष और सत्ता तक पहुंचने की यात्रा में मदन मित्रा उन नेताओं में रहे, जिन्होंने ममता बनर्जी के साथ सड़क से लेकर विधानसभा तक राजनीतिक लड़ाई लड़ी। ऐसे नेता का सार्वजनिक रूप से यह कहना कि 'अभिषेक ममता बनर्जी की भी नहीं सुनते' केवल व्यक्तिगत असंतोष नहीं, बल्कि पार्टी की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल है।
क्या संगठन एक व्यक्ति तक सिमट गया है?
मदन मित्रा का आरोप है कि पार्टी में निर्णय लेने की पूरी प्रक्रिया एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द सिमट गई है। संगठन की राय, वरिष्ठ नेताओं का अनुभव और कार्यकर्ताओं की भावनाएं अब निर्णयों में जगह नहीं पातीं। उनका दावा है कि इसी कार्यशैली ने कभी 213 सीटें जीतने वाली तृणमूल कांग्रेस को राजनीतिक संकट में पहुंचा दिया।
इन आरोपों को केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया कहकर खारिज करना आसान नहीं है। ममता तृणमूल के वरिष्ठ सांसद कल्याण बनर्जी भी समय-समय पर अभिषेक की कार्यशैली पर सार्वजनिक सवाल उठा चुके हैं। अलग-अलग नेताओं के बयानों में एक समानता स्पष्ट दिखाई देती है- निर्णयों का अत्यधिक केंद्रीकरण, वरिष्ठ नेताओं की उपेक्षा और संगठन में संवाद की कमी।
ममता ने क्यों संभाला मोर्चा?
इसी पृष्ठभूमि में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पहली बार फेसबुक लाइव के जरिए अभिषेक बनर्जी के बचाव में खुलकर सामने आईं। उन्होंने कहा कि अभिषेक को हर समस्या का खलनायक बना देना अब एक बहाना बन गया है।
केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई का उल्लेख करते हुए ममता ने कहा कि जब अभिषेक की पत्नी डेढ़ साल के बच्चे को लेकर सीबीआई कार्यालय पहुंची थीं और अभिषेक लगातार पूछताछ का सामना कर रहे थे, तब उनके विरोधियों को उनकी पीड़ा दिखाई नहीं दी। उनका तर्क था कि यदि अभिषेक समझौते का रास्ता चुनते, तो उन्हें बहुत पहले राहत मिल सकती थी, लेकिन उन्होंने संघर्ष का रास्ता चुना।
ममता ने यह भी दावा किया कि अभिषेक के खिलाफ लगभग 50 मामले दर्ज किए गए और उन्होंने हर लड़ाई राजनीतिक तथा कानूनी स्तर पर लड़ी। इसलिए उनकी भूमिका का मूल्यांकन भी उसी संदर्भ में किया जाना चाहिए।
क्या अभिषेक के बचाव से हल होगा संकट?
ममता का यह बयान केवल भतीजे के समर्थन तक सीमित नहीं था। इसके जरिए उन्होंने अपनी राजनीति का भी बचाव किया। उनका कहना था कि यदि वह स्वयं भी 'सेटिंग' कर लेतीं, तो तृणमूल के नेताओं और कार्यकर्ताओं को इतनी कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ता। यह बयान केंद्र और राज्य के बीच लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक टकराव की उनकी स्थापित राजनीतिक कथा को भी आगे बढ़ाता है।
लेकिन राजनीतिक प्रश्न अब भी वहीं खड़ा है। यदि पार्टी के मौजूदा और पूर्व सांसदों, विधायकों तथा वरिष्ठ नेताओं का एक बड़ा वर्ग लगातार संगठनात्मक संकट के लिए अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली पर सवाल उठा रहा है, तो क्या केवल यह कह देना पर्याप्त है कि उन्हें 'खलनायक' बनाया जा रहा है?
संगठन का भविष्य दांव पर
किसी भी राजनीतिक दल में जब असंतोष की लगभग हर धारा एक ही नेतृत्व की ओर संकेत करने लगे, तो उसे केवल विरोधियों की साजिश या व्यक्तिगत नाराजगी मानकर टालना पर्याप्त नहीं होता। नेतृत्व का सबसे बड़ा दायित्व केवल आरोपों का प्रतिवाद करना नहीं, बल्कि संगठन के भीतर उठ रहे सवालों का राजनीतिक समाधान भी तलाशना होता है।
ममता बनर्जी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अभिषेक बनर्जी पर होने वाले हर राजनीतिक हमले का जवाब वह स्वयं देंगी। उनका संदेश साफ है-अभिषेक पर हमला, उनके नेतृत्व को चुनौती देने जैसा है। लेकिन राजनीति केवल नेतृत्व के बचाव से नहीं चलती, संगठन के भीतर भरोसा बनाए रखने से भी चलती है।
अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या ममता बनर्जी इस असंतोष को केवल व्यक्तिगत नाराजगी मानकर नजरअंदाज करेंगी, या इसे तृणमूल कांग्रेस के भीतर बढ़ती बेचैनी का संकेत समझेंगी। क्योंकि जब किसी राजनीतिक दल में संस्थापक नेता की सबसे पुरानी परछाइयां भी साथ छोड़ने लगें, तब संकट केवल व्यक्तियों का नहीं, बल्कि पूरे संगठन की दिशा और भविष्य का होता है।
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