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लचित बरफुकन की 400वीं जयंती: ऐसा वॉरियर जिनका सैन्य कौशल था अद्भुत, वह डरना नहीं जानता था

Sarbananda Sonowal सर्बानंद सोनोवाल
Updated Fri, 25 Nov 2022 12:00 PM IST
सार

चतुर कूटनीति और शानदार सैन्य कौशल का प्रदर्शन करते हुए, लचित बरफुकन ने मुगलों को ब्रह्मपुत्र नदी पर नौ सैनिक लड़ाई में खींचा, एक ऐसी लड़ाई जो असमियों के लिए निर्णायक साबित हुई। 

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lachit borphukan 400th birth anniversary, his leadership in the 1671 battle of Saraighat
लचित बोड़फुकान जयंती - फोटो : Twitter

विस्तार

महावीर लचित बरफुकन मां भारती के उन महान सपूतों में से एक हैं, जिन्होंने अपने पराक्रम के बल पर मुगलों से लड़ाई लड़ी और असम के सबसे महान सेनापति के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उनकी गाथा देशभक्ति, समर्पण और वीरता की एक ऐसी कहानी है जिसकी बराबरी बहुत कम लोग कर सकते हैं। लचित बरफुकन ने उस समय राष्ट्रवाद का परचम लहराया जब भारत पर विदेशी आक्रमणकारियों का शासन था। वे असम के एक और प्रेरणादायक सेनापति थे, जिन्होंने अपने व्यापक कंधों पर एक पूरे समुदाय की आशा को ढोया।

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असम के किसी भी नौजवान से पूछिए, शायद आपको लाइन सुनाई देगी- "मेरे मामा मेरे देश से बड़े नहीं हैं"। पुणे में प्रतिष्ठित राष्ट्रीय रक्षा अकादमी के अधिकारी आपको बताएंगे कि लचित बरफुकन स्वर्ण पदक उनके प्रतिष्ठित संस्थान से उत्तीर्ण सर्वश्रेष्ठ कैडेट को प्रदान किया जाता है। यदि आप गुवाहाटी आते हैं, उत्तर पूर्व भारत का प्रवेश द्वार, तो आप लचित बरफुकन को ब्रह्मपुत्र के जल पर खड़े रक्षक के रूप में पाएंगे, जो इतिहास के उस स्थल को दिखाता है जो उनकी वीरता को चिह्नित करता है। 

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विजयी योद्धा, उत्कृष्ट सैन्य रणनीतिकार, चतुर राजनयिक, महावीर लचित बरफुकन महान अहोम सेना के सेनापति थे, जिन्होंने एक ऐसा गठबंधन बनाया जिससे की 1671 में सरायघाट की लड़ाई में मुगलों को आक्रमण को  विफल कर दिया था। इसके फल स्वरूप मुग़ल कभी असम और उत्तर पूर्व में फिर से पैर जमाने की हिम्मत  नहीं की।

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कम उम्र से ही राजकीय- युद्ध कला में थे पारंगत

24 नवंबर, 1622 को एक प्रसिद्ध प्रशासक और अहोम स्वर्गदेव (राजा) के सेनापति, मोमाई तमुली बरबरुआ के यहां पैदा हुए, लाचित कम उम्र से ही राजकीय कला, युद्ध कला और शास्त्रों के अध्ययन में पारंगत थे और जल्दी ही दरबार में आसीन हुए। जब बंगाल के गवर्नर मीर जुमला ने असम पर आक्रमण किया, तो उसने गुवाहाटी पर कब्जा कर लिया और इसे एक फौजदार के अधीन कर दिया।


स्वर्गदेव चक्रध्वज सिंघा ने गुवाहाटी शहर को वापस लेने के लिए, एक बड़ी सेना गठन की। इस सेना का नेतृत्व करने का जिम्मा लचित बरफाकुन को दिया गया, जिसे सेनापति बनाकर गुवाहाटी भेजा गया, एक ऐसा क्षण जो असम और उत्तर पूर्व की नियति को हमेशा के लिए बदल देगा।

जैसा कि हम इस महान योद्धा की 400वी जयंती मना रहे हैं, हमें इतिहास में वापस जाना चाहिए कि कैसे लाचित ने राष्ट्रवाद की लौ को प्रज्वलित किया। मैदान पर अपने साहस से निराश सैनिकों को जगाया और हमारे सामने एक ऐसी गाथा प्रस्तुत की जिससे पूरे देश को प्रेरणा मिलनी चाहिए।
 

लचित बरफुकन के सबसे प्रसिद्ध शब्द, 'मेरे मामा मेरे देश से बड़े नहीं हैं', जिसके कारण उन्होंने असमिया सेना की मुगल हमले को रोकने की तैयारी के दौरान गुवाहाटी में किलेबंदी के निर्माण में सुस्त पाए गए अपने मामा का सिर कलम कर दिया। 'राष्ट्र पहले, परिवार अंत में' के दर्शन के शुरुआती उदाहरण, एक मंत्र जो भारतीय जनता पार्टी के हम सभी राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत भी बनाता है।


इन शब्दों ने सैनिकों के रैंक और फाइल के बीच एक उत्साह पैदा किया और मातृभूमि की सुरक्षा के मामलों में लाचित बरफुकन के अडिग रवैए को दिखाया। लगभग 400 साल बीत चुके हैं, लेकिन ये शब्द अभी भी मातृभूमि के प्रति असमिया उद्बोधन हैं। लाचित की तरह, राष्ट्र प्रथम का आदर्श सभी राष्ट्रवादी असमियों के लिए एक जीवंत मंत्र है।

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1667 में, अहोमों ने गुवाहाटी पर सफलतापूर्वक कब्जा कर लिया था और आक्रमणकारियों के साथ अपनी पुरानी सीमा स्थापित कर ली थी। इस हार के बारे में सुनकर, मुगल सम्राट औरंगजेब ने आमेर के राजा राम सिंह को उनके पिता को छत्रपति शिवाजी को भगाने में मदद करने की सजा के रूप में असम पर हमला करने के लिए भेजा।

1669 में यूरोपीय लोगों द्वारा संचालित 40 युद्ध नौकाओं के साथ लगभग एक लाख सैनिकों की एक सेना गुवाहाटी के बाहरी इलाके में पहुंची। अगले दो वर्षों में जो हुआ वह भारत के इतिहास में अविस्मरणीय अध्यायों के रूप में दर्ज है। संख्यात्मक रूप से बड़े मुगलों ने गुवाहाटी के पास अलाबोई में 10,000 से अधिक असमिया सैनिकों को मार डाला, इस घटना के बाद जिसने मुगलों को बाहर करने के लिए लाचित बरफुकन को नए सिरे से दृढ़ संकल्प के साथ जगाया। असमिया सेना ने रणनीति बदली।

चतुर कूटनीति और शानदार सैन्य कौशल का प्रदर्शन करते हुए, लचित बरफुकन ने मुगलों को ब्रह्मपुत्र नदी पर नौ सैनिक लड़ाई में खींचा, एक ऐसी लड़ाई जो असमियों के लिए निर्णायक साबित हुई। 

सरायघाट की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका

सरायघाट की लड़ाई असम और उत्तर पूर्व के इतिहास में एक ऐतिहासिक क्षण था, क्योंकि उसके बाद मुगल भारत के इस हिस्से पर कभी दावा नहीं कर सकते थे। यह दुनिया की सबसे बड़ी नौसैनिक लड़ाइयों में से एक थी। लचित बरफुकन का नाम इतिहास के स्वर्णिम अक्षरों में लिखा गया ।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आजादी के 70 साल बाद तक असम के घरेलू नायक लचित बरफुकन राष्ट्रीय चेतना से काफी हद तक बाहर रहे। लाचित का जागरण 2014 के बाद हुआ जब माननीय पीएम नरेंद्र मोदी ने देश की बागडोर संभाली। आज मुझे गर्व है कि हम भारत की राजधानी नई दिल्ली में महानायक की 400वीं जयंती मना रहे हैं। यह नए भारत की बदलती सोच का प्रतिबिंब है, जिसने राष्ट्र के लिए अपना सब कुछ न्योछावर करने वालों को गौरवान्वित करने के लिए अतीत के अपने बोझ को उतार दिया है।

जैसे ही हम भारत के अमृत काल में प्रवेश करते हैं, लचित बरफुकन की कहानी सैन्य पराक्रम में आत्मनिर्भरता की कहानी भी है। लचित बरफुकन ने एक असमिया सेना बनने के लिए विभिन्न राज्यों के सरदारों को एक साथ मिला लिया, जो एक साथ मातृभूमि के लिए लड़े। उनकी युद्ध रणनीति, पानी के जहाजों को स्वदेशी रूप से विकसित किया गया था, ऐसी रणनीतियां बनाई की मुगल साम्राज्य जैसी बड़ी सेना भी नहीं जीत सके। 
 

वर्तमान पीढ़ी के लिए संदेश

सैन्य शक्ति में आत्मानिर्भरता का उनका प्रदर्शन वर्तमान पीढ़ी के लिए भी एक संदेश है कि दृढ़ संकल्प और कौशल के उपयोग से असंभव प्रतीत होने वाली चीज को भी प्राप्त किया जा सकता है। लचित बरफुकन अपने  अहोमीया  सेना  के बीच लंबे समय तक खड़े रहे,  ईंट से ईंट बनाकर असम और उत्तर पूर्व के प्रत्येक व्यक्ति के खून से बहने वाले राष्ट्रवाद की नींव रखी। वह इस क्षेत्र के लोगों की अत्यधिक बहादुरी, दृढ़ता और दृढ़ संकल्प का प्रतिनिधित्व करते रहैं जिसे कठिन से कठिन समय भी नहीं तोड़ सकता।

वीर लचित 400वी जयंती के अवसर पर  हमे  इस महानायक को याद करने का संकल्प लेना चाहिए, जिसने एक पवित्र भूमि को अछूता और मुक्त रखने के लिए आगे बढ़कर नेतृत्व किया। लाचित बरफुकन में, भारत को अपनी अंतिम सांस तक मातृभूमि की सेवा करने के लिए धार्मिकता, न्याय और भावना की प्रज्वलित लौ की खोज करनी चाहिए।


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नोट: लेखक केंद्रीय जल परिवहन, पोत और आयुष मंत्री हैं। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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