काति बिहूः उत्सव नहीं प्रार्थना का पर्व
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असम या पूर्वी भारत के लोगों को अगर छोड़ दें, या यहां से जैसे-जैसे आप पश्चिम, उत्तर या दक्षिण भारत की ओर बढ़ते हैं, उनकी नजरों में बिहू का मतलब आता है कुछ लड़के और लड़कियां रंग-बिरंगे सुंदर पारंपरिक कपड़े पहनकर गोल दायरे में ढोल और पेपा की धून पर नाचना-गाना।
दरअसल, मौज-मस्ती का दूसरा नाम ही बिहू है। यह किसी हद तक सत्य भी है। लेकिन असम में तीन बिहू मनाए जाते हैं और तीनों का कृषि और प्रकृति के साथ इतना गहरा नाता है कि जानने पर वहां के लोगों की तारीफ करने का मन करता है। दिल करता है कि असल में प्रकृति प्रेमी तो ये हैं। असली प्रकृति के संरक्षक तो ये हैं।
किस तरह से असमियां लोग आज भी खेती-किसानी और प्रकृति को उसी रूप में संजोते आ रहे हैं, उनकी पालना उसी रूप में करते आ रहे हैं, जो उनके पूर्वज छोड़कर गए या सिखा गए। आज के इस भौतिकवादी समाज में जब कि समाज अपने रीति-रिवाजों को भूलता और छोड़ता जा रहा है, लेकिन उसी कालखंड में असमियां लोग आज भी अपनी संस्कृति और विरासत को उसी रूप में अपने ह्रदयस्थल पर बसाए आगे बढ़ रहे हैं।
शायद यही कारण है कि आज भी असम के लोग अपनी मान्यताओं और परंपराओं पर गर्व और बेझिझकर, अंगीकार कर आगे बढ़ रहे हैं। उन्हीं परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के एक पर्व का नाम है काति बिहू। यह वास्तव में उत्सव का नहीं बल्कि प्रार्थना का पर्व है।
बिहू असम के लोगों का प्रमुख पर्व है। इसमें सभी जाति के लोग शामिल होते हैं और बड़े उत्साह के साथ तीन तरह के बिहू मनाए जाते हैं, जो तीन ऋतुओं के प्रतीक हैं। पहला बिहू जिसे बोहाग बिहू या रंगोली बिहू कहते हैं, अप्रैल में चैत्र या बैसाख में मनाया जाता है। यह असम का मुख्य पर्व है। उसके बाद आता है काति बिहू या कंगाली बिहू। यह कार्तिक महीने (अक्तूबर) में मनाया जाता है। इसके बाद मनाया जाता है माघबिहू (यह मकर संक्रांति, 14 जनवरी) को मनाया जाता है।
मूल रूप से असम के लोगों का जीवन कृषि पर आधारित है। यहां के लोग अपना जीवन-यापन कृषि से ही करते हैं, और मुख्य फसल धान है। इसलिए सारे पर्व भी किसानी और खेती से जुड़े हैं। आज हम बात कर रहे हैं, काति बिहू की, जिसे कंगाली बिहू कहा जाता है। यह सामान्यतः अक्टूबर में मनाया जाता है।
असमिया लोग आषाढ़-श्रामवण मास में धान की खेती करते हैं। आश्विन के अन्त में यह धान पककर सुनहला स्वरूप ले लेता है। प्रकृति पर निर्भर किसान खेत की लक्ष्मी 'उपज' को सादर घर पर लाने के लिए तैयार होता है और आश्विन-कार्तिक की संक्रान्ति के दिन उपज की मंगलकामना से खलिहान एवं तुलसी के वृक्ष के नीचे दीप प्रज्ज्वलित करके अनेक नियमों का पालन करता है।
इसे ही "काति बिहू" कहते हैं। बिहू के दिन किसान के खलिहान ख़ाली रहते हैं, इसीलिए यह महाभोज या उल्लास का पर्व न होकर प्रार्थना व ध्यान का दिन होता है। चूंकि कोई फ़सल काटने का यह समय नहीं होता, इसलिए किसान के पास धन नहीं होता, परन्तु इसका प्रयोग ध्यानादि कार्यक्रम में किया जाता है। इसलिए इसे "कंगाली–बिहू" भी कहते हैं।
युवक और युवतियां मितव्यय करना भी इस पर्व के माध्यम से ही सीखते हैं। धान के खेतों में मां लक्ष्मी की प्रतिमा पर एक माह तक प्रत्येक रात दीपक जलाया जाता है। तुलसी के पवित्र पौधे को घर के आँगन में लगाकर उसे जल अर्पित किया जाता है। परमपिता परमात्मा से प्रार्थना की जाती है कि उनकी फसल अच्छी हो, और उनका जीवन सुखमय हो।