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केदारनाथ त्रासदी: एक तस्वीर ने यूं बताई थी केदारघाटी की विभीषिका

Fri, 16 Jun 2023 10:31 AM IST
Kunal Verma कुणाल वर्मा
Updated Fri, 16 Jun 2023 10:31 AM IST
सार

उत्तराखंड सरकार के ही एक अधिकारी ने मेल से तस्वीर भेजी और मैसेज किया देखिए और अनुमान लगा लीजिए तबाही का। सच में हैरान करने वाली तस्वीर थी। फोटो डाउनलोड करते ही आह निकल गई। क्या सच में इतनी बड़ी तबाही है? यह तस्वीर सच्ची है या  इसमें छेड़छाड़ हुई है?

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kedarnath flood 2013: most scaring and horrible photo of kedarnath disaster
केदारनाथ त्रासदी की यही वो पहली तस्वीर है जो मीडिया के जरिए पूरी दुनिया ने पहली बार देखी। - फोटो : कुणाल वर्मा

विस्तार

कौन भूल सकता है 16 जून 2013 की उस खौफनाक याद को, जब उत्तराखंड के चारों धाम पर एक साथ प्रकृति ने अपना कहर बरपाया था। मंदाकिनी, अलकनंदा, भागीरथी, यमुना सभी नदियां अपने रौद्र रूप में थी। हजारों लोगों की मौत का गवाह बना था उत्तराखंड। अपनों से बिछड़ने का दर्द क्या होता है ये उन लोगों से बेहतर कोई समझ नहीं सकता जो आज दस साल बाद भी अपनों का इंतजार कर रहे हैं।

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किसी ने इस दृष्य की नहीं की थी कल्पना

खबरें तो 17 जून से ही थोड़ी बहुत मिलनी शुरू हो चुकी थी, पर खबर इतनी दर्दनाक होगी किसी ने कल्पना नहीं की थी। मुझे आज भी याद है 18 जून की वह शाम जब देहरादून में अखबार के न्यूज रूम में सहयोगियों के साथ बैठा था। बेहद खराब मौसम और विषम परिस्थितियों के कारण केदारघाटी से आपदा की सही खबर नहीं मिल रही थी। या यूं कहें कि पुष्टि नहीं हो रही थी।
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सरकार के अधिकारी से लेकर मंत्री तक कुछ बोलने की स्थिति में नहीं थे। वह तो भला हो सेना के उस टोही हेलिकॉप्टर का, जिसने बेहद खतरनाक हो चुके मौसम के बावजूद केदारघाटी का जायजा लेने का साहस दिखाया था। सेना के हेलिकॉप्टर में सवार वह जांबाज आज भी गुमनाम है, जिसने एक ऐसी तस्वीर खींची जिसके बाद पूरा देश रो पड़ा। यही वह तस्वीर थी जो तबाही के 48 घंटे बाद पहली बार 18 जून की शाम देहरादून की मीडिया तक पहुंची थी।
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तस्वीर को लेकर थी उलझन

उत्तराखंड सरकार के ही एक अधिकारी ने मेल से तस्वीर भेजी और मैसेज किया देखिए और अनुमान लगा लीजिए तबाही का। सच में हैरान करने वाली तस्वीर थी। फोटो डाउनलोड करते ही आह निकल गई। क्या सच में इतनी बड़ी तबाही है? यह तस्वीर सच्ची है या  इसमें छेड़छाड़ हुई है?

अपने सहयोगियों से इस पर चर्चा कर ही रहा था कि तमाम दूसरे अखबारों के दफ्तर के साथियों के फोन भी घनघनाने लगे। सभी अखबारों में इस तस्वीर को लेकर ही अफरातफरी मची थी। खैर कुछ मिनटों बाद ही स्पष्ट हो गया कि यह तबाही की वास्तविक तस्वीर है। इसके बाद पूरे न्यूज रूम का माहौल ही बदल गया।

अब तक जो खबरें आ रही थी वो अनुमानों पर आधारित थी कि केदारघाटी सहित चारों धाम में भयंकर तबाही मची है। पहाड़ों में फोन की कनेक्टीविटी बर्बाद हो चुकी थी। किसी से न तो मोबाइल पर संपर्क किया जा सकता था और न लैंड लाइन पर। प्रमुख जिलों में मौजूद कुछ संवाददाताओं ने किसी तरह जुगाड़ करके राजधानी में तबाही की खबरें जैसे-तैसे पहुंचाई थी।

चर्चा थी उस तस्वीर की

ऋषिकेश और हरिद्वार में उफनाती गंगा ने पहाड़ों की कहानी को थोड़ा बहुत कहने का प्रयास जरूर किया था। पर उस एक तस्वीर ने सबकुछ बदल कर रख दिया। देहरादून से प्रकाशित सभी अखबारों के न्यूज रूम में 18 जून की शाम उसी तस्वीर की चर्चा थी।

खबरों की प्लानिंग से लेकर, प्रस्तुतिकरण तक सभी कुछ बदल गया। आनन फानन में रात में ही सभी अखबारों में टीम का गठन कर दिया गया जो सुबह उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों के लिए रवाना हो जाएंगे। अलग आपदा डेस्क बना दी गई। 19 जून को तस्वीर और तबाही की खबरों के प्रकाशन के बाद उत्तराखंड सहित पूरे भारत की सांसे थम गई थी।

 उस एक तस्वीर ने सबकुछ बदल कर रख दिया। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि 18 जून की शाम तस्वीरों के मिलने के चंद घंटे बाद 19 जून की सुबह भारतीय सेना को बचाव अभियान में लगा दिया गया। भारतीय सेना की सेंट्रल कमांड ने 19 जून को सुबह-सुबह ऑपरेशन शुरू कर दिया।

पहले इस अभियान का नाम ऑपरेशन गंगा प्रहार दिया गया। दो दिन बाद ही इसका नाम बदलकर ऑपरेशन सूर्य होप कर दिया गया। लेफ्टिनेंट जनरल अनिल चैत उस वक्त सेंट्रल कमांड के जीओसी थे, उनके नेतृत्व में ही ऑपरेशन सूर्य होप के जरिए भारतीय सेना ने इतिहास का सबसे बड़ा बचाव अभियान चलाया। इसी दिन भारतीय वायु सेना भी अपना बचाव अभियान लॉन्च किया। वायुसेना के रेस्क्यू ऑपरेशन का नाम दिया गया ऑपरेशन राहत। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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