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श्रीलंका में धमाके समूचे एशिया के लिए चेतावनी हैं
Sun, 21 Apr 2019 11:52 PM IST
संदीप भट्ट
राजेश बादल
राजेश बादल
Published by: संदीप भट्ट
Updated Sun, 21 Apr 2019 11:52 PM IST
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धमाकों से दहला श्रीलंका
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रविवार को भारत के इस पड़ोसी खूबसूरत सिंहल द्वीप में रविवार को ईस्टर पर्व पर धमाके इस उपमहाद्वीप के लिए शुभ संकेत नहीं हैं। श्रीलंका सरकार की तत्परता सराहनीय है। उसे समय रहते इसकी ख़ुफ़िया जानकारी मिल गई थी। उसने कार्रवाई शुरू भी कर दी थी।
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लेकिन हमलावर तेज़ निकले। जब तक श्रीलंका की सुरक्षा एजेंसियाँ उन्हें घेरे में लेतीं ,वे सात धमाके कर चुके थे। वास्तव में आठवाँ धमाका तो तब हुआ ,जब सुरक्षा बल उन्हें पकड़ने ही वाले थे। वास्तव में यह धमाका तो अपनी रक्षा के लिए किया गया था।
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श्रीलंका के आधा दर्ज़न क़ाबिल पुलिस अफसर इसमें शहीद हुए हैं। लेकिन इसके तुरंत बाद धरपकड़ में सात हमलावर अथवा उनके मददगार गिरफ्तार कर लिए गए हैं। उनसे मिली सूचना के हवाले से श्रीलंका सरकार ने साफ़ कर दिया है कि हमले की साज़िश श्रीलंका से बाहर रची गई थी।
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सवाल अनेक हैं। क्या यह ख़तरनाक़ हमला बीते दिनों न्यूज़ीलैंड में मस्जिदों में संहार का उत्तर है ? या फिर एक साल से श्रीलंका में चल रही साम्प्रदायिक हिंसा का ही विस्तार है ? साल भर पहले भी श्रीलंका में सिंहलियों और बौद्ध ठिकानों पर मुस्लिम चरमपंथियों के हमलों के कारण आपातकाल लगाना पड़ा था।इससे पहले एक बौद्ध सिंहली के मारे जाने के बाद हिंसा भड़क उठी थी और क़रीब पंद्रह दिन तक देश आपातकाल की गिरफ़्त में रहा था।
इसके बाद मुस्लिमों पर भी हमले हुए और स्थिति बिगड़ गई थी।मगर चर्चों पर हमले ने जाँच एजेंसियों को एक नया कोण दे दिया है।श्रीलंका में बौद्ध और ईसाई धर्मों के मानने वालों पर फिलहाल किसी आक्रमण की आशंका नहीं थी। इससे पहले 26 साल तक सिंहलियों और तमिलों के बीच भी संघर्ष चला था। दस बरस पहले लिट्टे के सफाए के बाद इन दोनों समुदायों के बीच टकराव की आशंका भी ख़त्म हो गई थी।
फ़िलहाल समंदर पार से मिल रही ख़बरें श्रीलंका की जाँच एजेंसियों की चिंता बढ़ाने वाली हैं। जानकारों के मुताबिक़ यह दक्षिण एशिया में यह किसी बड़े हिंसक अभियान की शुरुआत है। इस्लामिक देशों ने न्यूज़ीलैंड में मस्जिदों पर हमलों को कटटरपंथी ईसाईयों के किसी गुट का हाथ देखा था।
हमलावर से पूछताछ में पता चला था कि उसने चीन के रास्ते पाकिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर का भी इस्तेमाल किया था। वहां हथियारों की डिज़ाइन में फेरबदल कराया गया था। अब जबावी कार्रवाई के तौर पर यूरोप के छोटे देशों में सक्रिय आतंकवादी समूहों का सहारा लिया जा सकता है।
श्रीलंका की मुश्किल यह है कि उसके सबसे बड़े बंदरगाह हंबनटोटा पर चीन का नियंत्रण है। इस बंदरगाह पर गोपनीय परिवहन और ख़ुफ़िया गतिविधियों पर निगरानी के लिए श्रीलंका के पास कोई मशीनरी नहीं है। इसके अलावा वह चीन से लिए क़र्ज़ के कारण शतों से बंधा हुआ है।
चीन अपने दूरगामी मिशन के लिए लंका में अस्थिरता फैलाकर ईसाई विश्व की प्रतिक्रिया देख सकता है। इन दिनों उसके यूरोप और पश्चिमी देशों के साथ उसके रिश्ते तनावपूर्ण चल रहे हैं। इस संदेह को बल इसलिए भी मिलता है कि इन धमाकों की ज़िम्मेदारी अभी तक किसी मुस्लिम आतंकवादी समूह ने नहीं ली है ,जैसा कि वे अब तक करते आए हैं। ज़ाहिर है श्रीलंका में हमले का कोई नया मक़सद हो सकता है।
अंतर्राष्ट्रीय ईसाई बिरादरी की प्रतिक्रिया का भी हमलावर अब इंतज़ार करेंगे। बहरहाल श्रीलंका में रविवार को हुए हमले भारत के लिए एक गंभीर संकेत है। उसे हिंदमहासागर में चौकसी बढ़ानी होगी और खुफिया तंत्र को और चौकस करना होगा। क्योंकि जांच एजेंसियों को शक है कि इस तरह के हमले अभी और होंगे।