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रीसायक्लिंगः भारत को आपूर्ति श्रृंखला में आत्मनिर्भर बनाने के लिए सामरिक समाधान

Wed, 30 Jul 2025 08:31 PM IST
The Bonus द बोनस
Updated Wed, 30 Jul 2025 08:31 PM IST
सार

विश्वस्तरीय आपूर्ति श्रृंखला को भू-राजनैतिक तनाव एवं कारोबार में उथल-पुथल के चलते मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है, ऐसे में हमें अपने देश में ही बैटरी रीसायक्लिंग के लिए मजबूत इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित करना होगा।

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Recycling: A strategic solution to make India self-reliant in the supply chain
रजत वर्मा, संस्थापक एवं सीईओ, लोहम - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भारत तेजी से इलेक्ट्रिक वाहनों एवं स्वच्छ उर्जा को अपना रहा है, जिसके चलते लिथियम-आयन बैटरियों की मांग में काफी बढ़ोतरी हुई है। हालांकि इस बीच एक बड़ा मुद्दा उभरा हैः बैटरी उत्पादन के लिए आयात की गई महत्वपूर्ण सामग्री पर देश की बढ़ती निर्भरता। विश्वस्तरीय आपूर्ति श्रृंखला को भू-राजनैतिक तनाव एवं कारोबार में उथल-पुथल के चलते मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है, ऐसे में हमें अपने देश में ही बैटरी रीसायक्लिंग के लिए मजबूत इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित करना होगा। इस समाधान से न सिर्फ भारत की आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षित होगी बल्कि तेज़ी से विकसित होते विश्वस्तरीय उद्योग में आत्मनिर्भरता भी बढ़ेगी। 

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विश्वस्तरीय आपूर्ति श्रृंखला की बाधाएं
कारोबार में तनाव एवं निर्यात पर नियन्त्रण के चलते दुनिया भर में बैटरी मटीरियल का मार्केट प्रभावित हुआ है। मौजूदा भू-राजनैतिक परिस्थितियां जैसे चीन का ईवी टैरिफ एवं निर्यात पर प्रतिबंधों के कारण वभिन्न देश अपनी आपूर्ति श्रृंखला का पुनःमूल्यांकन कर रहे हैं। वर्तमान में इस बाज़ार पर चीन का प्रभुत्व है, जो महत्वपूर्ण बैटरी सामग्री के 78 फीसदी हिस्से का नियन्त्रण करता है। चीन पर इतनी अधिक निर्भरता दुनिया भर में इलेक्ट्रिक वाहनों के उत्पादन, उर्जा संग्रहण प्रणाली एवं आधुनिक निर्माण पर गंभीर प्रभाव उत्पन्न कर सकती है। 
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इन जोखिमों को कम करने के लिए भारत जैसे देशों को स्थानीय समाधान विकसित करने होंगे ताकि कच्चे माल के लिए आयात पर निर्भरता कम की जा सके। ऐसा करके भारत अपने बैटरी उद्योग को बाहरी झटकों एवं कीमतों के उतार-चढ़ाव से सुरक्षित रख सकता है। यह बेहद ज़रूरी है क्योंकि आने वाले समय में ईवी बैटरियों एवं नवीकरणीय उर्जा के विकास के कारण लिथियम, कोबाल्ट एवं निकल की मांग बढ़ने का अनुमान है। 
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भारत में स्थानीय रीसायक्लिंग की आवश्यकता
भारत ने स्वच्छ उर्जा भविष्य के लिए महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किए हैं, 2030 तक 100 मिलियन इलेक्ट्रिक वाहन बेचने की योजना है। इतने महत्वाकांक्षी लक्ष्यों के बावजूद देश को बैटरी निर्माण के लिए लिथियम, कोबाल्ट और निकल का आयात भारी मात्रा में करना पड़ता है। इसी के मद्देनज़र बैटरी अपशिष्ट प्रबन्धन नियमों में एक्सटेंडेड प्रोड्युसर रिस्पॉन्सिबिलिटी (ईपीआर) को शामिल कर भारत ने स्थायित्व की दिशा में उल्लेखनीय कदम बढ़ाया है। राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन में रीसायक्लिंग एवं सैकण्डरी सोर्सेज़ (द्वितियक स्रोतों) को शामिल करने से इस दृष्टिकोण को और अधिक गति मिली है। स्थानीय स्तर पर रीसायक्लिंग का पैमाना बढाकर तथा इनोवेशन एवं आधुनिक मैनुफैक्चरिंग के द्वारा महत्वपूर्ण खनिजों की घरेलू मांग बढ़ाकर देश विकसित भारत के निर्माण की दिशा में तेज़ी से अग्रसर हो सकता है। 

रीसायक्लिंग है सामरिक समाधान
अपने देश में ही रीसायक्लिंग सिस्टम बनाने से भारत को कई फायदे होंगे। स्थानीय स्तर पर बैटरी-ग्रेड मटीरियल उपलब्ध होने से भारत दुनिया भर के मार्केट में होने वाले उतार-चढ़ाव एवं कारोबार की बाधाओं से सुरक्षित रहेगा। इससे भारत के ईवी सेक्टर के विकास के लिए महत्वपूर्ण सामग्री की सुरक्षित एवं सतत आपूर्ति को सुनिश्चित किया जा सकेगा।
स्थानीय स्तर पर रीसायक्लिंग के द्वारा आपूर्ति श्रृंखला को अनुकूलित करने से आयात पर निर्भरता कम होगी। इससे देश को आर्थिक मजबूती मिलेगी। उदाहरण के लिए महत्वपूर्ण खनिजों के लिए आयात पर निर्भरता कम करके, भारत अपने कारोबार घाटे को कम कर सकता है और मुद्रा स्थिरता को सशक्त बना सकता है। इसके अलावा रीसायक्लिंग सिस्टम को मजबूत बनाने से, अन्य संबंधित क्षेत्रांं जैसे लॉजिस्टिक्स, मैनुफैक्चरिंग, अनुसंधान एवं विकास को भी गति मिलेगी।

इसके अलावा विश्वस्तरीय निवेशक भी निवेश के स्थायी एवं प्रत्यास्थ अवसरों की ओर आकर्षित होते हैं, ऐसे में रीसायक्लिंग उद्योग को मजबूत बनाने से देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश बढ़ेगा। भारत सर्कुलर इकोनोमी एवं स्थायित्व के विश्वस्तरीय रूझानों को अपनाकर हरित निवेश को आकर्षित कर सकता है।

घरेलू क्षमता का बढ़ाना
एक अनुमान के अनुसार दुनिया भर में लिथियम-आयन बैटरी रीसायक्लिंग का मार्केट 21 फीसदी सीएजीआर की दर से बढ़कर 2030 तक 24 बिलियन डॉलर के आंकड़े तक पहुंच जाएगा। भारत स्थानीय रीसायक्लिंग को बढ़ावा देकर इसमें बड़ी हिस्सेदारी हासिल कर सकता है। इस अवसर का लाभ उठाने के लिए नीति-निर्माताओं, इनोवेटर्स, शोध संस्थानों एवं उद्योग जगत के लीडरों को एक साथ मिलकर काम करना होगा। 

निम्नलिखत को मुख्य कार्यों में शामिल किया जाएः

विनियामक ढांचे को मजबूत बनानाः भारत सरकार को मौजूदा विनियमों जैसे बैटरी अपशिष्ट प्रबन्धन नियम, को मजबूत बनाना होगा। बड़े पैमाने पर अनौपचारिक रीसायक्लिंग सेक्टर को औपचारिक बनाने की आवश्यकता है। अधिक विनियमित प्रणाली न सिर्फ रिकवरी रेट में सुधार लाएगी बल्कि दीर्घकालिक निवेश को भी आकर्षित करेगी। 

रीसायक्लिंग को प्रमुख उद्योग का दर्जा देनाः रीसायक्लिंग को अन्य उद्योगों जैसे मैनुफैक्चरिंग, या उर्जा के समकक्ष माना जाना चाहिए। ऐसा करने से भारत अपने घरेलु सर्कुलर इकोनोमी को तेज़ी से औपचारिक, मानकीकृत बना सकेंगे और इसका पैमाना बढ़ा सकेगा। 

सार्वजनिक-निजी भागीदारी को बढ़ानाः इस सिस्टम का पैमाना बढ़ाने और इनोवेशन को बढ़ावा देने के लिए सरकारी एजेंसियों, निजी उद्यमों एवं शोध संस्थानों के बीच साझेदारी ज़रूरी है। 

टेक्नोलॉजी के अडॉप्शन को बढ़ानाः आर एण्ड डी को समर्थन देना और इसे आर्थिक प्रोत्साहन देना ज़रूरी है। रीसायक्लिंग की आधुनिक तकनीकों में निवेश कर भारत मटीरियल रिकवरी रेट को बढ़ा सकता है और संचालन की लागत को कम कर सकता है।

इन्फ्रास्ट्रक्चर का विस्तार- आधुनिक रीसायक्लिंग सुविधाओं में निवेश ज़रूरी है। क्षेत्रीय रीसायक्लिंग हब, लॉजिस्टिक्स संबंधी मुश्किलों को हल कर सकते हैं और सुनिश्चित कर सकते हैं कि खत्म होने वाले बैटरियों को ठीक तरह से प्रोसेस किया जाए, जिससे आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावी बनाने में मदद मिलेगी। इस तरह के प्रयास देश के अपने रीसायक्लिंग सिस्टम में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं और भारत के स्थायी बैटरी प्रबन्धन में ग्लोबल लीडर के रूप में स्थापित कर सकते हैं। 

रजत वर्मा, संस्थापक एवं सीईओ, लोहम

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण):
यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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