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पूर्वोत्तर डायरी: अनसुलझे सवालों से जूझता मणिपुर और सियासी हलचल

Prabhakar Mani Tewari प्रभाकर मणि तिवारी
Updated Mon, 10 Feb 2025 08:12 PM IST
सार

बीरेन सिंह के इस्तीफे की मांग तो मई, 2023 में हिंसा भड़कने के बाद से ही उठने लगी थी। लेकिन तब तस्वीर अलग थी। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भारी बहुमत और मैतेई समुदाय में उनके मजबूत पकड़ के कारण न तो बीरेन सिंह ने ऐसी मांग को कोई तवज्जो दी और न ही केंद्र सरकार या भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने।

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north east manipur violence and political crisis know the issue
पार्टी पर मजबूत पकड़ रखने वाले बीरेन सिंह बीते करीब सात-आठ वर्षों के दौरान राज्य में भाजपा के एक मजबूत नेता के तौर पर उभरे थे। - फोटो : self

विस्तार

बीते करीब 21 महीनों से बड़े पैमाने पर जातीय हिंसा से जूझने वाला पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर अब राजनीतिक अस्थिरता की चपेट में है। मैतेई और कुकी तबके के बीच लगातार भारी हिंसा के बीच ही मुख्यमंत्री बीरेन सिंह ने रविवार शाम को अचानक इस्तीफा दे दिया है। इससे राज्य में अटकलों और कयासों का दौर तेज हो गया है। केंद्र ने हाल में ही पूर्वोत्तर मामलों के जानकार पूर्व केंद्रीय गृह सचिव अजय कुमार भल्ला को राज्यपाल नियुक्त किया था। लेकिन उसके बाद तेजी से बदलते घटनाक्रम के बीच बीरेन सिंह के इस्तीफे ने राज्य को राजनीतिक अनिश्चितता की ओर धकेल दिया है।

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बीरेन सिंह के इस्तीफे की मांग तो मई, 2023 में हिंसा भड़कने के बाद से ही उठने लगी थी। लेकिन तब तस्वीर अलग थी। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भारी बहुमत और मैतेई समुदाय में उनके मजबूत पकड़ के कारण न तो बीरेन सिंह ने ऐसी मांग को कोई तवज्जो दी और न ही केंद्र सरकार या भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने। लेकिन अब हाल के दिनों में तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। पार्टी के जिन विधायकों के बूते बीरेन सिंह मजबूते से कुर्सी पर जमे थे, वही उनको कटघरे में खड़ा करने लगे थे।

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पार्टी पर मजबूत पकड़ रखने वाले बीरेन सिंह बीते करीब सात-आठ वर्षों के दौरान राज्य में भाजपा के एक मजबूत नेता के तौर पर उभरे थे। वह दौर ऐसा था जब पार्टी में उनके फैसलों पर कोई सवाल नहीं उठता था। लेकिन एक पुरानी कहावत है कि राजनीति में न तो दोस्ती स्थायी होती है और न ही दुश्मनी। यही वजह है कि कभी जो नेता उन पर आंख मूंदकर भरोसा करते थे वही अब उनको आंखें दिखाने लगे थे। इनमें विधानसभा अध्यक्ष थोकचोम सत्यब्रत सिंह समेत कुछ मंत्री भी शामिल थे। पार्टी के बागी विधायकों की तादाद धीरे-धीरे एक दर्जन के पार पहुंच गई थी।

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उधर, केंद्र सरकार भी बीरेन सिंह को बदलने के पक्ष में नहीं थी। उसका मानना था कि हिंसा के बाद उनको बदलने से गलत संदेश जाएगा। इससे यह साफ हो जाता कि हिंसा रोकने में नाकाम रहने की वजह से ही उनको हटाया गया है। लेकिन अब परिस्थिति इस मोड़ पर पहुंच गई थी कि उनसे इस्तीफा नहीं लेने की स्थिति में पार्टी को सदन में शर्मनाक हार का सामना करना पड़ सकता था। सोमवार (10 फरवरी) से शुरू होने विधानसभा के बजट अधिवेशन में विपक्षी कांग्रेस ने उनकी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश करने का फैसला किया था। इसके लिए नोटिस दी जा चुकी थी।

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि भाजपा के कम के एक दर्जन विधायक अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन करने के लिए तैयार थे। इन विधायकों ने बीते सप्ताह दिल्ली में केंद्रीय नेताओं से मुलाकात में भी बीरेन सिंह के किलाप जमकर भड़ास निकालते हुए मजबूती से नेतृत्व परिवर्तन की मांग उठाई थी।

इसके साथ ही हाल में वायरल एक वीडियो में मुख्यमंत्री कथित तौर पर यह दावा करते सुने गए थे कि उन्होंने मैतेई संगठन को सरकारी हथियार लूटने में मदद दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने इससे संबंधित याचिका पर सुनवाई के दौरान बीते सप्ताह अदालत ने उस ऑडियो क्लिप की फोरेंसिक जांच का आदेश दिया था।
 

भाजपा सूत्रों का कहना है कि बीरेन सिंह ने बजट अधिवेशन से पहले उसके प्रावधानों और वित्तीय आवंटन पर चर्चा करने के लिए राजधानी इंफाल में पार्टी के विधायकों की एक बैठक बुलाई थी। लेकिन करीब डेढ़ दर्जन विधायक उस बैठक में नहीं पहुंचे। उसी समय साफ हो गया था कि पानी अब सिर के ऊपर से गुजरने लगा है। उसके बाद मुख्यमंत्री बुधवार को दिल्ली पहुंचे लेकिन तमाम केंद्रीय नेता दिल्ली विधानसभा चुनाव को लेकर व्यस्त थे। इसी वजह से बीरेन सिंह ने प्रयागराज में महाकुंभ में डुबकी लगाने का फैसला किया। वहां से लौटने के बाद शनिवार को गृह मंत्री अमित शाह और जे।पी। नड्डा समेत दूसरे नेताओं के साथ मुलाकात के दौरान ही उनके इस्तीफा देने पर सहमति बनी। इसी दौरान शीर्ष नेतृत्व ने पार्टी के नेता संबित पात्रा को असंतुष्ट विधायकों को मनाने के लिए इंफाल भी भेजा लेकिन बात नहीं बन सकी। वहां से लौटने के बाद रविवार शाम को उन्होंने अपना इस्तीफा सौंप दिया।


मैतेई समुदाय के एक भाजपा विधायक बताते हैं कि केंद्रीय नेतृत्व को इस बात की भनक मिल चुकी थी कि इस्तीफा नहीं देने की सूरत में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान बीरेन सिंह सरकार का गिरना तय है। वह पार्टी के लिए शर्मनाक स्थिति होती। इसलिए उनको इस्तीफा देने को कह दिया गया। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि दरअसल, मई, 2023 में कुकी और मैतेई समुदाय के बीच जातीय हिंसा शुरू होने के बाद भी बीरेन सिंह पर इस हिंसा को  भड़काने के आरोप लगते रहे। उन पर मैतेई संगठनों को हथियार मुहैया कराने तक के आरोप लगे। बीरेन सिंह के खिलाफ सबसे गंभीर आरोप सशस्त्र मैतेई संगठन आरामबाई टेंग्गोल की मदद करने का लगा है।

इसके बावजूद केंद्र सरकार खासकर मैतेई समुदाय के बीच उनकी भारी लोकप्रियता को ध्यान में रखते हुए उनको कुर्सी से हटाने का खतरा नहीं मोल लेना चाहती थी। लेकिन धीरे-धीरे यह साफ होने लगा था कि बीरेन सिंह ने मैतेई और कुकी समुदाय के बीच इतनी कड़वाहट पैदा कर दी है जिसे पाटना संभव नहीं है। मणिपुर में अब ज्यादा विकल्प नहीं है। केंद्रीय नेतृत्व यहां बीरेन सिंह की जगह किसी बागी नेता को कमान सौंप सकता है या फिर कुछ दिनों के लिए राष्ट्रपति शासन लगा कर परिस्थिति सामान्य होने का इंतजार किया जा सकता है। ऐसे में यह सप्ताह काफी अहम होगा। फिलहाल विधानसभा का बजट अधिवेशन स्थगित कर दिया गया है। 

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर राष्ट्रपति शासन लागू करने पर ही सहमति बनी तो संसद के मौजूदा अधिवेशन के खत्म होने का इंतजार किया जाएगा। लेकिन भाजपा के एक विधायक ने दावा किया कि इसकी संभावना कम ही है। इस बीच, कुकी संगठनों ने कहा है कि बीरेन सिंह की जगह भाजपा के किसी और नेता को मुख्यमंत्री बनाने पर भी स्थिति में कोई सुधार नहीं होगा। उन्होंने कुकी बहुल इलाकों के लिए एक प्रशासनिक ढांचा बनाने की मांग दोहराई है। राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने भी मुख्यमंत्री बदलने की जगह राष्ट्रपति शासन लागू करने की मांग उठाई है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बीरेन सिंह के इस्तीफे के बावजूद मणिपुर की जमीनी हालत में बदलाव की उम्मीद कम ही है। केंद्र सरकार की यह बात जानती है। इसलिए वह फूंक-फूंक कर कदम बढ़ा रही है। किसी भी फैसले पर पहुंचने वह उसके तमाम पहलुओं पर गंभीरता से विचार कर रही है। इसकी वजह यह है कि उसके किसी भी फैसले का दूरगामी असर होना तय है।


 
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 

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