सौरव गांगुली के BCCI अध्यक्ष बने रहने के खतरे भी जानना है जरूरी
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बतौर बीसीसीआई अध्यक्ष सौरव गांगुली का कार्यकाल बढ़ सकता है। बीसीसीआई में आंतरिक तौर पर इसके लिए सहमति भी बन गई है, लेकिन चूंकि छह साल कार्यकाल संभालने के बाद पद को छोड़ने का नियम अदालत ने तय किया था इसलिए इस नियम में ढील देने का फैसला भी अदालत ही करेगी।
यूं तो सौरव गांगुली ने जब बीसीसीआई अध्यक्ष पद के लिए हामी भरी थी तभी ये बात तय थी कि उनका कार्यकाल लगभग नौ महीने का ही होगा। ये जानकारी जब आम हुई तो बहुत से लोगों को अखरी भी थी कि एक तो बड़ी मुश्किल से किसी दिग्गज खिलाड़ी को ये जिम्मेदारी मिली, लेकिन इतनी कम मियाद के लिए।
दरअसल, सौरव गांगुली ने बतौर कप्तान जो लोकप्रियता कमाई है वो हर किसी के जेहन में थी। फैंस चाहते थे कि अब अगर दादा आए ही हैं तो थोड़ा ठहर कर काम करें। क्रिकेट से उठते भरोसे को फिर से कायम करें। मैच फिक्सिंग के साए में मिली टीम की कप्तानी को मजबूती से संभालने वाले सौरव गांगुली कुछ ऐसा कर दें कि क्रिकेट एक बार फिर लोगों के लिए धर्म बन जाए। क्योंकि क्रिकेट फैंस का एक बड़ा वर्ग पिछले कुछ साल में खेल में आई ‘बेईमानी’ से आहत हैं।
सौरव गांगुली और ऐतिहासिक डे-नाइट टेस्ट मैच
खैर, इन्हीं उम्मीदों के बीच सौरव गांगुली ने कोलकाता में पहला डे-नाइट टेस्ट मैच करा दिया। सौरव ने इस मैच के सफल आयोजन के लिए जी तोड़ मेहनत की। कई कई घंटे खुद स्टेडियम में मौजूद रहे। पूरे शहर को गुलाबी बना दिया। 40 हजार से ज्यादा लोग टेस्ट मैच देखने पहुंचे। यानी सौरव गांगुली ने बतौर बोर्ड अध्यक्ष अपने पहले ही ओवर में शानदार शॉट्स लगा दिए। उन्होंने दिखा दिया कि भारत में क्रिकेट की सूरत शक्ल बदलने वाले जगमोहन डालमिया से उन्होंने सिर्फ़ स्नेह ही हासिल नहीं किया बल्कि उन्होंने उनसे ‘प्रोफेशनली’ भी काफी कुछ सीखा है। लिहाजा अगर सौरव गांगुली को कोर्ट से ‘एक्सटेंशन‘ मिल जाता है तो किसी को अखरेगा नहीं। परेशानी इस बात की है कि कहीं इस बदलते नियम की आड़ में एक बार फिर क्रिकेट पूरी तरह कुछ ‘ख़ास’ लोगों की गिरफ़्त में ना आ जाएं।
आप नियमों की भी पूरी कहानी समझ लीजिए
आईपीएल में स्पॉट फिक्सिंग के खुलासे के बाद क्रिकेट में सुधार को लेकर खूब हो हल्ला हुआ। बात सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची। कोर्ट ने लोढ़ा समिति बनाई। लोढ़ा समिति की सिफारिशों में ही कहा गया कि अब कोई भी पदाधिकारी 6 साल के बाद अपने पद पर काबिज नहीं रह सकता। इसके बाद एक कूलिंग ऑफ पीरियड होगा जिसे पूरा करने के बाद भी वो उस पद पर तय प्रक्रिया से चुने जाने के बाद लौटेगा। सौरव गांगुली पिछले पांच साल से क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बंगाल से जुड़े हुए हैं इसलिए उन पर भी ये नियम लागू होता है। बोर्ड के मौजूदा पदाधिकारियों में सचिव जय शाह पर भी ये नियम लागू होता है क्योंकि वो भी गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन से जुड़े रहे हैं और करीब पांच साल का वक्त बीता चुके हैं।
बड़ा खतरा भी जान लीजिए
ऐसा नहीं है कि लोढ़ा समिति और बाद में विनोद राय की अध्यक्षता वाली कमेटी ने क्रिकेट में बेहतरी के जितने नियम बनाए वो सब के सब बेहतर थे। उनमें से कई नियम ऐसे थे जिनका नुकसान ही हो रहा है, लेकिन अभी उन नियमों की प्रासंगिकता और फायदे की बात छोड़ देते हैं। इस बात को समझते हैं कि लोढ़ा समिति ने अगर कुछ सख्त नियम बनाए थे तो उसके पीछे तार्किक वजहें थीं।
क्रिकेट एडमिनिस्ट्रेशन में पारदर्शिता ना के बराबर रह गई थी। बंद कमरों में फैसले होते थे। अलग अलग राजनीतिक दलों वाले नेता जो एक दूसरे का मुंह देखना नहीं पसंद करते थे वो भी बंद कमरे में गले मिलकर सब कुछ तय कर लेते थे। बीसीसीआई के पदाधिकारी अपने मन से नियम बनाते थे। बदलते थे। ऐसा नहीं है कि लोढ़ा समिति की सिफारिशों के बाद सबकुछ बिलकुल पटरी पर आ गया।
बोर्ड के मौजूदा सदस्यों में भी ऐसे नाम हैं जिन्हें सब कुछ विरासत में मिला है। बावजूद इसके नियमों का एक डर तो दिखता है। आज अगर एक नियम में बदलाव की सिफारिश हुई है तो कल और भी नियमों में बदलाव की सिफारिश होगी। हितों के टकराव से लेकर आयु सीमा तक हर नियम बदलने की कोई ना कोई वजह खोजी जाएगी। ऐसे में डर इस बात का होगा कि कहीं भारतीय क्रिकेट फिर उसी गर्त में ना पहुंच जाए जहां मजबूर होकर बात अदालत तक पहुंची थी।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।