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उत्तराखण्ड: मानव और वन्यजीव बने एक दूसरे के लिए संकट

Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Mon, 05 Dec 2022 04:33 PM IST
उत्तराखंड अपनी अनूठी जैव-विविधता
उत्तराखंड अपनी अनूठी जैव-विविधता - फोटो : Pixabay
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हिमालयी राज्य उत्तराखण्ड में मानव-वन्यजीव संघर्ष एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। राज्य वन विभाग की भारी भरकम मशीनरी इस अति गंभीर समस्या के आगे असहाय नजर आ रही है। वन्यजीवों से मानव जीवन खतरे में पड़ जाने के कारण पहाड़ों से पलायन भी बढ़ता जा रहा है और गांव निरन्तर खाली होते जा रहे हैं। जिन गावों में थोड़े बहुत लोग टिके हुए भी हैं उनका जीवन गुलदार, भालू, बंदर एवं सुअर जैसे वन्य जीवों ने संकट में डाल दिया है।



उत्तराखण्ड विधानसभा में 29 नवम्बर को एक प्रश्न के उत्तर में वनमंत्री ने गत तीन वर्षों में वन्य जीवों द्वारा 161 लोगों के मारे जाने की बात कही। इनमें सर्वाधिक मानव मौतें गुलदार के हमलों से बताई गई। जाहिर है वन्यजीवों से मानव जीवन के लिए सर्वाधिक खतरा पहाड़ों में ही है, क्योंकि पहाड़ों में सामान्यतः हाथी और टाइगर जैसे बड़े जीव नहीं चढ़ते। हालांकि अब हाथी और टाइगर भी पहाड़ चढ़ने लगे हैं, क्योंकि पलायन के कारण गांव वन्यजीवों के लिए नए आवास बनते जा रहे हैं।

 

एक रिपोर्ट के अनुसार सन् 2000 से लेकर 2015 तक उत्तराखण्ड में 166 तेंदुए और 16 बाघ मानवभक्षी घोषित कर उन्हें मारने के आदेश जारी हो चुके थे।

 


भरा पूरा वन्यजीव संसार सुरक्षित नहीं

उत्तराखंड अपनी अनूठी जैव-विविधता के लिए प्रसिद्ध है। राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में भौगोलिक और जलवायु विविधता के कारण हिमालय से लेकर तराई के मैदानों तक विभिन्न प्रकार के वन पाए जाते हैं। राज्य में मौजूद जैव विविधता के कारण कुल भौगोलिक क्षेत्र का 12 प्रतिशत संरक्षित क्षेत्र है जिसमें 6 राष्ट्रीय उद्यान, 7 वन्यजीव अभयारण्य, 4 संरक्षण और 1 बायोस्फीयर रिजर्व शामिल हैं। उत्तराखंड पौधों और जानवरों की दुर्लभ प्रजातियों का घर है, जिनमें से कई अभयारण्यों और भंडारों द्वारा संरक्षित हैं।

 

अध्ययनों के अनुसार राज्य में 102 स्तनपायी, 600 पक्षी, 19 उभयचर, 70 सरीसृप और 124 मछली की प्रजातियां पाई जाती हैं। इन उपर्युक्त प्रजातियों में विश्व स्तर पर लुप्तप्राय प्रजातियां हैं, जिनमें बाघ (पैंथेरा बाघ), एशियाई हाथी (एलीफस मैक्सिमस), गुलदार (पैंथेरा पार्डस), कस्तूरी मृग (मॉस्कस क्राइसोगास्टर), हिम तेंदुआ (पैंथेरा यूनिसियल), मोनाल (लोफोफोरस इम्पेजनस) शामिल हैं ) आदि।

 


मानव-वन्यजीव संघर्ष के हॉटस्पॉट 

उत्तराखंड में वनों के अन्दर या नजदीक की बस्तियों में मवेशी उठाने और मानवों पर तेंदुओं के हमले की घटनाएं सालाना बढ़ जाती हैं। टिहरी जिले में देवप्रयाग-कीर्तिनगर रेंज और पौड़ी जिले में पौड़ी रेंज उत्तराखंड में मवेशी उठाने और मानव मृत्यु के लिए सबसे अधिक संवेदनशील माने गए हैं।

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भारतीय वन्यजीव संस्थान के मनोज अग्रवाल आदि वैज्ञानिकों के शोध पत्र के अनुसार पौड़ी जिले में समुद्रतल से 900 मीटर से लेकर 1500 मीटर की ऊंचाई वाला क्षेत्र मानव गुलदार संघर्ष के लिए सबसे अधिक संवेदनशील है। जिले में 400 से लेकर 800 मीटर और 1600 से लेकर 2300 मीटर की ऊंचाई तक यह खतरा बहुत मामूली है जबकि 2300 मीटर से ऊपर और 400 मीटर से नीचे कोई मानव-गुलदार संघर्ष नहीं पाया गया है।

शोधपत्र के अनुसार नरेंद्र नगर वन प्रभाग गढ़वाल हिमालय में जैव विविधता का एक महत्वपूर्ण भंडार है। यहां जंगल में पादप विविधता के चलते जंगली जानवरों के बड़े समूहों को अनुकूल स्थिति मिलती है। इस वन प्रभाग के 3 रेंज मानिकनाथ, शिवपुरी और सकलाना के साथ-साथ हाल ही में बनाए गए नरेंद्रनगर और कीर्तिनगर रेंज हाथियों, बाघों, तेंदुओं, जंगली सुअरों, बंदरों, हिरणों आदि की आबादी के लिए मुफीद माने जाते हैं।  इन वन्यजीवों की निकटता से आसपास की आबादी और वन्यजीवों का संघर्ष बढ़ जाता है। 


ऑल वेदर रोड ने भी बढ़ाया संघर्ष

वन्यजीव संस्थान के डी.एस. मीना और डीपी बुलानी आदि के एक अध्ययन के अनुसार चार धाम मार्ग के चौड़ीकरीण एवं रेल आदि परियोजनाओं के कारण भी वन्य जीवन प्रभावित हुआ है। मार्ग के लम्बे समय तक अवरुद्ध रहने से भी गुलदार जैसे वन्य जीवों को आसपास की बस्तियों में घुसने की आजादी मिली है। 

जंगल का जीवन
जंगल का जीवन - फोटो : Pixabay
बीस सालों में 1396 तेंदुए मारे गए डी.एस. मीना, डीपी बुलानी, एम.एम. बिष्ट बौर डीएस. पुण्डीर के शोध पत्र ‘‘ह्यूमन वाइल्ड लाइफ कन्फिलिक्ट...’’ के अनुसार उत्तराखण्ड में सन् 2000 से लेकर 2020 तक लगभग 1396 तेंदुए मारे गए हैं। इनकी मौत का कारण अवैध शिकार, दुर्घटना, जंगल की आग के साथ जलना, सड़क या रेल दुर्घटना, आदमखोर होने के कारण मारा जाना और आपसी संघर्ष माना गया।

वन्य जीव संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार इनमें 648 गुलदार या तेंदुए प्राकृतिक मौत से, 152 दुर्घटनाओं में, 65 को मानव भक्षी घोषित होने पर मारा गया, 41 शिकारियों द्वारा अवैध शिकार से तथा 212 अज्ञात कारणों से मारे गए। वर्ष 2000 के बाद से नरेंद्रनगर वन प्रभाग में कुल  645 घटनाओं में 740 पशुओं की मौत साथ मानवों के घायल होने के लगभग 126  मामले और 36 मानव मृत्यु की घटनाएं दर्ज हुई हैं।

डब्ल्यूआईआई की रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखण्ड में 1 जनवरी 2020 से 30 नवंबर 2020 तक विभिन्न कारणों से लगभग 121 तेंदुए मृत पाए गए हैं। इसके अलावा, मानव वन्यजीव संघर्ष में, तेंदुए भी या तो अवैध रूप से या उत्तराखंड में आदमखोर घोषित होने के कारण मारे गए। 


तेंदुओं का भी हो रहा बड़े पैमाने पर संहार

उत्तराखंड में  मानवों के साथ ही तेंदुओं की मृत्युदर में भी वृद्धि देखी गई, जो मुख्यरूप से प्राकृतिक मौतों, अवैध शिकार, दुर्घटनाओं, घोषित खतरों, जलाए जाने, जंगल की आग, खाद्य विषाक्तता, आपसी लड़ाई और सड़क दुर्घटनाओं के कारण हुई।
 
डाउन टू अर्थ की एक रिपोर्ट के अनुसार सन् 2000 उसे लेकर 2015 तक उत्तराखण्ड में 166 तेंदुए और 16 बाघ मानवभक्षी घोषित कर उन्हें मारने के आदेश जारी हो चुके थे। टाइम्स आफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार सन् 2000 से लेकर 2019 तक राज्य में 60 मानवभक्षी  मारे गए। इनमें 4 बाघ और 56 तेंदुए थे।

उत्तराखण्ड के जिम कार्बेट कहे जाने वाले लखपत सिंह रावत अकेले ही अब तक 53 मानवभक्षी मार चुके हैं, जिनमें 51 तेंदुए और 2 बाघ शामिल हैं। उनके अलावा जॉय हुकिल ने भी कई मानवभक्षी मारे हैं। भारतीय वन्यजीव संस्थान के अध्ययनों से पता चलता है कि सह-अस्तित्व की रणनीतियों के लिए सार्वजनिक जागरूकता, चराई पर्यवेक्षित चराई, उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों के बारे में जागरूकता, बचाव दल द्वारा त्वरित प्रतिक्रिया, मानव बस्तियों के आसपास पौधों की अनावश्यक छतरी या झाड़ियों को हटाने से यह संघर्ष रोका या कम किया जा सकता है।

पहाड़ी राज्य होने कारण उत्तराखण्ड में कुछ अन्य राज्यों की तुलना में मानव-हाथी संघर्ष अपेक्षतया कम है फिर भी राज्य के मैदानी क्षेत्रों में यह संघर्ष एक गंभीर समस्या बनी हुई है। विशेष रूप से नरेंद्रनगर वनप्रभाग के शिवपुरी रेंज में और हरिद्वार वन प्रभाग के साथ ही पौड़ी वन प्रभाग के कोडिया तल्ला और मल्ला सहित गोहरी वन प्रभाग जो मानव और हाथी संघर्ष के लिए सबसे अधिक संवेदनशील क्षेत्र हैं।

पिछले 3 सालों में उत्तराखण्ड में 28 लोग हाथियों द्वारा मारे जा चुके हैं तथा बड़े पैमाने पर हाथियों द्वारा फसलें नष्ट की जाती रही हैं। जबकि टाइम्स ऑफ इंडिया (23 नवम्बर 2020) की रिपोर्ट के अन्दर उत्तराखण्ड में विभिन्न कारणों से 2015 से लेकर 2020 तक 170 हाथी मारे जा चुके थे। इस दौरान 45 लोग हाथियों द्वारा मारे गए। अकेले 2019 में उत्तराखण्ड में 24 हाथियों की मौत हुई जिनमें कई हाथी रेल से कट कर मरे।

मानव वन्यजीव संघर्ष का मुख्य प्रभाव मानव और पशुधन की मौत और घायल होने के साथ ही लोगों की फसल को नुकसाान के रूप में सामने आता है। उत्तराखंड में, हर साल, बड़ी संख्या में लोग और जानवर घायल हो जाते हैं और मानव और वन्य जीवन संघर्षों के कारण मारे जाते हैं। 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें [email protected] पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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