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पंछी और हम: ग्रासलैंड का दुर्लक्षित निवासी, कहानी सामान्य वन लटोरा की 

Wed, 26 May 2021 11:13 AM IST
Harshda Kulkarni हर्षदा कुलकर्णी
Updated Wed, 26 May 2021 11:13 AM IST
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interesting facts about Common Woodshrike
इसका नाम है "सामान्य वन लटोरा" या फिर इसे "वन लटूषक" भी कहा जाता है। - फोटो : भाग्यश्री कुलकर्णी 

सूर्योदय और सूर्यास्त दोनों ही रंगो से भरे और अविस्मरणीय होते है। प्रभात का लाल रंग का परचम लहराता आसमान और श्याम का डूबता सूरज दोनों ही लुभावने पर दोपहर के आग उगलते सूरज का क्या? किसी घने छायादार वटवृक्ष के नीचे सामने के कलकल बहते पानी की आवाज़ सुनते हुए बितायी हुई दोपहर मुझे उतनी ही रमणीय लगती है जितने की सुबह और शाम। निसर्ग में कुछ भी बिना काम का, अनाकर्षक होता ही नहीं। कभी-कभी ये समझ ने के लिए हमें बस सही वक़्त पर सही जगह होना चाहिए होता है। 

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पक्षियों का भी वही है। माना की रंग बिरंगे पक्षी अधिक आकर्षक, प्यारे होते है। देखते ही मन को छू लेने वाले होते है, परन्तु कुछ पक्षी होते है उस दोपहर जैसे, उदास से, ज़रा कम चमक दमक वाले, पर अगर आप सही जगह हो तो पता चलता है कि इनपक्षियों की खूबसूरती उनके रंगो में नहीं पर उनके अनोखे व्यवहार में है 

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आज मैं बताने वाली हूं एक ऐसे ही पक्षी के बारे में जो दिखने में तो कुछ ख़ास नहीं है। ना ही इसके पास हवा में लहराते खूबसूरत लम्बे पर है न ही मोर की तरह मनमोहक रंग। इसका नाम है "सामान्य वन लटोरा" या फिर इसे "वन लटूषक" भी कहा जाता है। है न नाम से ही सामान्य। इसकी रहने की जगह भी ऐसी ही है।

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यह सामान्यतः ग्रास लैंड का रहवासी है। इसे खुले मैदान, खेत के पेड़, झाड़ी-झुरमुटों से आच्छादित घास के मैदान ही पसंद है। वैसे ही दिखने में भी सामान्य ही हैं। इसका रंग धूसर भूरा और पंख कुछ वैसे मटमैले रंग के पंख होते हैं। आंखों पर एक काली-सी पट्टी और आंखों के ऊपरी हिस्से में एक सफ़ेद-सी पट्टिका ऐसा रूप। उड़ता है तो लगता है सिर्फ़ एक धूसर छाया पेड़ों से होकर गुजरी हो न कुछ शान है न ही मिज़ाज और फिर भी मैं कहूंगी की है तो ये अनोखा! 

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मैंने अपनी दूरबीन से खोजबीन करते हुए आख़िर इस पक्षी को ढूंढ ही निकला। - फोटो : भाग्यश्री कुलकर्णी 

मुझे याद है एक सुबह जब मैं शहर के बाहर वाली एक छोटी पहाड़ी पर घूमने गई थी। बेशक घूमने का मतलब मेरे लिए आसपास के पेड़ और पक्षी देखते-देखते खो जाना ही होता है, तो सुबह के सात-आठ बज रहे थे गर्मी का महीना था इसलिए सूरज ज़रा जल्दी ही अपनी बाहें फैलाकर पेड़ो के बीच से पगडंडी पर पिली-काली रेखाओं से भरी चटाई बुनने में लगा था मैं बिलकुल ही धीरे-धीरे आसपास के पेड़ों से आते पक्षियों के स्वरों को सुनके उनकी पहचान करने में लगी थी और अचानक से मैंने सुनी एक मधुर गूंजती हुई-सी वी व्ही वि वि? ऐसी थीड़ी सी प्रश्नार्थक लगने वाली ध्वनि और सहज ही मैं इस प्रश्नकर्ता को ढूंढने लगी, क्योंकि इस आवाज़ से मैं बिलकुल ही परिचित नहीं थी, पर बार-बार आने वाली यह मीठी-सी आवाज़ मुझे मानों इस आवाज़ का धनी खोजने पर मजबूर ही कर रही थी।

मैंने अपनी दूरबीन से खोजबीन करते हुए आख़िर इस पक्षी को ढूंढ ही निकला। अचरज की बात है क्योंकि मैंने तो सोचा था ऐसी प्यारी-सी आवाज़ किसी बड़े ही सुन्दर, मनमोहक रंग वाले पक्षी के कंठ से ही आ सकती है, पर सत्य तो यह था कि मटमैले भूरे रंग का यह सामान्य पक्षी ही इस मीठी-सी बोली का मालिक था, तो इस तरह हमारी पहली मुलाकात में ही इस पक्षी ने अपने अनोखेपन का परिचय मुझे दे ही दिया। 


अब इसके बाद इस पक्षी ने मानो ठान ही लिया की अब यह मुझ अनजानी की आंखों में अंजन डाल के ही दम लेगा। मैं तो सोचा करती थी की हरे, चित्तीदार, बादामी, गहरे लाल, दूध जैसे सफ़ेद वग़ैरह वग़ैरह, ऐसे ही रंग-बिरंगे पंछी ही तो शान होते है निसर्ग की। आख़िर ऐसे आकर्षक रंगछटाओं वाले पक्षी ही तो पक्षी प्रेमियों को लुभाते हैं।

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ऐसा अद्भुत सुन्दर पंछी पहले कभी देखा ही न था। - फोटो : भाग्यश्री कुलकर्णी

वाइल्डलाइफ़ फोटोग्राफर भी तो ऐसे ही पक्षियों की तलाश में होते हैं, परन्तु मुझे कहां पता था कि निसर्ग में कोई भी पक्षी, प्राणी यहां तक की कीटक भी कभी कम महत्त्व के नहीं होते। हर एक की अपनी जगह होती है और हर एक का अपना काम। 

तो बात है एक और सुबह की। अब जगह तो वैसी ही थी जैसे पहले वाले वाक्या में थी एक छोटी पहाड़ी उसके आसपास का घास पूस और कांटेदार झाड़ियों से बना ग्रास लैंड। यहां पर भी वैसी ही घास के बीच से गुजरती हुई पगडण्डी। आसपास थोड़़े से आकेशिआ और नीलगिरि के पेड़ और अन्य ग्रास लैंड के इलाकों में पाई जाने वाली झाड़ियां-झुरमुट आदि। किन्तु इस बार मौसम अलग था वर्षा ऋतु अपने चरम पर था और बारिश के बादलों ने आसमान में अपनी सुबह की हाजिरी लगाना शुरू कर या था।

सूरज कुछ काले बादलों के पीछे अपना मुंह छिपाए सोया था। अब पगडण्डी पर बस कुछ छोटे बारिश के छींटो की बुनकारी हो रख़ी थी। पेड़ हरे भरे थे और घास की चादर फीके हरे रंगो से रंग चुकी थी। अब फिर से वही वि-वि वि वि? की प्रश्नार्थक ध्वनि से वातावरण गुंजित हुआ और मैंने पेड़ की तरफ़ देखा तो इस बार इस आवाज़ का कर्ता एक अभी-अभी नीड़ छोड़ के उड़ना सीखने बाहर आया हुआ नन्हा-सा बच्चा था, अपने छोटे-से सफ़ेद, भूरे-चित्तीदार पंख फैला कर वह प्यारी-सी आवाज़ में उसके माता पिता को बुला रहा था। अब पता नहीं ये उस बारिश के मौसम का परिणाम था या उस मीठी आवाज़ का की मुझे वह लटोरे का चूजा, उसको खाना खिलने वाले उसके वे भूरे माता पिता सभी कुछ बड़ा ही विलोभनीय लगा। मानों मैंने ऐसा अद्भुत सुन्दर पंछी पहले कभी देखा ही न हों। 

उस दिन ने मेरा मतपरिवर्तन ही कर दिया। उस दिन के मैंने न सिर्फ़ पक्षियों के बोली पर बल्कि उनके व्यवहार, उनके उड़ने के तरीके, उनके खाने की विशेषताएं आदि चीजों पर भी ध्यान देना शुरू कर दिया। अब मुझे न सिर्फ़ चटक रंगों वाले पक्षी बल्कि थोड़े से बेरंगे से पक्षी भी उतने ही मनमोहक लगते हैं। 

और हां मैंने एक चिलचिलाती धूप वाली दोपहर को इस सामान्य वन लटोरा का पेड़ की कोपलों, मकड़ी की जालों से बना प्याली सदृश दिखने वाला नीड़ भी देखा, फिर मुझे पता चला की इसका यह बिना चटक रंगों वाला शरीर इसे छुपने में कितना मदद करता है। इस नीड़ में जब यह पंछी अपने अंडो पर बैठता है तो यह उस पेड़ की कांटेदार डाली की तरह लगता है, इसका रंग इसका छलावरण है। 

एक सामान्य-सा दिखने वाला पक्षी और फिर भी कितना अजीबोगरीब और अनोखा। मुझे हमेशा ही लगता है कि निसर्ग और पक्षियों से सिखने जैसा बहुत कुछ हैं। मुझे पता है पक्षी निरीक्षण करने की शुरुवात वैसे तो सभी पक्षियों के रंगों को देखके करते है पर अगर हम उन रंगो, आवांजो, उनकी उड़ान, उनके एक दूसरे से संपर्क करने के तरीके, उनके स्थलांतर से जुडी हुई रोचक और थोड़ी सी वैज्ञानिक जानकारी की दुनिया में झांक कर देखे तो मुझे लगता है हर एक पक्षी अनूठा ही लगने लगेगा और क्या पता मेरी तरह आप को भी दोपहर की धूप सुहानी लगनी लगे। 

लेखिका हर्षदा कुलकर्णी पक्षी प्रेमी तथा एक स्वयं-शिक्षित पक्षी निरीक्षक हैं। खुद एक वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर होने के साथ-साथ वह प्रकृति विषयक ब्लॉग तथा कविता लेखन में भी रुचि रखती हैं। 

यह श्रंखला 'नेचर कन्ज़र्वेशन फाउंडेशन (NCF)' द्वारा चालित 'नेचर कम्युनिकेशन्स' कार्यक्रम की एक पहल है। इस का उद्देश्य भारतीय भाषाओं में प्रकृति से सम्बंधित लेखन को प्रोत्साहित करना है। यदि आप प्रकृति या पक्षियों के बारे में लिखने में रुचि रखते हैं तो ncf-india से संपर्क करें। 

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