फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   violence in web series and its effect on society

वेबसीरीज-तीसरा पर्दाः जहां यथार्थ मनोरंजन है, सेक्स और हिंसा प्रॉडक्ट

Sat, 28 Sep 2019 06:05 PM IST
Sarang Upadhyay सारंग उपाध्याय
Updated Sat, 28 Sep 2019 06:05 PM IST
विज्ञापन
violence in web series and its effect on society
वेबसीरीज हमारे पास हमारा ही अंधेरा उस रौशनी के साथ परोस रही हैं। - फोटो : अमर उजाला

फिल्में कैमरे की आंख का सौंदर्य है। फिल्मी दुनिया अपने सौंदर्यबोध में जितनी खूबसूरत है उतनी ही विद्रूप भी। एक ओर कैमरे में दर्ज कहानियां सपनों का संसार बुनती हैं तो वहीं अपने समय की विद्रूपताओं और विभत्सताओं से अंधेरे की दुनिया भी। हमारी फिल्मों में सौंदर्य और यथार्थ दोनों ने अपनी तरह की रचनात्मकता के साथ हमारे बीच जगह बनाई है। 

विज्ञापन


छोटे पर्दे ने जहां रिश्तों में भावनात्मक संबंध प्रगाढ़ और सामाजिक बंधन के सुख हरे-भरे किए हैं तो वहीं भावनात्मक हिंसा के अलग रूपों को हमारे घरों की स्त्रियों, बच्चों, बूढ़ों के दिलों में करीने से सजाया भी है। बड़े पर्दे ने हमें स्वनिल संसार की सतरंगी धूप दिखाई है, तो वहीं आसपास के सामाजिक जीवन के संघर्ष, शोषण और अंधेरे को अपनी सीमाओं के साथ हम तक पहुंचाया भी है। 
विज्ञापन


बहरहाल, बीते दो सालों के अंदर छोटे और बड़े पर्दे के बीच एक नये तीसरे पर्दे यानी वेबसीरीज ने भी प्रवेश लिया है जहां कैमरे की तीसरी आंख अपने भीतर वह सबकुछ समेट रही है जो हमारे घर, समाज और अंतरंग दुनिया में अब तक कई पाबंदियों के साथ पहुंचता था। वेबसीरीज का तीसरा पर्दा छोटा है लेकिन उसका विस्तार और पहुंच हर व्यक्ति, बच्चे, बूढ़े, औरतों के हाथों में है। 
विज्ञापन
विज्ञापन


हर पांबदी से दूर, सेंसर से परे और बेहिसाब बेरोक-टोक के वेबसीरीज हमारे पास हमारा ही अंधेरा उस रौशनी के साथ परोस रही है जिसे देखकर हम कभी उसके बदलाव के प्रति चिंतित हुआ करते थे। खून-खराबे की घटनाएं, बलात्कार, शोषण, गालियों और हिंसा के दृश्यों से अटी पड़ी ये वेबसीरीज सिनेमा का नया स्वरूप है। जहां रचनात्मक उड़ान के लिए कोई पाबंदी नहीं है और दृश्यांकन के लिए कोई सेंसर नहीं  है।

वेबसीरीज की नई दुनिया ने हमारे समाज के यथार्थ को मनोरंजन बना दिया है। दमन, शोषण, बेचैनी, डर, भय, कुंठाओं, मानवीय त्रासदियों, विद्रुपताओं, जीवन के विभत्स के हिस्से को कंटेंट और प्रोडक्ट में बदल दिया गया है।

यथार्थ यहां मनोरंजन हैं और शोषण कंटेंट। इन दोनों का मिश्रण जितना मसालेदार होगा उतना ही बिकेगा और लोकप्रिय होगा। 

Trending Videos

violence in web series and its effect on society
फिल्मी दुनिया अपने सौंदर्यबोध में जितनी खूबसूरत हैं उतनी ही विद्रुप भी। - फोटो : सोशल मीडिया

दरअसल, जैसा की पहले कहा, फिल्मी दुनिया अपने सौंदर्यबोध में जितनी खूबसूरत हैं उतनी ही विद्रुप भी। फिल्मी दृश्यों में कैद सामाजिक सच के स्याह दर्शन अक्सर दर्शकों की आंख की किरकिरी बने हैं। हर दौर की रचनात्मकता के भीतर का समय अपनी विद्रुपताओं के साथ दिखाई दिया है। ये विद्रुपताएं यथार्थ का दृश्यांकन अपने मानकों करती रही हैं। कई बार ये विभत्स हुआ है तो कई बार इतना जघन्य और हिंसक भी कि इसे स्वीकार करना और विश्वास करना भी आसान नहीं रहा। 

फिल्मी और साहित्यिक दोनों ही दुनिया में विद्रुपताएं शब्द और दृश्य के खांचे में बंटी रहीं हैं। एक कल्पना के भीतर प्रभावित करती है तो वहीं दूसरी दृश्यों के बीच। सृजनात्मक संसार और रचनाधर्म की प्रक्रिया के अंतर्गत् साहित्य ने अक्सर अपनी पड़तालों में अपने समय की विकृतियों को चिंता, सद्भावना और मानवीय संवेदनाओं के प्रति सहानुभूति के साथ दर्ज किया है। 

अपने समय के यथार्थ और उसके विभत्स स्वरूप को बताते हुए साहित्य ने समाज को दिशा देने के साथ-साथ शोषण और दमकारी प्रवृत्तियों को हटाने के  लिए राजनीतिक हस्तक्षेप, आंदोलन और विद्रोह को पर्याय माना है और उसे जगह दी है।

साहित्य के सामानांतर फिल्में और सिनेमा सामाजिक बदलावा का माध्यम तो बना है, लेकिन सेंसर की मर्यादा के साथ। उसने अपने समाज और समय के सवालों को उसके हल, संशोधनों और अपेक्षित आग्रहों के साथ प्रस्तुत किया है। फिल्में सीमाओं में रही हैं और समाज के बीच हद में भी।

फिल्मों की तुलना में  तीसरे पर्दे  यानी की वेबसीरीज में सबकुछ कंटेंट है और प्रॉडक्ट का हिस्सा। जैसा की पहले कहा- यथार्थ यहां बदलाव के आग्रह के साथ नहीं आया है बल्कि व्यूअरशिप और मनोरंजन के साथ मौजूद है।

वेबसीरीज देखकर युवाओं का एक बड़ा वर्ग हतप्रभ है, उत्तेजित है, एक नशे के साथ है। अपने ही अंधेरे को देखकर खुश हो रहा है, शोषण, संघर्ष और दमन की घटनाओं में ग्लैमर को जी रहा है, संवेदनाएं विद्रोह, उत्तेजना और हिंसा पैदा कर रही हैं। वेबसीरीज के दर्शकवर्ग के पास अपने ही समाज के उस अंधेरे को हटाने की चिंता नहीं है बल्कि उसके दृश्यांकन से खुश और आत्मकेंद्रित हुआ जा रहा है। निष्क्रिय चिंतन में घुल रहा है। जहां केवल सन्नाटा है, हलचलविहीन समय। 

violence in web series and its effect on society
हिंसा, गालियों और सेक्स में डूबे दृश्यों के बीच बह रही एक कहानी से चाश्नी सा चस्का। - फोटो : सोशल मीडिया

दरअसल, वेबसीरीज में गालियों से भरपूर, हिंसा से लबरेज और बेहद विभत्स तरीके से दर्शाए सेक्स के दृश्यों ने उसे सॉफ्ट पॉर्न के बीच घटती कथाओं से मनोरंजित किया है।

हाथ में मोबाइल, हिंसा, गालियों और सेक्स में डूबे दृश्यों के बीच बह रही एक कहानी से चाश्नी सा चस्का। एक बार में रात काली कर सुबह तक तीन से चार घंटों में कैद 6 से 7 एपिसोड चट कर जाने की सनक। यह कंटेंट हमारे ही परिवेश से उठाकर तड़के और मसाले के साथ बेचने की कला का तरीका है जो एक समय तक तो आर्कषित कर चुका है लेकिन अब विद्रुपताओं, हिंसा, पॉर्न कंटेंट के कारण सवालों के घेरे में है। 

देखा जाए तो एक समय के सच और समाज की काली और अंधेरी गलियों के यथार्थ को बताने के लिए वेबसीरीज ने प्रश्न खड़े करते हुए अपनी रचनात्मकता और सृजन धर्म को ही कटघरे में खड़ा कर लिया है।

हाथ दर हाथ  थमे मोबाइल में हिंसा, बलात्कार, सेक्स, खून, हत्या, शोषण के तमाम दृश्य जिन विभत्सताओं के साथ सामने आए हैं वह अपने समानांतर एक अलग तरह की समस्या पैदा कर रहे हैं। समस्या भी सामाजिक विकृति के रूप में  सामने आई है जहां युवावर्ग काम-धंधा छोड़कर, घंटों एक लत का शिकार हो रहा है।

वेबसीरीज के जरिये हर घर और हाथ में रचनात्मकता के नाम पर मसालेदार मनोरंजन करता बेलगाम यथार्थ पहुंच रहा है। ना बोले हुए पर कोई पाबंदी है ना दिखाए गए पर विवेक की छाया।  बच्चे, बूढ़े, युवतियां वह सबकुछ देख रही है जिन्हें देखने के लिए सर्टिफिकट चाहिए, सेंसर चाहिए या फिर की कोई पाबंदी। 

सोशल मीडिया ने मोबाइल को लत बनाया है, वेबसीरीज नशा बनाकर छोड़ेगी। 

सिनेमा की नई दुनिया और कैमरे की तीसरी आंख, वेबसीरीज में आपका स्वागत है। 
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed