Monsoon Session: क्या सिर्फ़ राजनीतिक मुद्दा भर है शब्दों को असंसदीय घोषित करना? जानिए अन्य देशों में कैसे हैं इसके नियम
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
संसद के मॉनसून सत्र की शुरुआत हो चुकी है, लेकिन इस बार सत्र शुरू होने से पहले ही हंगामा भी शुरू हो गया है। हंगामे की वजह, लोकसभा सचिवालय की वह नई सूची है जिसमें हिंदी और अंग्रेज़ी के ऐसे शब्द और वाक्यांश शामिल हैं जिनका सदन में इस्तेमाल असंसदीय माना जाएगा। इसका मतलब है कि इन शब्दों का इस्तेमाल संसद में किया गया, तो उसे सदन के रिकॉर्ड से हटा दिया जाएगा।
विपक्षी पार्टी के नेताओं ने तरह-तरह के आरोप लगाए हैं और उनका कहना है कि सूची में वे सारे शब्द हैं जिनका इस्तेमाल सदन में सरकार को घेरने के लिए लिए किया जाता है। विपक्ष ने इस बात को लेकर भी नाराजगी जताई है कि उन्हें इस प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बनाया गया और उनसे किसी भी तरह की कोई राय नहीं ली गई।
लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला ने कहा है कि यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही है और इसमें सरकार की कोई भूमिका नहीं है। हमेशा से संसदीय शब्दों की एक किताब का विमोचन होता रहा है, हमने सिर्फ कागजों की बर्बादी से बचने के लिए इसे इंटरनेट पर डाल दिया है।
विज्ञापन विज्ञापन
क्या है शब्दों या वाक्यांशों को असंसदीय घोषित करने की परंपरा
गौरतलब है कि भारतीय संसद के कई नियम ब्रिटिश संसद से लिए गए हैं, जहां शब्दों और वाक्यांशों को कार्यवाही से निकालने की परंपरा 1604 से ही चली आ रही है। बतौर रिपोर्टस, 1604 में पहली बार किसी बात के लिए सदन में इस तरह की कार्रवाई को जर्नल में दर्ज किया गया था। हालांकि, ब्रिटिश इतिहासकारों का यह भी मानना है कि इससे पहले भी ऐसी कार्रवाई हुई होगी।
अगर आजाद भारत के संदर्भ की बात करें, तो यह सिलसिला साल 1954 से ही चला आ रहा है। लोकसभा सचिवालय ने 1999 में एक बुकलेट निकाली थी जिसमें वाक्यांशों और शब्दों की ऐसी सूची दी गई थी। इस सूची में इस तरह के शब्दों की संख्या हजारों में थी। बाद में, वर्ष 2004 में इसका संस्करण आया जो करीब 900 पेजों का था।
सचिवालय वर्ष 1954 से 2009 तक इस तरह का बुकलेट प्रकाशित करता रहा है। ऐसे शब्दों की पूरी डिक्शनरी है जो अब करीब ग्यारह सौ पन्नों की है। समय-समय पर, इस सूची में शब्द और वाक्यांश जोड़े जाते रहे हैं। हर साल इसकी समीक्षा की जाती है।
यह भी बता दें कि 1956 से गोडसे शब्द असंसदीय शब्दों की सूची में शामिल था, लेकिन साल 2015 में शिवसेना सांसद हेमंत तुकाराम गोडसे के विरोध के बाद इसे असंसदीय शब्दों की सूची से हटा दिया गया और नाथूराम गोडसे के पूरे नाम को प्रतिबंधित किया गया।
2019 शीतकालीन सत्र के दौरान, पप्पू, बहनोई (जीजाजी), दामाद जैसे शब्दों को असंसदीय बताते हुए इन पर रोक लगाई गई थी। यहां तक कि 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण से कांग्रेस नेता बीके हरिप्रसाद पर तंज कसते हुए की गई टिप्पणियों में से कुछ शब्द हटा दिए गए थे।
किन शब्दों और वाक्यांशों को किया गया शामिल
जिन शब्दों और वाक्यांशों को इस सूची में रखा गया है उनमें शकुनि, तानाशाह, तानाशाही, तड़ीपार, तलवे चाटना, जयचंद, विनाश पुरुष, ख़ालिस्तानी, गुंडों की सरकार, ख़ून से खेती, जुमलाजीवी, बाल बुद्धि, बहरी सरकार, लॉलीपॉप, चांडाल चौकड़ी आदि शामिल हैं।
अंग्रेज़ी शब्दों की फ़ेहरिस्त में अब्यूज़्ड, ब्रिट्रेड, करप्ट, ड्रामा, हिपोक्रेसी और इनकॉम्पिटेंट, कोविड स्प्रेडर और स्नूपगेट शामिल हैं।
वहीं, वाक्याशों में उल्टा चोर कोतवाल को डांटे और चोर-चोर मौसेरे भाई जैसे वाक्यांशों को इस सूची में शामिल किया गया है।सू ची में राजस्थान, पंजाब और छत्तीसगढ़ विधानसभा की कार्यवाही से हटाए गए शब्दों और वाक्यों को भी शामिल किया गया है।
गौरतलब है कि इन राज्यों में गैर-बीजेपी दलों की सरकार है। इन शब्दों में अंट-शंट, अनपढ़, अनर्गल जैसे शब्द शामिल है। इसके अलावा अध्यक्ष पर किए जाने वाले कई तरह की टिप्पणियों को भी इस सूची में रखा गया है, जैसे- आप मेरा समय खराब कर रहे हैं, आप हम लोगों का गला घोंट दीजिए, चेयर को कमज़ोर कर दिया गया है, आप किसके आगे बीन बजा रहे हैं?
इन शब्दों का इस्तेमाल करने पर क्या होगा?
अगर सदन का कोई सदस्य इस तरह के प्रतिबंधित शब्दों का इस्तेमाल करता है और लोकसभा के स्पीकर को लगता है कि किसी सांसद द्वारा इस्तेमाल किए शब्द अपमानजनक, अंससदीय और अशोभनीय है, तो लोकसभा में कामकाज की प्रक्रिया एवं आचार के नियम 380 के तहत, उनके पास इसे सदन की कार्यवाही से हटाने का आदेश देने का अधिकार है। इसका मतलब है कि इन शब्दों को लिखित रिकॉर्ड में नहीं रखा जाएगा।
नियम 381 के अनुसार, सदन की कार्यवाही का जो हिस्सा हटाना होता है, उसे चिन्हित करने के बाद कार्यवाही में एक नोट इस तरह से डाला जाएगा कि अध्यक्ष के आदेश के मुताबिक इसे हटाया गया।
संवैधानिक प्रावधानों की वजह से इन शब्दों के इस्तेमाल के बाद भी किसी सांसद के खिलाफ अदालत जाने का कोई विकल्प नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 105(2) में साफ-साफ लिखा है-
किसी भी सांसद के खिलाफ संसद में बोले गए शब्द या उनके द्वारा दिए गए मत के खिलाफ अदालत का दरवाजा नहीं खटखटाया जा सकता। हालांकि, असंसदीय शब्दों की सूची ही वह माध्यम है जिससे इस बात का एहसास दिलाया जाता है कि सांसदों के पास सदन में भी अभिव्यक्ति की आजादी की असीमित स्वतंत्रता नहीं है।
दूसरे देशों में भी हैं ऐसे नियम
ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ भारत में ही इस तरह की पाबंदी है। ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स में भी असंसदीय भाषा पर इस तरह की पाबंदी है। किसी सदस्य के झूठ बोलने के साथ-साथ "घिनौना" और "कायर" जैसे शब्दों को वहां असंसदीय माना जाता है। वहीं, ऑस्ट्रेलियाई सीनेट ने 1997 में, 'झूठे' और 'डंबो' जैसी कई शब्दों को असंसदीय घोषित कर दिया था। हालांकि, बेल्जियम में, असंसदीय भाषा जैसी कोई चीज नहीं है।
एक सांसद को संसद के अंदर कुछ भी कहने की अनुमति है, लेकिन यह विशेषाधिकार उन्हें सदन के बाहर मौजूद नहीं है। अगर सदन से बाहर बोले गए किसी शब्द के खिलाफ सदन में बहुमत मिल जाए, तो अभियोजन संभव हो सकता है। इसके अलावा, न्यूजीलैंड में कम्युनिस्टों के लिए इस्तेमाल होने वाले शब्द 'कोमो' को असंसदीय माना जाता है जबकि कनाडा की सूची इन सबसे भी बड़ी है।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
संविधान विशेषज्ञों ने इस पूरे विवाद को बेवजह माना है। उनका मानना है कि असंसदीय शब्दों की जिस नई सूची पर विवाद पैदा हुआ है वह न ही बाध्यकारी है और न ही सलाह। गौरतलब है कि लोकसभा सचिवालय दुनिया भर के देशों के विधानमंडलों और देश की विधानसभाओं में घोषित किए गए असंसदीय शब्दों को मिलाकर एक बुकलेट जारी करता है और हर साल इसकी समीक्षा होती है।
इसमें कई ऐसे शब्द होते हैं, जो राज्यों की विधानसभाओं, दूसरे देशों के विधानमंडलों में असंसदीय शब्दों की सूची में पहले से शामिल हैं। सदन में की गई टिप्पणियों के संदर्भ में अंतिम फैसला पीठासीन अधिकारी का होता है।
आपको बता दें कि सदन के अंदर किसी भी शब्द के बोलने पर पाबंदी नहीं है और शब्द के संदर्भ के आधार पर ही किसी शब्द को असंसदीय घोषित किया जाता है। इसलिए, इस पूरे विवाद को सिर्फ़ एक राजनीतिक मुद्दा भर ही माना जा सकता है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।