पंडित शिवकुमार शर्मा स्मृति शेष: ‘शिव’ की शरण में चला गया संतूर का जादूगर
भारतीय शास्त्रीय संगीत के आकाश से आज एक ऐसा दुर्लभ नक्षत्र ओझल हो गया जिसकी चमक और गमक ने बीते छह दशकों में न जाने कितनी महफिलों को रौनक बख्शी। बतौर संगीतकार भी शिव जी ने अपने अनन्य सखा पं. हरिप्रसाद चौरसिया के साथ शिव-हरि के नाम से संगीकार जोड़ी भी बनाई और कुछ बेजोड़ नग़मे संगीतरसिकों के लिए रचे। इसमें सिलसिला उनकी कालजयी फिल्म कही जा सकेगी। इसमें कोई शक नहीं कि फिल्म संगीत का रंग और ढंग जिस तरह से बदला उसमें शिव-हरि जैसे मेलोड़ी के साधकों के लिए जगह नहीं बन सकती थी सो उन्होंने हमेशा शास्त्रीय संगीत के मंचों को ही अपनी प्राथमिकता में शामिल रखा।
भारतीय शास्त्रीय संगीत के आकाश से आज एक ऐसा दुर्लभ नक्षत्र ओझल हो गया जिसकी चमक और गमक ने बीते छह दशकों में न जाने कितनी महफिलों को रौनक बख्शी। बतौर संगीतकार भी शिव जी ने अपने अनन्य सखा पं. हरिप्रसाद चौरसिया के साथ शिव-हरि के नाम से संगीकार जोड़ी भी बनाई और कुछ बेजोड़ नग़मे संगीतरसिकों के लिए रचे। इसमें सिलसिला उनकी कालजयी फिल्म कही जा सकेगी। इसमें कोई शक नहीं कि फिल्म संगीत का रंग और ढंग जिस तरह से बदला उसमें शिव-हरि जैसे मेलोड़ी के साधकों के लिए जगह नहीं बन सकती थी सो उन्होंने हमेशा शास्त्रीय संगीत के मंचों को ही अपनी प्राथमिकता में शामिल रखा।
विस्तार
भारतीय शास्त्रीय संगीत के आकाश से आज एक ऐसा दुर्लभ नक्षत्र ओझल हो गया जिसकी चमक और गमक ने बीते छह दशकों में न जाने कितनी महफिलों को रौनक बख्शी। जिस तरह उस्ताद बिस्मिल्ला खां शहनाई, पण्डित किशन महाराज तबला, पण्डित रविशंकर सितार पण्डित बिरजू महाराज कथक और पं. हरिप्रसाद चौरसिया बांसुरी के पर्याय बन गए थे वही बात पं. शिवकुमार शर्मा पर लागू होती थी।
संतूर और शिव जी एकमेक हो गए थे।
ईरान, अफगानिस्तान और फिर कश्मीर के लोकगीतों में बजने वाली षड़तंत्री वीणा को जिस लगन और निष्ठा से शिव जी ने समाकालीन शास्त्रीय संगीत के अनुकूल बनाया और स्थापित किया वह अपने आप में एक अलग अध्याय है लेकिन उसमें उनके पूज्य पिताजी पं. उमादत्त शर्मा की दूरदृष्टि की दाद देनी होगी जिन्होंने कश्मीर की वादियों के लोक वाद्य के जरिये एक बड़ी संभावना अपने पुत्र में निरख – परख ली।
यह अल्पज्ञात तथ्य है कि पं.शिवकुमार शर्मा मूलत: एक तबला वादक थे और उनकी करिश्माई थाप तो संगीतकार सचिनदेव बर्मन के संगीत निर्देशन में फिल्म गाइड के गीतों में भी गूंजी। कालांतर में उन्हें यह इलहाम हुआ कि संतूर ही उनका प्राण है और वही उन्हें सुयश दे देगा। बस यही कौल पं.शर्मा की जिन्दगी का फलसफा और दास्तान बन गया।विज्ञापन विज्ञापन
एक साधन की जीवन यात्रा
चालीस- पचास के दशक में जब लाहौर, दिल्ली, मुम्बई, जलंधर, रामपुर, लखनऊ, इलाहाबाद, बनारस, कोलकाता और इन्दौर क्लासिकल मौसीकी की रहनुमाई के बड़े ठिकाने थे तब गायक कलाकार की धजा कुछ ऊंही हुआ करती थी। उस्ताद बड़े गुलाम अली खां, सिद्धेश्वरी देवी, बेगम अख्तर, उस्ताद फैयाज खां, पं.ओंकारनाथ ठाकुर, रसूलन बाई, हीराबाई बडोदेकर, प.विनायकराव पटवर्धन - पं. नारायणराव व्यास, उस्ताद अमीर खां जैसे सितारों का बोलबाला सर्वत्र था।इसके बाद गिरिजा देवी, पं. कुमार गंधर्व, पं. जसराज, पं.भीमसेन जोशी, पं. मल्लिकार्जुन मंसूर, ने भी मैदान पकड़ लिया। राजाश्रय में रहे मैहर के बाबा अलाउद्दीन खां के बाद पूरा परिदृश्य बदलता गया।
उस्ताद हफीज खां सरोद, उस्ताद विलायत खां और पं. रविशंकर,पं. निखिल बैनर्जी सितार, उस्ताद अली अकबर खां सरोद, पं. पन्नालाल घोष की बांसुरी ने महफिलों में सजकारी का जलवा बिखेरना शुरू कर दिया।
गायक –वादकों को जो लोकप्रियता मिली वह बाद में पं. हरिप्रसाद चौरसिया और पं. शिवकुमार शर्मा जैसे हुनरमंद कलाकारों के लिए नए अवसर लेकर आई। इसमें कोई शक नहीं कि शिवजी और हरिजी ने अपने साजों से भारतीय शास्त्रीय संगीत के तमाम प्रतिष्ठित मंचों को अपनी कला से असीम ऊंचाइयां दी।
शास्त्रीय संगीत के जमावड़े भी मौसम, आयोजक और जयंतियों और स्मृति प्रसंगों के मोहताज होते थे ऐसे में जिन्दगी की गाड़ी को चलाना भी जरूरी था।
मुम्बई आकर शिवजी ने पचास से साठ के दशक तक लोकल ट्रेन में इस स्टुडियो से उस स्टुडियो तक की खाक छानी। उस कालखण्ड को याद करते हुए शिवजी ने मुझे बताया था कि सुबह आठ बजे से रेकॉर्डिंग्स के सिलसिले शुरू होते जो देर रात तक जारी रहते।
नौशाद, सचिन देव बर्मन, वसंत देसाई, ओ.पी.नैयर की फिल्मों में तो शिवजी के संतूर की जो छटा बिखरी है उसके तो कहने ही क्या। फिल्म मेरे मेहबूब के शीर्षक गीत मेरे मेहबूब तुझे मेरी मुहब्बत की कसम में तो बस संतूर ही संतूर है।
भव्य आर्केस्ट्रा से अपने संगीत को सजाने वाले नौशाद साहब की इस नज्म में शकील बदायूंनी की शायरी, मोहम्मद रफी के स्वर के बाद सिर्फ और सिर्फ शिव जी के संतूर का पारस स्पर्श मौजूद था।
शिव और हरि की अविस्मरणीय जोड़ी
बतौर संगीतकार भी शिव जी ने अपने अनन्य सखा पं. हरिप्रसाद चौरसिया के साथ शिव-हरि के नाम से संगीकार जोड़ी भी बनाई और कुछ बेजोड़ नग़मे संगीतरसिकों के लिए रचे। इसमें सिलसिला उनकी कालजयी फिल्म कही जा सकेगी। इसमें कोई शक नहीं कि फिल्म संगीत का रंग और ढंग जिस तरह से बदला उसमें शिव-हरि जैसे मेलोड़ी के साधकों के लिए जगह नहीं बन सकती थी सो उन्होंने हमेशा शास्त्रीय संगीत के मंचों को ही अपनी प्राथमिकता में शामिल रखा।
सत्तर के दशक में आया कॉल ऑफ द वैली नाम का कैसेट म्युजिक इण्डस्ट्री का सबसे बड़ा सैंसेशन बना था। ब्रजभूषण काबरा का गिटार और पं. हरिप्रसाद चौरसिया की बांसुरी तो उसमें थी ही लेकिन पं. शिवकुमार शर्मा के संतूर की टंकार तो एक दैवीय आलोक रच देती थी।
उस कैसेट के फ्लैप पर बनी कश्मीर घाटी की तस्वीर शिवजी के संतूर के जरिए एक करिश्माई ठंडक श्रोताओं की आत्मा में उतार गई थी। इस एलबम ने बिक्री के सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए थे। पं. शर्मा के महान कलावंत होने के साथ यह भी समझने योग्य तथ्य है कि उनके संतूर टोनल क्वालिटी में ऐसा कुछ विलक्षण जरूर था जो दीगर संतूर वादकों से सुनाई नहीं देता। इसमें पण्डितजी की लगन अपने साज़ पर सुदीर्घ रिसर्च को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता।
एकाधिक शो एंकर करते हुए पं.शिवकुमार शर्मा को ग्रीन रूम में नजदीक से देखने और समझने के कई मौके मुझे मिले। कार्यक्रम के पहले मैंने हमेशा उन्हें धीर-गंभीर और शांत तबियत का पाया। सौ तार वाले बाजे को मिलाना असीम धीरज और एकाग्रता मांगता है। इस काम को करते हुए उन्हें देखना किसी ऋषि को ध्यानस्थ होकर मंत्रोच्चारण करते देखना होता था।
बहुत मितभाषी और सॉफ़्ट बोलने वाले शिवजी बाद बाद में आध्यात्मित विभूति नजर आते थे। यह अलग बात है कि 84 की पकी उम्र में वे विदा होकर एक अपूरणीय शून्य छोड़ गए हैं किंतु वे अपनी अंतिम महफिल तक निर्विवाद रूप से युवा और आकर्षक ही दिखते रहे. सूरत और सीरत दोनों के लिहाज से शास्त्रीय संगीत के आयोजनों में सुने, सराहे और पसंद किए जाने वाले शिखर कलाकार थे।
पं. शिवकुमार शर्मा का अवसान भारतीय संगीत की ऐसी क्षति है जिसकी भरपाई कोई बंदिश, राग और सरगम या श्रुति नहीं कर सकती। शिव जी का जाना हमारे पूरे समय का कुछ और बेसुरा हो जाना है।
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