इसलिए दिया उर्जित पटेल ने इस्तीफा? सरकार के ये फैसले थे बड़ा कारण?
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रिज़र्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल का इस्तीफ़ा चौंकाता है। लेकिन इसके कारण किसी रहस्य के परदे में नहीं हैं। निजी कारणों का हवाला वे दे सकते हैं मगर यह तो किसी भी जानकार के लिए पहेली है कि उन्होंने अपने इस्तीफे के लिए ठीक वही समय क्यों चुना, जब मंगलवार से संसद का शीतकालीन सत्र शुरू हो रहा है और इसी दिन पांच विधानसभाओं के चुनाव परिणाम आ रहे हैं।
ग़ौरतलब है कि एक पखवाड़े पहले ही उर्जित पटेल संसदीय समिति के सामने संसद में उपस्थित हुए थे और क़रीब दो दर्ज़न महत्वपूर्ण बिंदुओं पर अपना लिखित उत्तर सौंपा था। 31 सदस्यों वाली इस समिति के अध्यक्ष वीरप्पा मोइली हैं और पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह भी इस समिति के सदस्य हैं। मनमोहन सिंह पहले खुद भी रिज़र्व बैंक के गवर्नर रहे हैं।
मीटिंग में क्या कहा था उर्जित पटेल ने
आमतौर पर संसद की किसी भी समिति की इस तरह की कार्रवाई का कोई अधिकृत ब्यौरा नहीं दिया जाता। यह पूरी तरह गोपनीय होती है, लेकिन जानकारों का मानना है कि उन्होंने नोटबंदी और उसके बाद देश के आर्थिक हालात के बारे में अपनी राय रखी थी। इनमें से अनेक सवालों के उत्तर में वे ख़ामोश भी रहे थे। मंगलवार से प्रारंभ हो रहे संक्षिप्त किन्तु बेहद महत्वपूर्ण संसद सत्र में यक़ीनन देश की कारोबारी सेहत पर चर्चा होगी।
इससे पहले रिज़र्व बैंक के गवर्नर के रूप में आर्थिक नीतियों पर अपनी बेबाक राय रख चुके हैं। उस समय सरकार को उनकी सलाह नागवार गुज़री थी। यहां तक कि रिज़र्व बैंक की स्वायत्तता और उसके संवैधानिक अधिकारों पर भी देश के औद्योगिक जगत में बहस छिड़ गई थी।
सरकार ने भी उर्जित पटेल को कार्यकाल पूरा करने पर सहमति जताई थी। हालांकि नवंबर में ही बोर्ड ने 9 घंटे चली अपनी मैराथन बैठक में सरकार की कुछ नीतियों पर सहयोग की मंशा ज़ाहिर की थी। बैंक ने कहा था कि 25 करोड़ से कम के क़र्ज़ पर उदार रवैया अपनाने पर विचार करेगा। यद्यपि बैंक के 3.6 लाख करोड़ के फंड को विकास कार्यों के लिए कम करने पर बैंक का रुख सरकार को नापसंद आने वाला था।
आखिर क्या कारण रहे इस्तीफे के
ज़ाहिर है कि उर्जित पटेल अवगत थे कि कल से शीतकालीन सत्र प्रारंभ हो रहा है और उनका त्यागपत्र हर हाल में सदन में भूचाल लाएगा। तो अर्थ यह भी निकाला जा सकता है कि उर्जित ने इस्तीफ़े के लिए जान बूझकर आज का दिन तय किया था। इससे राष्ट्रीय महत्त्व के इस विषय पर देश की सर्वोच्च पंचायत में बहस हो। अगर बहस होती तो शायद सरकार की किरकिरी अधिक होती।
इस संसदीय समिति की रिपोर्ट सदन के पटल पर रखी जाती तो रिज़र्व बैंक और सरकार के बीच मतभेदों का दस्तावेज़ीकरण हो जाता। यह स्थिति कठिन होती। कोई भी निर्वाचित सरकार इसे शायद ही पसंद करती। सत्र के बाद वे पद छोड़ने का एलान करते तो एक दो दिन सुर्ख़ियों में रहने के बाद यह इस्तीफ़ा चुनावी शोर में गुम हो जाता। शायद यह ख़ुद पटेल भी नहीं चाहते थे।
एक कारण यह भी बताया जा रहा है कि आने वाले लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र सरकार कुछ लोक लुभावन फ़ैसले लेना चाहती थी। इसमें वह 1934 के रिजर्व बैंक एक्ट की धारा 7 का इस्तेमाल करना चाहती थी। बैंक इसके लिए संभवतः तैयार नहीं था। उसकी नज़र में यह सीधा-सीधा बैंक का राजनीतिक उपयोग हो सकता था। एक कुशल पेशेवर होने के नाते उर्जित पटेल के लिए इसे स्वीकार करना सही नहीं माना जाता। अपने कामकाज के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान वाले इस भारतीय संस्थान के लिए आने वाले दिन भी अत्यंत चेतावनी भरे हो सकते हैं।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.