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जीवन धारा: मनुष्य को अवसर अपने भीतर खोजने होते हैं
Thu, 21 May 2026 06:40 AM IST
Devesh Tripathi
हेनरी डेविड थोरेयू
हेनरी डेविड थोरेयू
Published by: Devesh Tripathi
Updated Thu, 21 May 2026 06:40 AM IST
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जीवन धारा
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विस्तार
जब हम केवल पुस्तकों तक सीमित हो जाते हैं, चाहे वे कितनी ही श्रेष्ठ और शास्त्रीय क्यों न हों, और केवल लिखी हुई भाषाओं के माध्यम से ही दुनिया को समझने की कोशिश करते हैं, तब हम उस गहरी और प्राकृतिक भाषा को भूलने लगते हैं, जो प्रकृति, घटनाओं और जीवन के अनुभवों के जरिये बिना शब्दों के भी बहुत कुछ सिखाती है। दुनिया में बहुत कुछ लिखा जाता और प्रकाशित होता है, पर बहुत कम बातें ऐसी होती हैं, जो वास्तव में हमारे जीवन व मन पर गहरा असर छोड़ पाती हैं। जैसे खिड़की से आती सूरज की रोशनी तभी साफ दिखाई देती है, जब खिड़की पूरी तरह खुली हो, वैसे ही सत्य को भी हम तभी सही रूप में समझ पाते हैं, जब अपने मन को पूरी तरह खोलकर उसे देखने व स्वीकार करने का साहस करते हैं।इतिहास, दर्शन, कविता, समाज और जीवनशैली, चाहे कितने ही श्रेष्ठ क्यों न हों, इन सबकी तुलना उस साधना से नहीं की जा सकती, जिसमें हम हर पल सामने उपस्थित सत्य को देखने का अभ्यास करते हैं। सवाल यह है कि क्या हम केवल पाठक बनकर रह जाएंगे, या एक सच्चे दृष्टा बनेंगे?
मैंने अपने जीवन के एक महत्वपूर्ण समय में पुस्तकों का सहारा नहीं लिया, बल्कि प्रकृति के साथ तालमेल बिठाया और खेतों में काम किया। कई बार तो मैंने इससे भी अधिक मूल्यवान अनुभव प्राप्त किए। ऐसे क्षण भी आए, जब मुझे लगा कि वर्तमान के उस खिले हुए सौंदर्य को किसी भी कार्य के लिए छोड़ना उचित नहीं। मुझे अपने जीवन में विस्तार और खुलापन पसंद है। कई बार गर्मियों की सुबह, स्नान के बाद, मैं अपने द्वार पर बैठकर सूर्योदय से दोपहर तक विचारों में डूबा रहता, पेड़-पक्षियों और निस्तब्धता के बीच। वे क्षण मेरे लिए अत्यंत समृद्ध थे, मानो मैं रातों-रात फसल की तरह विकसित हो रहा हूं। यह समय मेरे जीवन से घटा नहीं, बल्कि उसमें अतिरिक्त रूप से जुड़ गया। मैंने समझा कि पूर्व के दार्शनिक जिस ध्यान और कर्म-त्याग की बात करते हैं, उसका अर्थ क्या है। अधिकांश समय मुझे यह भी ज्ञात नहीं होता था कि समय कैसे बीत रहा है। दिन अपने आप आगे बढ़ता, जैसे किसी कार्य को खुद ही करने के लिए आया हो, पर अंततः शाम हो जाती और कोई विशेष कार्य संपन्न ही नहीं होता। फिर भी, उस शांति में, उस मौन में, मैं भीतर से संतुष्ट था। मेरे दिन घड़ी के समय या सामाजिक बंधनों में नहीं बंधे थे, बल्कि वे स्वतंत्र और सहज प्रवाह में जिए जा रहे थे। दूसरों को यह निष्क्रियता प्रतीत हो सकती है, पर यदि प्रकृति मुझे परखे, तो मैं अपने आप को उसके अनुरूप पाता हूं। इसीलिए, मेरा मानना है कि मनुष्य को अवसर अपने भीतर खोजने होते हैं। प्रकृति किसी को उसकी निष्क्रियता के लिए दोष नहीं देती। यही जीवन का गहरा सत्य है। इसलिए मेरे जीवन का संदेश यही है कि अपने भाग्य को पढ़ें, जो सामने है, उसे पहचानें, और निडर होकर भविष्य की ओर बढ़ें।
-‘वाल्डेन’ के अनूदित अंश