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इंस्टेंट माफी: मैं समय नहीं हूं लेकिन इस समय में हूं "समय", हे..! रणवीरों "तुम सोचते ज्यादा महसूस कम करते हो

Wed, 12 Feb 2025 05:28 PM IST
Sarang Upadhyay सारंग उपाध्याय
Updated Wed, 12 Feb 2025 05:28 PM IST
सार

यकीन जानिए भीतर से तुम उतने ही खोखले, बेशर्म, निर्लज्ज, दुर्बुद्धि, संवेदनहीन, निष्ठुर और धनपशु हो जो महंगे चारागाहों से निकलकर डिजिटल मीडिया में इंटरनेट सनसनी बने हुए हो। रिश्ते तुम्हारी रेंज से बाहर रहे हैं और बाजार तुम्हें भावनाओं के धंधे का व्यापारी बना चुका है। धर्म, जाति, नस्ल और रंग तुम्हारा मनोरंजन है और स्त्री देह लाइक, शेयर और कमेंट्स में बिकने वाला उत्पाद। 

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Ranveer Allahbadia controversy raina show know how insensitive generation Z and our society
रणवीर इलाहबादिया की माफी में अफसोस है? संवदेनशीलता छलतकी है? - फोटो : Ranveer Allahbadia controversy

विस्तार

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"We think too much and feel too little. More than machinery, we need humanity.
 Charlie Chaplin- 


अंग्रेजी में ऊपर लिखे उद्धरण को कॉमेडी के पितामह चार्ली चैप्लीन ने ग्रेड डिक्टेटर फिल्म के फाइनल स्पीच में कहा है।

हिंदी तुर्जमा देखिए- 

हम सोचते ज्यादा और महसूस कम करते हैं; हमें मशीनों से ज्यादा इंसानियत की ज़रूरत है।"

दशकों पहले एक समय में कहे गए इस सूत्र वाक्य की ध्वनि इस समय में ज्यादा गुंजायमान हो रही है और इस बात में कोई शक नहीं कि यह आगे भी सदा गूंजती रहेगी। वाक्य ही ऐसा है और उसका अर्थ भी अपने समय से आगे।

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दरअसल, सोचना गर सहानुभूति में प्रवेश कराता है तो महसूस करने से संवदेना का संसार खुलता है। परपीड़ा की अनुभूति तो तभी होगी जब भीतर पहुंचेगी और अंदर तो तभी आएगी जब महसूस करने के लिए सोचने से पार हुआ जाए.
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लेकिन पहले सोचा तो जाए?

सुनो..!
प्रिय भंतों

  • टैगोर ने कहा है- “पढ़ो कम सोचो ज्यादा”
  • चार्ली कहते हैं- सोच बहुत लिया थोड़ा महसूस कर लो, मशीन नहीं इंसानियत चाहिए.  
  • और बर्टेंड रसेल तो यहां तक कह गए हैं- "अधिकतर लोग सोचने के बजाय मरना ज़्यादा पसंद करेंगे; और वास्तव में वे ऐसा ही करते हैं.

    तो-

सोचने, महसूस करने की प्रक्रिया से हजारों फीट दूर खड़ी पीढ़ी के नुमांइदों जिस खा-पीकर अघाई और अलसाई एलिट क्लास की दुनिया से तुम्हारा वास्ता है वहां तुमसे सहानभूति, वेदना और संवदेना की बातें उतनी ही बेमानी है जितनी चालाकी और बेशर्मी से मांगी गई वो माफी जिसे डैमेज कंट्रोल के नाम पर तुमने इंस्टंट मैगी बनाकर वीडियो में चिपका दिया। नैतिकता तुम्हारे माथे पर चिपकी वह मौरेलिटी है जो तुम्हारे कपड़ों में दिखती है और वीडियो बनकर वायरल हो जाती है।

इस लज्जाहीन समय के मूर्खों-

जाके पांव न फटे बिवाई,
वो क्या जाने पीर पराई"

यकीन जानिए भीतर से तुम उतने ही खोखले, बेशर्म, निर्लज्ज, दुर्बुद्धि, संवेदनहीन, निष्ठुर और धनपशु हो जो महंगे चारागाहों से निकलकर डिजिटल मीडिया में इंटरनेट सनसनी बने हुए हो। रातों-रात वायरल हो जाने का वायरल तुम्हें अपने गुप्तांगों से निकालकर दूसरों के घर-परिवारों के बेडरूम में ले जा चुका है। रिश्ते तुम्हारी रेंज से बाहर रहे हैं और बाजार तुम्हें भावनाओं के धंधे का व्यापारी बना चुका है। धर्म, जाति, नस्ल और रंग तुम्हारा मनोरंजन है और स्त्री देह लाइक, शेयर और कमेंट्स में बिकने वाला उत्पाद। 

अरे एलिट क्लास के छिछोरों जिस स्त्री को देह की फ्रेम से बाहर निकालने में और घर की चौखट से बाहर स्कूल पहुंचाने में पीढ़ियां खप गईं हों, जिस देश में आज भी यह आधी आबादी हाशिए पर अभाव और संघर्षों के बीच अपनी अस्मिता, गरिमा और निजता की लड़ाई लड़ रही हो वहां ऐसे शो प्रोग्रेसिव और फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन का टाइटल नहीं बल्कि तुम्हारे हद दर्जे की स्टूपिडिटी की बानगी है। 



अरे जाहिलों- 
बंधुओं लाफ्टर का बड़ा लफड़ा है प्यारों 

अभिव्यक्ति की ऐसी स्वतंत्रता तो वेस्ट में भी नहीं मिलेगी जितनी तुम यहां गले में लटकाए घूम रहे हो और गर मिल भी रही होगी ना तो वहां नैतिकता के तकाजे इतने खोखले नहीं हुए हैं जितने यहां धक रहे हैं। 

हाय..!
तुम्हारी इंस्टेंट प्यार भरी माफी पर कौन फिदा ना हो जाए-  
और 
इस "समय" की मासूम चुप्पी पर कौन कुर्बान ना जाए -


डार्क, ब्लैक, ब्लू में बंटी कॉमेडी में भी कभी ऐसी फूहड़ता नहीं थी और फूहड़ता थी भी तो अनैतिकता नहीं थी और अनैतिकता भी रही होगी तो अपराध तो नहीं था। सेंस और सेंटीमेंट्स ही गायब तो ह्यूमर क्या हुआ? खिल्ली उड़ाने को गर ह्यूमर समझा तो फिर कॉमेडी क्या हुई और गर जीवन का ही पता नहीं चला तो कॉमेडी क्या खाक हुई?

प्रिय 
समय के रणवीरों-


तुम्हें तो गलत ही समझ नहीं आया क्योंकि सही का पता ही नहीं था-

केदारनाथ सिंह कहते हैं ना-

हमारे समय में सही का पता
सिर्फ़ ग़लत से चलता है–
सिर्फ़ चीखने पर मालूम होता है-
कि ध्रुपद में आज भी कितनी जान है
..!

 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 

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