इजराइल-हमास युद्ध: धर्म सिर्फ विश्वास का नहीं तर्क का विषय, क्या है जंग का कारण?
धर्म का वास्तविक उद्देश्य होता है इंसान को उसके बंधन से और दुःख से आजाद करना और जब धर्म वास्तविक नहीं होता, आपको आनंद नहीं दे पाता तो आप चिढ़े-चिढ़े घूमते हो क्योंकि सब कुछ पालन करने के बाद भी भीतर से कोई त्रिप्ती शांति मिल नहीं रही होती। ऐसे में कोई आ करके थोड़ा आपको कोच दे, थोड़ा आपके जो भी इष्ट हैं, उनको एक दो चुभती बातें बोल दे तो आप के भीतर तुरंत विस्फोट हो जाएगा, हिंसा ऐसे ही जन्म लेती है।
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विस्तार
कोई भी लड़ाई या हर दर्जे की क्रूरता हमें यही बताती है कि धर्म एक आम आदमी के लिए, उसके किस्से-कहानियों, मान्यताओं का एक पिंड मात्र है। मेरे पास मेरी कहानी है, आपके आस आपकी कहानी है और मैं कुछ भी मान सकता हूं, आप भी कुछ भी मान सकते हैं, मैं मान सकता हूं कि मेरा भगवन यह है और आप भी मान सकते हैं कि आपका पैगंबर वो है।
अब जब हर आदमी अपनी मान्यता के हिसाब से चलेगा तो लड़ाई तो होगी ही, ये ऐसी सी बात है कि एक ने सपने में देखा कि सेब नारंगी होता है, दूसरे ने देख लिया कि सेब हरा होता है, किसी तीसरे ने देख लिया कि सेब पीला होता है। असल में सेब क्या है, यह किसी ने नहीं देखा। पर सपने तीनों ने देखे हैं तो तीनों उठ के लड़ रहे हैं कि सेब का असली रंग क्या होता है? असलियत में सेब होता भी है कि नहीं, यह भी किसी ने नहीं देखा। पर सपना तीनों ने देख लिया है।
जब तक धर्म का अर्थ होगा विश्वास, आस्था या बिलीफ, तब तक धर्म का मतलब ही यही होगा- लड़ाई।
अब वैसे तो आज जो युद्ध चल रहा है, इस्लाम में और यहूदी मत में कायदे से यह लड़ाई होनी ही नहीं चाहिए क्यूंकि दोनों मत एक दूसरे के बहुत पास के हैं, दोनों ही अब्राहमिक धारा से आते हैं, यहूदियों के जो पैगंबर हैं उनको इस्लाम भी स्वीकारता है, पर फिर भी लड़ाई हो रही है। क्योंकि दोनों आस-पास के तो हैं लेकिन एक नहीं है, दोनों ही जिन जगहों को पवित्र मानते हैं, वो भी बिल्कुल आस-पास की है पर एक नहीं हैं तो लड़ाई हो गई।
मान्यताएं एक, फिर भी लड़ाई
येरुसलेम है, उसको लेकर के बड़ी मार-पीट मची है, उसमें सिर्फ यहूदियों की और मुसलमानों की ही आस्था नहीं है, उसमें ईसाइयों की भी आस्था है। अब एक ही शहर है जिसको तीनों पवित्र मानते हैं लेकिन फिर भी तीनों लड़े हुए हैं आपस में और ऐसा नहीं है कि सिर्फ इस्लाम की ही यहूदियों से नहीं बनी है आप अगर अतीत में जाएंगे तो ईसाइयों और यहूदियों की भी नहीं बनी है जबकि ये तीनों एक ही जगह से आ रहे हैं।
जो इनका केंद्रीय विश्वास है, वो एकदम एक है लेकिन फिर भी भिन्न मान्यताओं के कारण, इनकी आपस में तकरार है। जहां कहीं भी खेल मानने का होगा वहां पर तो लड़ाई होनी ही होनी है। लड़ाई सिर्फ एक तरीके से नहीं हो सकती कि खेल मानने का नहीं, सिर्फ जानने का हो।
जब धर्म का अर्थ हो जाएगा जिज्ञासा, तब धर्म एकता का स्रोत बन जाएगा। और जब तक धर्म का अर्थ होगा मान्यता, तब तक धर्म के नाम पर फसाद के अलावा कुछ होना सम्भव है ही नहीं। आप सोच के देखो न मैं अपने एक भगवान में मान्यता रखता हूं और मेरे भगवान एकदम गोरे हैं और आप एक दूसरे भगवान में मान्यता रखते हो जो भूरे दिखते हैं।
अब मान लीजिए मैं और आप दोनों ही मूर्ति पूजा में विश्वास रखते हैं। आपने एक भूरी मर्ति बना दी जो मेरे हिसाब से गोरी होनी चाहिए थी तो मैं अभी उसके आगे सर नहीं झुका पाऊंगा दिल से, क्योंकि मेरे हिसाब से भगवान तो गोरे हैं। और इससे आपकी आस्था को चोट लगेगी, और जब आपकी आस्था को बार बार चोट लगेगी तो आप मुझे चोट दोगे और मैं और ज़्यादा आपके भगवान को बुरा भला बोलूंगा। जहां बुरा भला बोला नहीं कि आप मेरी हत्या कर दोगे।
फिर मेरी हत्या के बाद जो मेरे जैसे और गोरे भगवान को मानने वाले लोग हैं वो आपकी जान के दुश्मन बन जाएंगे और हत्या का खूनी खेल आगे बढ़ता ही जाएगा।
सत्य और सत्य एक हो सकते हैं, एक ही होंगे सदा लेकिन कल्पना और कल्पना एक हो सकते हैं क्या कभी? कभी भी नहीं, धर्म के नाम पर हमने किस्से कहानियां चला दी हैं और सबके पास अपने अलग अलग किस्से हैं।
कहानियों का, विश्वासों का, कोई प्रमाण तो हो नहीं सकता तो जिसको जो मानना है, वो मान सकता है। सब आपस में अपना सर फोड़ेंगे, यही चलेगा सब तरफ। वैज्ञानिक भी आपस में इतना नहीं लड़ते क्योंकि उनकी बात तथ्यों पर आधारित होती है, उनमें आपस में बहस होती भी है तो तार्किक होती है।
पर दो इंसानों या समुदायों या देशों में ऐसा नहीं है क्योंकि उनके पास बस विश्वास है। अब विश्वास तो कोई किसी भी चीज में कर सकता है। मैं उड़ते हुए घोड़े में विश्वास कर सकता हूं, तो हो सकता है कि आपका विश्वास उड़ते हुए गधे में हो, तो लो हो गई जंग शुरू।
तथ्य भली भांती जानते हैं कि ना घोड़ा उड़ सकता है और ना ही गधा, पर हमने धर्म के शब्दकोष में से जिज्ञासा जैसा शब्द ही गायब कर दिया है।
इजराइल-हमास युद्ध की बात
इजराइल-हमास युद्ध भी बाहर से देखो तो बहुत बड़ा युद्ध दिख रहा है लेकिन उसके आधार में यह बच्चों वाली बातें ही हैं। बिल्कुल बच्चे घमू रहे हैं, अपनी अपनी कॉमिक्स लेकर, एक के पास टार्जन की कॉमिक्स है तो दूसरे के पास इन्रजाल कॉमिक्स है और दोनों लड़े हुए हैं कि सुपर हीरो कौन सा सबसे बड़ा होता है। और एक दूसरे का सिर फोड़ रहे हैं।
इजराइल ने कहा कि गाजा को पूरा बंद कर देंगे, ना वहां पे खाना जाने देंगे, ना वहां पर बिजली जाने देंगे, ना पानी जाने देंगे। और दूसरी ओर ये जो हमास वाले हैं, इन्होंने रातों-रात पांच हजार रॉकेट चला डाले। अभी भी रॉकेट डाल रहे हैं, उसके अलावा ये लोग बॉर्डर से अन्दर घुस गए इजरायल में और वहां पर घरों में, अस्पतालों में, बच्चों और महिलाओं को शिकार बना कर के अपनी नफरत दिखा रहे हैं।
क्यों है इतनी क्रूरता? क्योंकि धर्म आपकी सबसे बड़ी पहचान आपके परमेश्वर, आपके भगवान से बना देता है, आपकी अपनी हस्ती कुछ रहती ही नहीं। और जब आपके धर्म पर कोई आक्षेप करता है तो वो बात आपको अपनी मौत जैसी लगती है। और जब आपको अपनी मौत का खतरा आएगा तो फिर आप महा-क्रूर हो सकते हो।
धर्म का वास्तविक उद्देश्य होता है इंसान को उसके बंधन से और दुःख से आजाद करना और जब धर्म वास्तविक नहीं होता, आपको आनंद नहीं दे पाता तो आप चिढ़े-चिढ़े घूमते हो क्योंकि सब कुछ पालन करने के बाद भी भीतर से कोई त्रिप्ती शांति मिल नहीं रही होती। ऐसे में कोई आ करके थोड़ा आपको कोच दे, थोड़ा आपके जो भी इष्ट हैं, उनको एक दो चुभती बातें बोल दे तो आप के भीतर तुरंत विस्फोट हो जाएगा, हिंसा ऐसे ही जन्म लेती है।
यह सब कल्पना पर आधारित भावनाएं हैं बस, उससे ज्यादा कुछ नहीं। लेकिन जब इन तथाकथित धार्मिक भावनाओं पर ठेस पहुंचती है तो फिर आप अति उग्र और हिंसक हो जाते हो क्योंकि वो ठेस धार्मिक भावना पर नहीं, आपके अस्तित्व के केंद्र पर पहुंची है।
जब तक धर्म का यही सब मतलब है, तब तक धर्म रहेगा ही झगड़े फसाद का अड्डा। हमें धर्म चाहिए जो कहता हो पूछो, पूछो, और जो हम बता दें, उसको स्वीकार मत कर लेना उसको फिर परखो, परीक्षण करो, प्रयोग करो और ये करके फिर प्रश्न करो।
हमें प्रश्न-प्रयोग-परीक्षण पर आधारित धर्म चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति की बात हो उसमें, न कि सिर्फ कुछ महान लोगों की।
धर्म का आधार दर्शन
धर्म का अर्थ होना चाहिए जानने की कोशिश, ये मामला क्या है? धर्म के आधार में हमेशा दर्शन होगा, मान्यताएं या कहानियां नहीं। कहानियों के आधार में थोड़ी कोई फिलोसॉफी जन्म लेती है।
तुम्हारी हर बात के केंद्र में आधारभतू कोई फिलोसॉफी होनी चाहिए, अगर वो नहीं है, तो फिर ये धर्म कहां से आ गया। कई धार्मिक किताबों की शुरुआत ही यहीं से होती है कि फलानी बात है, इसको मान लो बस, अब जब मान ही लिया तो अब आगे के लिए कोई जिज्ञासा की सम्भावना तो शेष छोड़ी ही नहीं।
पर मानने का काम तो मशीन भी कर सकती है, इंसान तो है ही वो जो प्रश्न पूछे पर आपने तो पहले ही पूछने से मना कर दिया।
कल्ट में और धर्म में यही अंतर होता है कि कल्ट माने मानो और धर्म माने जानो। जहां मानने के लिए मजबूर किया जा रहा है, उसको धर्म बोल क्यों रहे हो, वो सिर्फ एक कल्ट है। धर्म का अर्थ होता है, वो जो आपको दोबारा आपके केंद्र की ओर ले जाए।
और असली केंद्र बोलते किसको हैं? उसके लिए आपको वेदांत की ओर आना पड़ेगा। मैं वेदांत की बात इसलिए नहीं करता कि मैं हिन्दू घर में पैदा हुआ, बल्कि इसलिए कि वेदांत जिज्ञासा को सबसे ज्यादा सम्मान देता है। इसलिए आप लोगों तक वेदांत लाने का प्रयास करता रहता हूं।
वास्तविक धार्मिक आदमी बदले और प्रतिक्रिया की आग में जलता नहीं है। और न ही उसको बहुत बुरा लग जाता है अगर उसके धर्म के बारे में किसी ने चार बातें बोल दी क्योंकि वो सत्य जानता है, इसलिए नहीं जानता कि किताब में लिखा है, इसलिए जानता है क्योंकि उसने स्वयं प्रश्न प्रयोग परीक्षण करके सब जाना है।
धर्म वो है जो मुझे प्रेरित कर रहा है, मेरे भीतर जाने को, मेरी ही हस्ती को खोज कर लाने को।
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