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स्थलीय वन्यजीवों पर प्लास्टिक प्रदूषण के खतरे

Dr. Geetanjali Katalam डॉ. गीतांजलि कतलम
Updated Mon, 17 Jun 2024 01:16 PM IST
सार

हाल के अध्ययनों से यह अनुमान लगाया गया है कि लगभग 80% प्लास्टिक का मलबा वाटरशेड और नदियों या अन्य जलमार्गों के माध्यम से अपने भूमि-आधारित स्रोतों जैसे कि कचरा डंप, लैंडफिल और तटीय क्षेत्रों में कूड़े से समुद्र में प्रवेश करता है। हर साल अनुमानित 4 से 12 मिलियन मीट्रिक टन प्लास्टिक कूड़ा स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र से जमा होता है।

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Threats of plastic pollution to terrestrial wildlife
एक रिपोर्ट के अनुसार  80% से भी अधिक समुद्री जीव प्लास्टिक के संपर्क में आ चुके है। - फोटो : डॉ. गीतांजलि कतलम

विस्तार

प्लास्टिक प्रदूषण को दुनिया भर में पर्यावरण में महत्वपूर्ण परिवर्तन लाने वाले मुख्य कारकों में से एक माना जाता है। सिंगल-यूज प्लास्टिक के व्यापक और अनियंत्रित उपयोग, कचरे के कुप्रबंधन और रीसाइक्लिंग की कमी के परिणामस्वरूप समुद्र और स्थल में प्लास्टिक के कणों का अनियमित फैलाव हुआ है। प्लास्टिक प्रदूषण इतना व्यापक है कि इसे अब एक महत्वपूर्ण भूवैज्ञानिक स्तरीकृत घटना  एंथ्रोपोसीन काल को दर्शाने वाला भी माना जाता है। 

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वर्तमान में, दुनिया भर में प्रति दिन लगभग 3 मिलियन टन कचरा उत्पन्न होता है, जो 2025 तक दोगुना होकर 6 मिलियन टन प्रति दिन और सदी के अंत तक 11 मिलियन टन प्रति दिन तक पहुंचने का अनुमान है। भारत में प्रतिदिन 25,000 टन से अधिक प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होता है, और बढ़ते शहरीकरण और उपभोग दर के साथ इसमें वृद्धि होने का अनुमान है।
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हाल के अध्ययनों से यह अनुमान लगाया गया है कि लगभग 80% प्लास्टिक का मलबा वाटरशेड और नदियों या अन्य जलमार्गों के माध्यम से अपने भूमि-आधारित स्रोतों जैसे कि कचरा डंप, लैंडफिल और तटीय क्षेत्रों में कूड़े से समुद्र में प्रवेश करता है। हर साल अनुमानित 4 से 12 मिलियन मीट्रिक टन प्लास्टिक कूड़ा स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र से जमा होता है। ऐसा माना गया है की 5.35 ट्रिलियन से अधिक प्लास्टिक कण समुद्र की सतहों पर तैर रहे हैं।
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2025 तक यह मात्रा 250 मिलियन मीट्रिक टन बढ़ने की संभावना है। प्लास्टिक के कण पर्यावरण में पूर्ण रूप से विघटित नही हो पाते है तथा ये सर्वयापी होते है। इसके परिणामस्वरुप पर्यावरण में प्लास्टिक मुख्यता तीन आकार जैसे मैक्रोप्लास्टिक, जिसकी माप 5 माइक्रोमीटर से अधिक है, माइक्रोप्लास्टिक जो 5 माइक्रोमीटर से छोटे प्लास्टिक कण होते है और बहुत ही शुष्म कण, नैनोप्लास्टिक जो १ माइक्रोमीटर से छोटे प्लास्टिक कण होते हैं। 

एक रिपोर्ट के अनुसार  80% से भी अधिक समुद्री जीव प्लास्टिक के संपर्क में आ चुके है, जिसमे लगभग 914 समुद्री प्रजातिया आकि गयी है। वर्ल्ड इकनोमिक फोरम के मुताबिक 2012 तक  59 % समुद्री पक्षी प्लास्टिक निगल गई  है, और अनुमान है की 2050 तक लगभग 99 % तक पहुंच जायेगा । जिव जंतु के प्लास्टिक में फंसने और निगलने जैसी बढ़ती घटनाओ के कारन उनमे प्लास्टिक के दुष्प्रभाव के प्रमाण मिले हैं ।

प्लास्टिक के रिंग या नायलॉन के जाल में फसने से कई समुद्री जीवों की दम घुटने से  मृत्यु हो जाती है। समुद्री कछुए प्लास्टिक की थैली को जेलिफ़िश समझ कर खा लेते हैं। पालतू जानवरों में जैसे गाय, बकरी में भी प्लास्टिक अंतड़ियों में फसने से भूख लगना बंद हो जाती है और वह कुपोषण का शिकार हो जाते हैं। प्लास्टिक को गलने में हजारो साल लग जाते है ऐसे में जंगली जानवरो के अंदरूनी अंगों में इसके रसायन के रिसने से उनके प्रजनन, पाचन पर दुष्प्रभाव पड़ सकता है और मृत्यु भी हो सकती है । हालाँकि समुद्री जनजीवों पर इस विषय में काफ़ी अध्यन हुआ है पर स्थलीय जंगली जानवरो पर प्लास्टिक के प्रभाव के बारे में हमारी जानकारी अभी भी सीमित है । 

प्लास्टिक प्रदूषण के स्थलीय जंगली जानवरों पर होने वाले संभावित दुष्प्रभावो पर शोद कार्य में पाया गया है की कई जंगली जानवर जैसे पाम सिवेट, स्याही, कस्तूरा  (ब्लूव्हिसलिंग थ्रश ) और अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीऍन) की लाल सूची में आने वाले प्रजाती जैसे चितराला (येलो-थ्रोटेड मार्टेन) और सांबर, मनुष्यों द्वारा आमतौर पर प्लास्टिक की थैली में फेके गये गिले कचरे के साथ मिले प्लास्टिक के टुकड़ो को भी अनजाने में खा जाते है।

पक्षियों और  बन्दरों के मुकाबले, (जो चुन चुन कर के प्लास्टिक को गीले कचरे से अलग करते हैं) सीधे मुंह से खाना खाने वाले जानवर जैसे सांबर और हाथी में कूड़े के ढेर से प्लास्टिक खाने की सम्भावना अधिक है (प्रकाशित-करंट साइंस, कतलम et. al. 2018)।  एक और हैरान करने वाला तथ्य यह पाया गया की जंगली हाथियों के गोबर में प्लास्टिक और अन्य न गलने वाले अपशिष्ट जैसे धातु की वायर, कांच के बल्ब, कांच के टुकड़े, चिप्स के पैकेट्स इत्यादि शामिल हैं।

हाथी जंगलों के किनारे के कूड़े के ढेरों पर प्लास्टिक और अन्य अपशिष्ट को अनजाने में खा लेते हैं और इनके साथ  इनके गोबर के माध्यम से प्लास्टिक जंगलों के दूरदराज़ इलाकों में अनजाने ही फैलता चला जाता हैं (प्रकाशित - जर्नल फॉर नेचर कंज़र्वेशन, कतलम et. al. 2022)। जिससे प्लास्टिक प्रदूषण से वन पारिस्थिकी का संतुलन भी बिगाड़ सकता है। यह दक्षिण एशिया में इस विषय पर किया गया पहला व्यवस्थित वैज्ञानिक शोध है।

21वीं सदी में, स्थलीय पारिस्थितिकी वैज्ञानिक को प्लास्टिक के संकट से पर्यावरण और उसपर निर्भर रहने वाले जंगली जानवर और मनुष्यों पर होने वाले दुष्प्रभाव को विस्तार से समझना और उचित अपशिष्ट प्रबंधन हेतु कार्यवाही करनी होगी। जंगली हाथी, सांबर (संकटग्रस्त प्रजाती), गीदड़, बंदर, पक्षी पर्यावरण में फल, फूलों के बीजों का स्थानांतरण का काम करते है और जंगल का संतुलन बनाये रखते है।

खासतौर से भारत में वनों और प्राकृतिक क्षेत्रों के आसपास गीले और सूखे कचरे के प्रबंधन की सख़्त आवश्यकता है। प्लास्टिक युक्त कचरे का उचित प्रबंधन पर्यावरण की शुद्धता बनाये रखने और वन्यजीवों के संरक्षण में एक कारगर कदम हो सकता है। विश्व स्तर पर यूनाइटेड नेशन सरकारों के साथ सिंगल यूज़ प्लास्टिक के उपयोग को खत्म करने के लिए प्लास्टिक संधि पर बातचीत कर रही है। इस संकट को ख़तम करने के लिए सभी देशो को चाहिए की वे पर्यावरण कि सुरक्षा के लिए प्लास्टिक संधि पर अमल करे।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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