यादों में राकेश झुनझुनवाला: "बाजार में कोई किंग नही होता", जो किंग होता है उसको बाजार जल्दी देख लेता है..!
झुनझुनवाला ने जिस समय अपना करियर शुरू किया, उस समय उनके पास पैसे नहीं थे। अपने भाई के सहयोग से उन्हें 2 क्लाइंट मिले जिन्होंने झुनझुनवाला पर भरोसा दिखाया और 7.5 लाख का निवेश किया। यहीं से उनका करियर स्टार्ट हुआ।
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राकेश झुनझुनवाला, शेयर बाजार के धुरंदर और अनुभवी खिलाड़ी थे, उनका व्यक्तित्व हमेशा बाजार से सीखने का रहा। वो हमेशा कहते थे-
बाजार में कोई किंग नही होता और जो किंग होता है उसको बाजार जल्दी देख लेता है।
मुम्बई में साल 1960 के समय जन्में राकेश, जिनके पिता एक इनकम टैक्स अधिकारी रहे, बचपन से ही उनके मन में शेयर बाजार को समझने की जिज्ञासा थी। साल 1985 में अपनी सीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद जब उन्होंने स्टॉक मार्केट में अपना भविष्य आजमाया। वो दौर भी ऐसा था जिस समय भारत ग्लोबलाइजेशन और उदारीकरण की तरफ बढ़ रहा था। यह कॉर्पोरेट जगत में एक बड़ा बूम स्टार्ट होने वाला था।
झुनझुनवाला ने जिस समय अपना करियर शुरू किया, उस समय उनके पास पैसे नहीं थे। अपने भाई के सहयोग से उन्हें 2 क्लाइंट मिले जिन्होंने झुनझुनवाला पर भरोसा दिखाया और 7.5 लाख का निवेश किया। यहीं से उनका करियर स्टार्ट हुआ।
1986 में सबसे पहले मुनाफा उन्होंने टाटा टी में कमाया। 43 रु. पर उन्होंने 5000 शेयर खरीदकर उसको 3 महीने में 143 में बेचा। 5 लाख का प्रॉफिट उस समय बड़ा पैसा होता था। राकेश ने इसको पहचान लिया था कि निवेशक के तौर पर ये एक सही समय है और उनके जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग बना। 1989 में वीपी सिंह की सरकार आने वाला बजट और राकेश का नाम शेयर बाजार में पहली बार आया, उनका फोकस हमेशा से निवेश का रहा, वह भी लंबे समय के लिए।
1989 के बजट के बाद जहां सारा उद्योग जगत के दौर से गुजर रहा था, वहीं राकेश इसका उल्टा देख रहे थे। उन्होंने उस तेजी को पहचान लिया था। इसी दौरान एक समय आया हर्षद मेहता और केतन पारिख हर्षद मेहता स्कैम के कारण बाजार धराशाई हो गया और राकेश उस समय भी बाजार की नब्ज को समझते हुए चल रहे थे। कही पर उन्होंने कहा भी था कि अगर यही यूफोरिया एक महीने और चल जाता तो वो दिवालिया भी हो सकते थे पर किस्मत ने उनका साथ दिया और बिग बुल का सितारा फिर चमकने लगा।
कुछ समय बीता, अब उनका कारोबार भी बड़ा हो चला था। उन्होंने एक कम्पनी की स्थापना की जिसका नाम था रेयर एंटरप्राइजेज। ये कम्पनी उन्होंने अपने और पत्नी के नाम पर 2003 में शुरू की थी।
साल 2002 से 2004 के बीच का राकेश बाजार में बड़ी तेजी को देख रहे थे और निवेशक के तौर पर बाजार में मजबूती के साथ जुड़े रहे। उनको बाजार के छोटे गिरावट से कोई फर्क नही पड़ता था। अब उन्होंने अपने निवेश के लिए टाइटन को चुना जो कि टाटा ग्रुप की कम्पनी थी।उन्होंने 3रु. के भाव पर 6 करोड़ शेयर में निवेश किया औऱ टाइटन 2022 तक 2300 पहुंच गया।
वर्तमान में राकेश ने अपने पोर्टफोलियो को पूरी तरह से विविधता वाला कर दिया था, मतलब हर एक कम्पनी में राकेश का इन्वेस्टमेंट रहा। राकेश हमेशा इकॉनमी की ग्रोथ पर फ़ोकस करते थे, उनका मानना था कि बाजार में छोटे-मोटे झटके लग सकते है लेकिन वह लंबे समय में बाजार को बहुत ऊंचाई पर देखते थे।
राधाकिशन दमानी को अपना गुरु मानने वाले राकेश ने कोविड का दौर भी बखूबी देखा, कई जगह पर उन्होंने कहा भी कोविड कोई कैंसर की तरह नहीं है। वो बोलते थे कोविड एक फ्लू की तरह है और आने वाला भविष्य सिर्फ और सिर्फ भारत में निवेश का है, भारत मे ग्रोथ आना अभी और बाकी है।
अंत में यही कहना है , मौत के आगे सब छोटा है और जीवन का अटल सत्य यही है, जो आया है वो जाएगा जरूर।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।