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इक दोस्त का उपला और गया..!

Wed, 31 Jul 2019 07:37 PM IST
Subodh Holkar सुबोध होलकर
Updated Wed, 31 Jul 2019 07:37 PM IST
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Memory of Atul Lagu indore by subodh holkar passed away In madhya pradesh
एक दोस्त के चले जाने पर.... - फोटो : Social Media

बात लगभग चालीस बरस पुरानी है। उन दिनों मैं नईदुनिया में मुलाज़िम था। शाम होते मैं दफ़्तर पहुंच जाता। हमारे नसीब में न पंछी होना बदा था न अजगर। रात जब दफ़्तर से लौटता तो ज़िंदगी आंखें खोलती। कभी बाज़ दोस्त भी साथ हो लेते।

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मेरा एक अदद कमरा हुआ करता था, पीली मिट्टी-गोबर से लिपा हुआ। मैंने उसे बड़े जतन से संवारा था। वहीं दोस्तों का डेरा लगा रेहता। देर रात मेहफ़िलें सजतीं; दुनिया जहान की बातें होतीं। गाना-बजाना होता, कभी-कभार सुबह हो जाती। अखबार आ जाता, दूधवाला भैया आ जाता। फिर हड़बड़ी में सब सोने की तैयारी करते। बेग़म अख़्तर की आवाज़ कमरे में, ज़हनो दिल में गूंजती रहती।

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अहदे जवानी रो-रो काटा, पीरी में ली आंखें मूंद
यानी रात बहोत थे जागे सुबह हुई आराम किया।

ख़ूब किताबें पढ़ी जातीं और उन पर बहस-मुबाहिसा होता। ये भी होता के कोई एक पढ़ता और; और सब सुनते। कभी कोई पढ़ते-पढ़ते फफक कर रो पड़ता। संगीत और साहित्य के वलवले का लोभा सुलगते रहता।

मंटो का पारायण होता। मीरो ग़ालिब के दीवान सिरहाने रखे रहते। साहिर की परछाइयों की परछाइयों में हयात बसर होती। किताबें सारी अतुल के यहां से आतीं। इसरार से मांगकर क़िताब पढ़ने-पढ़ाने का चलन था। मेरा एक दोस्त गोरांग बड़े फ़ख्र से कहता- `हमारे बंगाल में किताब चुराना बुरा नहीं माना जाता`।  महसूस करें तो कितनी बड़ी बात है।

उन दिनों मैं नहीं था, फ़क़त इश्क़ था। मत पूछो ज़ालिम मुझसे क्या-क्या कराते रेहता था। रात देर से सोता, सुबह देर से उठता। दोपहर लेकिन मेरी जेब में रखता। उसे जैसा जी करे खर्च करता। ऐसे में कई एक बार अतुल के साथ दोपहर गुज़रती। पेग काट कर किताबें खरीदता।

रशियन साहित्य से तो कई पाठकों को अतुल ने ही रूबरू कराया था। किताबें इतनी सस्ती होती थीं कि मेरे जैसा आदमी भी किताबें खरीद सकता था। रशियन किताबों का काग़ज़, जिल्द,प्रिंट और फॉन्ट बहुत ख़ूबसूरत होता था और लेखक की तस्वीर भी। जैसे राजा रवि वर्मा ने हमारे ज़ेहन में देवी-देवताओं के रूप पैबस्त किए हैं, वैसे ही रशियन लेखक हमें ताउम्र वैसे ही नज़र आते रहेंगे जैसे हमने उन किताबों पर देखे थे।

एक दोपहर मैंने चंद किताबें चुनी और गुलज़ार की `कुछ और नज़्में` सरसरी देखने लगा। एक-दो नज़्में ही पढ़ी होंगी कि मैं बैठने की जगह तलाशने लगा। बैठकर कुछ और नज़्में पढ़ीं। पहले ही इश्क़ की बेल मुझ पर चढ़ी-लिपटी, उस पर फूल खिल आए। मैं क्या तो लिक्खूं, मेरी क्या दशा-दुर्दशा हो गई। मैंने सारी किताबें रखीं और चलता बना।

`अरे सुबोध ! क्या हुआ` अतुल की आवाज़ ने मेरा कंधा थाम लिया। `कुछ नहीं यार, किताबें ज़्यादा हो गईं, पैसे कम हैं`

`पैसे-वैसे तो आते रहेंगे, किताबें तो लेजा`

मैं किताबों के साथ हो लिया। फिर बड़े दिनों `कुछ और नज़्में` और चंद दीगर किताबें मेरे झोले में रखी रहतीं। उससे टिककर कोई पेय पदार्थ भी अपनी बारी का इंतज़ार करते बैठा रहता। पेय से कविताएं गेय हो जातीं। फिर आवाज़ दिखाई देती, रंग सुनाई पड़ते। कभी ये भी होता कि पेय ही किताब पढ़ लेता। आज भी वो किताब देखेंगे तो समझ जाएंगे।

तेरी आवाज़ के पैकर को लिपट जाऊं कभी
तेरी ख़ूशबू को कभी हाथ से छूकर देखू

बाद मुद्दत के ये हुआ कि किताब का पेपरबॅक आ गया। मैंने लपककर कुछ किताबें खरीद लीं। फिर बड़ी हसरतों से उन सब को भेंट कर दीं, जो मेरी नज़र में सरापा दिल थे,और सरापा दिलों पर ये दुनिया क्या कहर ढ़ाती है- बाप रे ! बिल्कुल निरीह और निरापद, इश्क़ में डूबे लोगों से क्या दुनिया ने अलग बर्ताव नहीं करना चाहिए ! उनके लिए खिड़की की सीट रिज़र्व.., रेस्त्रा में शोर से दूर सांवला कोना., उसी गली में दस बार भी जाए तो जाने दिए जाना जैसी छोटी-मोटी सहूलियतें ही तो दिल के मारों के लिए बड़ी सौगातें हैं। या कुछ न बन पड़े तो दुनिया बस इतना करें कि उन्हें उनके हाल पर ही छोड़ दे।

 

बंद शीशों के परे देख दरीचों के उधर
सब्ज़ पेड़ों पे घनी शाखों पे फूलों पे वहां
कैसे चुपचाप बरसता है मुसलसल पानी

कितनी आवाज़ें हैं, यह लोग हैं, बातें हैं मगर
ज़हन के पीछे किसी और ही सतह पे कहीं
जैसे चुपचाप बरसता है तसव्वुर तेरा

चूंकि मुझे शामें कम नसीब होती थीं। सो अतुल से निस्बतन कम ही मुलाकातें हो पातीं; लेकिन पिछले कुछ बरसों जब दिल्ली से राजेश बादल आता तो सारे कार्यक्रम निपट जाने के बाद रात किसी होटल का कमरा रौशन होता। फिर अतुल, राजेश और मैं नाचीज़ आतिशबाज़ी करते। एक बात पक्की है कि माथुर साहब का ज़िक्र ज़रूर निकलता और ख़ूब क़िस्से सुने-सुनाए जाते। कभी किसी बात पर अट्टहास गूंजता और कमरे से बाहर निकल जाता, बात कमरे में रह जाती।

चिमनबाग में अतुल के प्रगति पुस्तक भंडार के पीछे जीता-जागता एक कमरा था। जो दुकान से ज़्यादा चलता था। चंद दोस्त वहां अक्सर इकट्ठा होते। वहां एक मटकी पानी हमेशा रखा रहता। कभी-कभार देर रात मैं वहां पहुंचता हूं। वहां देखे चंद चेहरे आंखों में अब भी चमकते हैँ। अब क्या उनका नाम लूं…

सब कहां, कुछ लाला ओ गुल में नुमायां हो गईं
ख़ाक में क्य़ा सूरतें होंगी के पिनहां हो गईं

मेहफ़िलों के हंगामें में जब शोर बपा होता, चाय-वाय के दौर चलते, दोस्त ऊंची आवाज़ में बाद करते, बहसें होतीं.. अतुल हमेशा धीमी आवाज़ में बात करता। हां, जब चार-पांच अध्याय के बाद लोग-बाग अंग्रेज़ी में बात करना शुरू करते, अतुल मुझसे मराठी में बात करता। महफ़िलों से जब सब उड़ जाते, सबसे आखिर में जानेवाला अतुल ही होता। लेकिन अब जाने क्यों, अचानक, पहले चला गया।
महफ़िलों में अब तेरे नहीं होने का होना हमेशा बना रहेगा…
गुलज़ार की एक नज़्म ज़ेहन में उभरती है

छोटे थे, मां उपले थापा करती थी
हम उपलों पर शक्लें गूंधा करते थे
आंख लगाकर-कान बनाकर
नाक सजाकर--
पगड़ी वाला, टोपी वाला
मेरा उपला
तेरा उपला
अपने-अपने जाने-पहचानें नामों से
उपले थापा करते थे
हंसता-खेलता सूरज रोज़ सवेरे आकर
गोबर के उपलों पे खेला करता था
मेरा उपला सूख गया--
उसका उपला टूट गया--
रात को आंगन में जब चूल्हा जलता था
हम सारे चूल्हा घेर के बैठे रहते थे
किस उपले की बारी आई
किसका उपला राख हुआ

वह पंडित था--
वह मास्टर था--
इक मुन्ना था--
इक दशरथ था--

बरसों बाद--
श्मशान में बैठा सोच रहा हूं
आज की रात इस वक़्त के जलते चूल्हे में
इक दोस्त का उपला और गया !
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।            

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