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कश्मीर यात्रा वृतांत: डर के आगे हौसले की जीत होती है
सार
कहा जाता है कि कश्मीरी खुद से और अपने परिवार के बाद सबसे ज्यादा प्यार टूरिस्ट से करते है, क्योंकि उनसे उनके परिवार का रोजगार चलता है। इस बार आतंकियों ने टूरिस्टों के सीने पर तो गोली मारी, लेकिन लाखों कश्मीरियों के चूल्हे की आग भी ठंडी कर दी।
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कहा जाता है कि कश्मीरी खुद से और अपने परिवार के बाद सबसे ज्यादा प्यार टूरिस्ट से करते हैं।
- फोटो : अभिषेक चेंडके
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विस्तार
धरती पर बसे कुदरत के खूबसूरत शहर कश्मीर को देखने की इच्छा पूरी हुई। इंदौर से निकली फ्लाइट ने जब कश्मीर की धरती पर कदम रखा तो बर्फीली पहाड़ों पर चमकीली धूप को भर भर कर देखते रहे। छोटी बेटी रूही ने नन्हा सा सवाल पूछा - पापा क्या हम यहां घर नहीं बना सकते? यहां रहने आ सकते है क्या?उस वक्त तो मैं मुस्कुरा दिया, लेकिन बेटी को जवाब शाम को श्रीनगर के माहौल ने दिया।
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दोपहर में पहलगाम पर टूरिस्टों पर अटैक हुआ। खुशनुमा माहौल में शंका के बादल मंडराने लगे। बेटी ने शाम को पूछा - पापा हमारी ट्रीप कैंसल क्यों हो गई? होटल से सब लोग सामान लेकर क्यों निकल रहे है।
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जिस ट्यूलिप गार्डन में हमें रीले बना कर निकले, वो बंद हो गया। शाम को रिश्तेदारों, दोस्तों के कॉल आने लगे। सब ठीक तो है न? क्या माहौल है वहां का, तुम सब लौट आओ... जैसी उनकी चिंताएं हमें भी सताने लगी। दूसरे दिन कश्मीरियों ने आतंकी घटना के विरोध में पूरा कश्मीर बंद रखा। गलियों चौबारों में घटना के विरोध में प्रदर्शन हुए।
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कहा जाता है कि कश्मीरी खुद से और अपने परिवार के बाद सबसे ज्यादा प्यार टूरिस्ट से करते है, क्योंकि उनसे उनके परिवार का रोजगार चलता है। इस बार आतंकियों ने टूरिस्टों के सीने पर तो गोली मारी, लेकिन लाखों कश्मीरियों के चूल्हे की आग भी ठंडी कर दी।
तनाव भरे माहौल के बीच हमने भी सोचा कि होटल की चार दिवारी में खुदवको कैद रखकर कश्मीर आने के फैसले को कोसने के बजाए निकला जाए।
मैं पहले अकेला बाजार में माहौल देखने के निकला। गालियां सुनसान थी। जो लोग यहां वहां खड़े बतिया रहे थे, वे भी इस घटना से दुखी थे।
मैने कार ड्राइवर आदिल को कॉल किया। उनसे बताया कि गुलमर्ग जा सकते है। वहां टूरिस्ट प्लेस पर रोक नहीं लगी। डर,चिंता, तनाव को लगेज में रख कर मैं, पत्नी और दोनों बेटियां निकल गए। इस हौसले के साथ कि जो भी होगा देखा जाएगा।
60 किलो मीटर का सफर तय कर गुलमर्ग पहुंचे। यहां बर्फ पर चलने वाले जूते किराए के लिए लेने गए, तो दुकान वाले ने कहा रहने दीजिए, आप लोग यहां आए है ये क्या कम है। उसके बात टालते हुए पांच सौ का नोट उसकी जेब में रखा और आगे बढ़ गए, लेकिन हम जैसे यहां हजारों लोग थे, जो डर को छोड़ कर आतंक के खौफ को हराने निकले थे।
छोटे बच्चे, बूढ़े माता पिता के साथ केबल कार में जाने के लिए कतार लगी थी। हम भी पहाड़ पर थे। बर्फ की चादर देख कर बाकी बचा तनाव भी बर्फ में पिघल गया। लौटते समय ढाबे पर कश्मीरी खाना खाना नहीं भूले।
पहाड़ों पर तैनात थे सेना के जवान
दूसरे दिन हम सोनमर्ग के लिए निकले, ये अच्छी बात थी कि इस घटना के बाद सोनमर्ग में भी टूरिस्टों के जाने पर रोक नहीं लगी। आतंकी हमला न हो, इसलिए पहाड़ों पर सेना के जवान तैनात थे। संगीन के साए में दोनों बेटियों ने स्नो मेन बनाए, एक दूसरे पर बर्फ फेंकी। एक कश्मीरी ने आकर पूछे - सर रील बनाना है क्या?वैसे 150 रूपए लगते है, आप 100 रूपए दे देना। उनका मन रखने के लिए तीन रील बनवा ली, फिर होटल लौट आए।
जम्मू नेशनल हाईवे पांच जगह से टूटा है। सड़क से जम्मू नहीं जा सकते थे। माता के दरबार वैष्णो देवी पर जाने की इच्छा अधूरी रही। मजबूरी में श्रीनगर से दिल्ली तक की फ्लाइट करवानी पड़ी।
पहलगाम सुरक्षा कारणों से बंदा था, वहां जाने का मन था, नहीं जा पाने का मलाल रहेगा।
(मध्य प्रदेश के इंदौर से कश्मीर की यात्रा पर गया एक परिवार के अनुभव के अनुसार)
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।