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कोरोना वायरस से भारत की जंग: हेल्पलाइन नंबर पर समोसे और पान ऑर्डर कर रहे हैं लोग, थोड़ी तो शर्म कीजिए

Fri, 03 Apr 2020 01:09 PM IST
Yogita Yadav योगिता यादव
Updated Fri, 03 Apr 2020 01:09 PM IST
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misusing of coronavirus helpline number in uttar pradesh by public
यूपी पुलिस जी जान लगा रही है कुछ लोगों को मजाक सूूूझ रहा है। - फोटो : PTI

हेल्पलाइन संकट के समय में लोगों तक मदद पहुंचाने के लिए शुरू की जाती हैं, पर अगर इस पर भी आप पान और बीड़ी मंगवाने जैसे फर्जी कॉल कर रहे हैं, तो इससे साबित होता है कि हम मानसिक रूप से इतने दरिद्र हैं कि टीजिंग और मनोरंजन में फर्क करना भूल गए हैं। 

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“जीतेगा भारत हारेगा कोरोना” के जज्बे के साथ उत्तर प्रदेश पुलिस ने अपने ‘कोरोना कमांडो’ राज्य भर में उतार दिए हैं। दरअसल ‘कॉल 112’ पर उत्तर प्रदेश पुलिस के जवानों को ही कोरोना के समय में जरूरतमंदों की मदद के लिए उतार दिया गया है। एक दिनी जनता कर्फ्यू का आह्वान 22 मार्च को किया गया था। पर उससे पहले ही देशभर में सोशल डिस्टेंसिंग की जरूरत और कोरोना के संकट की भयावहता को महसूस किया जाने लगा था।

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इसी संकट को पहचानते हुए 17 मार्च को कॉल 112 हेल्पलाइन के संदेश लोगों में प्रसारित किए जाने लगे। 24 मार्च के लॉकडाउन के बाद से उत्तर प्रदेश पुलिस के ये कोरोना कमांडो पूरी तरह से फॉर्म में आ गए। जब रात 11 बजे एक मजदूर का फोन आया कि उनके पास खाने को भोजन नहीं है। कोरोना कमांडोज न केवल पका हुआ भोजन बल्कि सप्ताह भर का राशन साथ लेकर वहां पहुंचे।
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आप समझ सकते हैं दो दिन से भूखे किसी आदमी के लिए वही भगवान है जो उस तक भोजन पहुंचा दे। एनकाउंटर के कारण बदनाम हो चुकी उत्तर प्रदेश पुलिस का यह मानवीय चेहरा लोगों के पूर्वाग्रह तोड़ रहा है। जिससे वे उम्र भर डरते रहे, अब उन्हें अपनी सी लगने लगी है। 

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तुरंत मदद पहुंचा रहेे हैं जवान, लेकिन अब संसाधन कम पड़ रहे हैं। - फोटो : Social Media

मसीहा बनकर सामने आई है यूपी पुुुुुलिस 
राशन और खाना पहुंचाने के ही नहीं, ऐसे बहुत से उदाहरण है जब यूपी पुलिस के ये कोरोना कमांडो लोगों के लिए मसीहा बनकर आए। किसी की दवा खत्म हो रही थी, तो किसी के पास दवा खरीदने के पैसे भी नहीं थे। एक 65 वर्षीय महिला जो साधन न होने के कारण बैंक से पैसे नहीं निकाल पा रही थी, उसे भी इन कोरोना कमांडोज ने बैंक तक पहुंचाया और वापस उसके घर छोड़ा। जबकि एक व्यक्ति के बड़े भाई की मृत्यु होने पर जब अंतिम संस्कार के लिए सामान नहीं मिल रहा था तो उसने भी कोरोना कमांडोज से ही मदद मांगी और मिली भी। यह तो हुआ पुलिस और प्रशासन का मानवीय चेहरा। पर ऐसे समय में आप क्या कर रहे हैं? 

कहीं आप भी उन जाहिल और संवेदनाहीन लोगों में से तो नहीं जो हेल्प लाइन पर फोन करके शाम की दारू का इंतजाम करने को कह रहे हैं! कुछ लोग हर जगह को स्टैंडअप कॉमेडियन का मंच बना देते हैं। इन लोगों का मानसिक दिवालियापन इतना अधिक होता है कि ये टीजिंग यानी छेड़छाड़ और मनोरंजन में फर्क करना ही भूल जाते हैं।

ऐसा ही एक व्यक्ति था रामपुर का। जिसने 112 पर कॉल करके अपने लिए पांच पान बंधवा कर लाने का ऑर्डर दिया। ऐसे भी लोग थे जिन्हें बारिश के साथ समोसे की याद आई और उन्होंने 112 पर कॉल कर दिया। बीड़ी, सिगरेट, तंबाकू और शराब के लिए फोन करने वालों की गिनती जब लगातार बढ़ने लगी तो टीम का परेशान होना स्वभाविक ही है।

अभी तक इस तरह की कॉल इग्नोर की जा रही थी और टीम के जवान इनसे अपने अंदाज में निपट रहे थे। पर रामपुर के डीएम ने पान बंधवाने वाले के पास पहुंचने की ठानी। वे वहां पहुंचे और उस शख्स को सजा बतौर पूरे मुहल्ले में झाड़ू लगाने को कहा गया। ऐसी ही एक और फर्जी कॉल पर जब पुलिस राशन लेकर घर पहुंची तो देखा कि उस घर में राशन की कोई कमी नहीं थी।

यह देखकर अवाक रह गए जवानों ने इसका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल दिया। हालांकि इस वीडियो को बाद में खेद प्रकट करते हुए हटा दिया गया। क्योंकि यह एक-दूसरे को बदनाम करने या मजाक बनाने का समय नहीं है, बल्कि हिम्मत के साथ खड़े होने का समय है। 

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मजनू का टीला स्थित गुरुद्वारे से निकाले गए 300 लोग - फोटो : फोटो एनआआई

एक बच्ची की ऐसे बची जान 
अभी 1 अप्रैल की ही बात है, जब तीन साल की एक छोटी बच्ची ने खेल-खेल में गलती से विषैला पदार्थ पी लिया। बच्ची के घर में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं था जो लॉकडाउन के माहौल में उसे अस्पताल पहुंचा पाता। तब परिवार ने 112 पर कॉल की। और टीम तुरंत मदद के लिए दौड़ी। खुशकिस्मती से समय रहते बच्ची को मदद मिली जिससे उसकी जान बच सकी। पर कल्पना कीजिए अगर आपके वाहियात और फर्जी कॉल्स से परेशान होकर कोई एक जवान झुंझला कर फोन पटक देता और इस बच्ची का कॉल न ले पाता, तो बच्ची की मौत का जिम्मेदार कौन होता? आपका जरा सा मजाक, एक पूरे सिस्टम को पंगु बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता। 

बात एक और भी है। हर अनावश्यक कॉल, उन कई आवश्यक कॉल्स का रास्ता रोक देती है, जिन्हें सचमुच मदद की दरकार है। लोग शिकायत करते हैं कि वे बहुत देर से फोन लगा रहे थे मगर फोन लग नहीं रहा था। स्वभाविक है जब तक अनावश्यक कॉल आने बंद नहीं होंगे तब तक जरूरतमंदों के कॉल टीम तक नहीं पहुंच पाएंगे।

टीम के पास अब भी हर रोज 28 हजार के लगभग कॉल आ रहे हैं। जबकि 4500 कॉल ड्रॉप हो रहीं हैं। यानी संसाधन अब भी उतने नहीं हैं, जितनी आवश्यकता है। इसलिए जरूरी है कि उन्हें बचत के साथ इस्तेमाल करें। बीमारी और मुसीबत घर देखकर नहीं आती। मुसीबत का मुकाबला हिम्मत, हौंसले और ईमानदारी से ही किया जा सकता है।

संकट के समय में एक-दूसरे की मदद करें। सिस्टम को टिकटॉक वीडियो समझकर चुटकुला न बना दें। वक्त जैसा भी हो गुजर ही जाता है। बस हमारी स्मृतियों में यह दर्ज होता है कि हमने उस वक्त में हिम्मत से काम लिया या मूर्खतापूर्ण हरकतें कीं।   
 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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