नॉर्थ ईस्ट डायरी: पहली बार रेलवे नेटवर्क से जुड़ेगा मिजोरम, उम्मीदें भी और आशंकाएं भी..!
- मिजोरम में पहली बार रेलवे नेटवर्क शुरू होने से विकास की नई राहें खुलेंगी। यह परियोजना राज्य की अर्थव्यवस्था को गति देगी और पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा।
- हालांकि, इसके साथ ही स्थानीय लोगों में बाहरी लोगों की बढ़ती भीड़ और इससे राज्य की संस्कृति पर पड़ने वाले संभावित खतरे को लेकर चिंता भी बढ़ रही है।
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Mizoram Railway Network: पूर्वोत्तर में म्यांमार और बांग्लादेश की सीमा से सटा पर्वतीय राज्य मिजोरम देश की आजादी के बाद पहली बार इस सप्ताह रेलवे नेटवर्क से जुड़ेगा। लेकिन इससे राज्य के लोगों को उम्मीदों के साथ ही कुछ आशंकाएं भी हैं। वर्ष 1972 में इसे असम से काटकर केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा दिया गया था। उसके 15 साल 1987 में इसे पूर्ण राज्य का दर्जा मिला।
अब तक यहां पहुंचने के लिए या तो सिलचर से सड़क मार्ग से पर्वतीय रास्तों से होकर करीब सात घंटे की दुर्गम यात्रा करनी होती थी या फिर राजधानी आइजल से 22 किमी दूर बने एय़रपोर्ट के जरिए यहां पहुंचा जा सकता था। लेकिन अब बाइरबी-साइरांग रेलवे लाइन के उद्घाटन के साथ ही सिलचर से यहां महज तीन घंटे में पहुंचा जा सकेगा। साइरांग स्टेशन से आइजल की दूरी करीब 18 किमी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 13 सितंबर को इसका उद्घाटन करेंगे। इसके साथ ही आइजल रेलवे नेटवर्क से जुड़ने वाली पूर्वोत्तर की चौथी राजधानी बन जाएगी। इससे पहले गुवाहाटी, अगरतला (त्रिपुरा) और इटानगर (अरुणाचल प्रदेश) तक ट्रेनों का संचालन होता रहा है। नागालैंड की राजधानी कोहिमा को भी रेलवे के नक्शे पर लाने की दिशा में तेजी से काम चल रहा है। मणिपुर में भी ऐसी एक परियोजना चल रही है।
पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे के अधिकारियों का कहना है कि केंद्र सरकार ने इलाके के सामरिक महत्व को ध्यान में रखते हुए पूर्वोत्तर के तमाम राज्यों की राजधानियों को रेलवे नेटवर्क से जोड़ने की योजना बनाई है। इन परियोजनाओं के तहत कुल 1500 किलोमीटर से अधिक लंबी पटरियां बिछाई जाएंगी। इनमें से कई परियोजनाएं विभिन्न चरणों में हैं। असम, अरुणाचल प्रदेश और त्रिपुरा पहले से ही रेलवे नेटवर्क में शामिल हैं। अब मिजोरम भी इसमें शामिल हो जाएगा। इसके अलावा मणिपुर की राजधानी इंफाल को इस साल के आखिर तक औऱ नागालैंड की राजधानी कोहिमा को वर्ष 2026 तक ब्रॉड गेज से जोड़ने का काम चल रहा है।
मिजोरम की इस रेलवे परियोजना के तहत 55 बड़े और 87 ब्रिजों के अलावा 48 भूमिगत सुरंगों का निर्माण किया गया है। इस रूट में कुल चार स्टेशन हैं। पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे ने 51।38 किमी लंबी इस रेलवे लाइन पर करीब आठ हजार करोड़ खर्च किए हैं। इलाके में चट्टान खिसकने की समस्या के कारण कई बार काम बंद रखना पड़ा। पहले इस परियोजना की लागत 6,547 करोड़ आंकी गई थी। लेकिन विभिन्न वजहों से काम बंद होने और फिर कोविड की वजह से इसमें देरी होती रही और इसकी लागत भी बढ़ती रही।
रेलवे के अधिकारियों ने बताया कि इस रेलवे लाइन को अब म्यांमार सीमा से सटे मिजोरम के अंतिम जिले लांगतलाई तक पहुंचाने के लिए सर्वेक्षण का काम पूरा हो गया है।
इस परियोजना से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक, इलाके की भौगोलिक स्थिति के कारण इस रेलवे परियोजना का निर्माण एक कठिन चुनौती थी। इलाके में चट्टान खिसकने की समस्या के कारण कई बार काम बंद रखना पड़ा। भौगोलिक लिहाज से बेहद दुर्गम समझे जाने वाले इस इलाके में करीब 11 साल में बनी इस परियोजना को इंजीनियरिंग का नमूना माना जा रहा है। इस रूट पर 48 सुरंगों के अलावा 55 बड़े और 87 छोटे ब्रिज बनाए गए हैं। साइरांग रेलवे स्टेशन से कुछ पहले बने ब्रिज नंबर 196 की ऊंचाई 104 मीटर है जो कुतुबमीनार से भी 42 मीटर ऊंचा है। इस रूट पर कुल पांच स्टेशन हैं।
उनका दावा है कि यह परियोजना मिजोरम के लिए एक नई जीवन रेखा साबित होगी। इससे इलाके में पर्यटन को तो बढ़ावा मिलेगा ही, पूरे साल कनेक्टिविटी बनी रहेगी। इससे राज्य की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। यात्रियों के अलावा इस परियोजना के जरिए माल की ढुलाई भी होगी। इसके अलावा सीमावर्ती राज्य होने की वजह से इस परियोजना का सामरिक महत्व भी है।
मिजोरम के सरकारी अधिकारियों और व्यापारियों का कहना है कि इस रेलवे लाइन की वजह से साल के बारहों महीने माल की ढुलाई हो सकेगी और सड़को पर निर्भरता काफी कम हो जाएगी। बरसात के सीजन में पहाड़ की मिट्टी धंसने के कारण अक्सर सड़क संपर्क कट जाता है। इससे लागत में तो कमी आएगी ही, कृषि उत्पादों के लिए नए बाजार खुलेंगे और युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।
पर्यटन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि इस रेलवे लाइन की वजह से राज्य में पर्यटन को काफी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। पर्यटन को बढ़ावा देने के मकसद से आईआरसीटीसी ने बीते महीने मिजोरम सरकार के साथ दो साल के लिए एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके तहत असम की राजधानी गुवाहाटी से एक विशेष पर्यटक ट्रेन का आइजल तक संचालन किया जाएगा। इससे देशी-विदेशी पर्यटकों को राज्य की संस्कृति और प्राकृतिक सौंदर्य से रूबरू कराया जा सकेगा।
इस पर्वतीय राज्य में धीरे-धीरे पर्यटकों की आवाजाही बढ़ रही है। पर्यटन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2023-24 के दौरान जहां 2।19 लाख पर्यटक यहां पहुंचे थे वहीं बीते वित्त वर्ष के दौरान यह तादाद 4।70 लाख तक पहुंच गई। अब ट्रेनों का संचालन शुरू होने के बाद इसमें और तेजी की उम्मीद है।
रेलवे अधिकारियों के मुताबिक, इससे राज्य में विकास की गति तेज होगी। पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी के।के।शर्मा बताते हैं कि अब रेलवे इस परियोजना को और आगे बढ़ाकर म्यांमार बॉर्डर तक ले जाने की योजना पर काम कर रहा है। बहुत जल्द सर्वे पूरा कर डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट केंद्र को सौंप दी जाएगी। उन्होंने बताया कि इस परियोजना में रेलवे को कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ा। मौके पर निर्माण सामग्री पहुंचाने के लिए उसे करीब दो सौ किमी लंबी सड़क का भी निर्माण करना पड़ा।
पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे के अधिकारियों का कहना है कि केंद्र सरकार ने इलाके के सामरिक महत्व को ध्यान में रखते हुए पूर्वोत्तर के तमाम राज्यों की राजधानियों को भी रेलवे नेटवर्क से जोड़ने की योजना बनाई है। इन परियोजनाओं के तहत कुल 1500 किलोमीटर से अधिक लंबी पटरियां बिछाई जाएंगी। इनमें से कई परियोजनाएं विभिन्न चरणों में हैं। असम, अरुणाचल प्रदेश और त्रिपुरा पहले से ही रेलवे नेटवर्क में शामिल हैं। अब मिजोरम भी इसमें शामिल हो जाएगा। इसके अलावा मणिपुर की राजधानी इंफाल को इस साल के आखिर तक औऱ नागालैंड की राजधानी कोहिमा को वर्ष 2026 तक ब्रॉड गेज से जोड़ने का काम चल रहा है।
दूसरी ओर, मिजोरम सरकार और स्थानीय संगठनों को इस रेलवे नेटवर्क की वजह से बाहरी लोगों की भीड़ बढ़ने की आशंका भी सताने लगी है। राज्य सरकार ने ट्रेनों के जरिए बाहरी राज्यों से बड़ी तादाद में आने वाले लोगों पर निगरानी के लिए विधानसभा में भीख मांगने पर पाबंदी लगाने वाला एक विधेयक पारित किया है।राज्य सरकार की दलील है कि राजधानी आइजल में फिलहाल 30 भिखारी हैं और यह सब बाहरी राज्यों के रहने वाले हैं। ट्रेनों का संचालन बढ़ने के कारण ऐसे लोगों की भीड़ बढ़ सकती है।
राज्य के सबसे ताकतवर गैर-सरकारी संगठन यंग मिजो एसोसिएशन (आईएमए) के एक प्रवक्ता ने कहा है कि यात्रा दुर्गम होने की वजह से अब तक पर्यटक ही यहां पहुंचते थे। लेकिन रेलवे की वजह से यह आसान और सस्ती होने के कारण पर्यटकों के साथ ही बाहरी लोगों की भीड़ भी बढ़ सकती है। इसे राज्य की संस्कृति को खतरा पैदा हो सकता है। सरकार को इस पर अंकुश लगाने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे।
यहां इस बात का जिक्र जरूरी है कि मिजोरम जाने के लिए सरकारी कर्मचारियों के अलावा दूसरे बाहरी लोगों को इनर लाइन परमिट लेना पड़ता है। यह 15 दिनों के लिए जारी किया जाता है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि परमिट के सहारे राज्य में आने वाले लोगों पर निगरानी रखने का एक तंत्र जरूरी है। इसकी वजह यह है कि आने के समय तो परमिट की जांच की जाती है। लेकिन वापसी के समय नहीं। यहां इस बात का जिक्र प्रासंगिक है कि इसी आशंका की वजह से मेघालय में रेलवे परियोजनाओं का बड़े पैमाने पर विरोध होता रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस रेलवे लाइन पर ट्रेनों का संचालन शुरू होने से इलाके में आवाजाही आसान हो जाएगी। लेकिन इसके साथ ही बाहरी लोगों की भरमार की आशंका भी बनी रहेगी।सामाजिक कार्यकर्ता सी. लालम्पुई कहती हैं कि इस परियोजना की वजह से राज्य में आने वाले पर्यटकों की तादाद भी बढ़ेगी और व्यापारिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलेगा। राज्य के लोग लंबे समय से रेलवे कनेक्टिविटी की मांग कर रहे थे। लेकिन आने वालों पर निगरानी रखना भी जरूरी है।
सिलचर के एक कॉलेज में बांग्ला पढ़ाने वाले मृणाल कांति सोम का कहना है कि अब आइजल का सफर आसान हो जाएगा। छह घंटे का दुर्गम सफर नहीं करना होगा। इलाके के कई लोग रोजी-रोटी के लिए मिजोरम के विभिन्न इलाकों में रहते हैं। उनका जीवन आसान तो होगा ही, पर्यटकों की तादाद भी बढ़ने की उम्मीद है।
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