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होली विशेष: बहुत खास है मणिपुर की होली, याओसंग उत्सव में अब भी जीवंत हैं परंपराएं

Sun, 05 Mar 2023 10:09 PM IST
Ravishankar Ravi रविशंकर रवि
Updated Sun, 05 Mar 2023 10:09 PM IST
सार

आज भी मणिपुर की होली पूरे आध्यात्मिक माहौल में मनाई जाती है, जहां होली का मतलब है आनंद और उल्लास। मणिपुर की मैतेई जनजाति के लोग होली की तरह ही ‘याओसंग’ उत्सव मनाते हैं।

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मणिपुरी होली और बच्चियां - फोटो : AmarUjala

विस्तार

मणिपुर में होली का गजब उत्सव देखने को मिलता है, यहां महिलाएं रातभर पुरुषों के साथ पूरे उल्लास के साथ होली यानी ‘याओसंग’ उत्सव मनाती है। आज भी मणिपुर में होली पूरी परंपरा और उल्लास के साथ मनाई जाती है। आज भी मणिपुर की होली पूरे आध्यात्मिक माहौल में मनाई जाती है, जहां होली का मतलब है आनंद और उल्लास। मणिपुर की मैतेई जनजाति के लोग होली की तरह ही ‘याओसंग’ उत्सव मनाते हैं। 

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यहां की होली में न तो अश्लीलता का दखल बढ़ा है और न ही आधुनिकता ने प्रवेश किया है। होली का आध्यात्मिक मतलब क्या होता है, यह इंफाल आकर देखा जा सकता है। उत्तर भारत में होली दो दिनों तक मनाई जाती है, लेकिन मणिपुर में लोग पूरे छह दिनों तक होली मनाते हैं। वह भी राधा और कृष्ण के साथ। लोग भले ही मणिपुर को उग्रवाद और उग्र आंदोलनों के लिए जानते हैं, लेकिन एक सच यह भी है कि मणिपुरी होली का कोई जवाब नहीं है। 

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‘याओसंग’ उत्सव

होली की मस्ती में पूरी मणिपुरी घाटी मदमस्त हो जाती है। मणिपुर सरकार इस मौके पर तीन दिनों के अवकाश की घोषणा करती है। अंतर सिर्फ इतना है कि यहां इसका नाम ‘याओसंग’ उत्सव है।

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दरअसल सदियों से मणिपुर के लोग याओसंग उत्सव मनाते आए हैं। वैष्णव धर्म के प्रभाव के बाद अठारहवीं सदी में याओसंग उत्सव और होली मिलकर एक हो गए। छह दिवसीय होली का आरंभ फाल्गुन पूर्णिमा से होता है। उस रात लोग घास-फूस, लकड़ी आदि से झोपड़ी बनाते हैं और उसमें आग लगा देते हैं। उत्तर भारत में लोग उसे होलिका दहन के नाम से जानते हैं।

अगली सुबह बच्चे घर-घर जाकर चंदा वसूलते हैं और रास्ते में रस्सी बांधकर गुजरने वाले से स्वेच्छा से चंदा मांगते हैं, जिसे नकाथेंग कहा जाता है। चंदे से जुटाई गई वस्तुओं और रुपये का उपयोग समूहिक भोज में किया जाता है। यह नजारा पूरी मणिपूर घाटी में देखा जा सकता है। दूसरे दिन लोग राधा-गोविंद मंदिर जाकर फगुवा गाते हैं, एक-दूसरे से मिलते हैं। लड़कों का दल समूह लड़कियों साथ होली खेलता है। सारा कुछ मर्यादित माहौल में होता है। कोई हुड़दंग नहीं। इस दिन की प्रतीक्षा पूरे साल की जाती है। यौवन की उमंग उस दिन देखते बनती है।

मजे की बात यह है कि लड़कों के साथ होली खेलने के लिए लड़कियां उनसे पैसे लेती हैं। होली में भीगे रंग का प्रयोग पूरी तरह वर्जित है, सिर्फ गुलाल का प्रयोग होता है। होली के मौके पर ‘थाबाल चोंगबा नृत्य’ करने की परंपरा है। थाबाल का मतलब- चांदनी और चोंगबा का मतलब नृत्य होता है। ये नृत्य सभी क्षेत्रों में  छह दिनों तक चलता है और इसके माध्यम से युवक और युवतियों को मिलने का मौका मिलता है।

दरअसल ‘थाबाल चोंगबा नृत्य’ के माध्यम से ही युवक या युवती को अपनी पसंद के साथ हाथ पकड़कर नृत्य करने और अपने प्रेम का इजहार करने का मौका मिलता है। यही वजह है कि युवा पीढ़ी इस उत्सव का इंतजार करती है। पहले इस नृत्य के दौरान सिर्फ ड्रम या ढोलक बजाने की इजाजत थी, लेकिन अब आधुनिक वाद्ययंत्रों का प्रयोग होने लगा है।
 

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मणिपुरी होली, कार्यक्रम का एक दृश्य - फोटो : AmarUjala

राधा-कृष्ण संग मनाई जाती है होली

चैत्र माह के प्रथम छह दिनों तक मणिपुर की घाटियों में ढोलक के थापों की आवाज गूंजती रहती है। वैष्णव धर्म के प्रभाव के कारण मंदिरों में जाकर भजन गाना अनिवार्य है। लोग सफेद धोती और पीली कमीज पहनकर कृष्ण मंदिर में जमा होते हैं और भजन गाते हैं। उस दौरान वे एक-दूसरे को जमकर गुलाल लगाते हैं और मदमस्त होकर वापस लौटते हैं। अंतिम दिन कृष्ण मंदिर से शोभायात्रा निकलती है। 

मणिपुर की मैतेई जनजाति के लोग कृष्ण के भक्त हैं। उन पर मथुरा और वृंदावन का गहरा प्रभाव है। इसलिए वे राधा और कृष्ण के साथ होली खेलने में विश्वास करते हैं। इस मौके पर तरह-तरह के खेलों का आयोजन किया जाता है। जिसमें मल्लयुद्ध, मार्शल आर्ट, दौड़ प्रतियोगिता शामिल हैं। इसके लिए उम्र की कोई बाधा नहीं होती है। बूढ़े-बुजुर्ग भी इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। 

असम में भी पारंपरिक ढंग से होली मनाने की परंपरा रही है। यहां पर लोग इसे ‘डोल यात्रा’ के नाम से मनाते हैं।  यह फाल्गुन पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। कृष्ण के उपासक श्रीमंत शंकर देव ने नाम घरों की स्थापना की थी और डोल यात्रा का आरंभ वहीं से हुआ। राज्य सरकार दो दिनों का सार्वजनिक अवकाश देती है। इसमें गुलाल का प्रयोग ही होता था, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में उत्तर भारत के रंग खेलने का प्रभाव देखकर यहां भी अब रंग का प्रयोग होने लगा है।

असम में होली के दूसरे दिन कीचड़ की होली होती है। असम के बरपेटा सत्र की होली विशेष रूप से उल्लेखनीय है। बरपेटा सत्र की होली कई दिनों तक चलती है। वहां की सामूहिक होली में हजारों लोग भाग लेते हैं। लोग फगुवा गाने की बजाय संकीर्तन गाते हैं, जिसमें राधा-कृष्ण से जुड़े होली के गीत गाए जाते हैं।




डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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