विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: अफगानिस्तान का सिने-इतिहास और फिल्मों की दुनिया
अमीर हबिबुल्लाह खान ने 1901-1919 तक अफगानिस्तान पर शासन किया और उन्होंने ने ही इस देश का फिल्म से परिचय कराया, मगर यह परिचय दरबार तक सीमित था। जनता के लिए यह 1923-24 में ही सुलभ हुआ जब पहली बार ‘मैजिक बॉक्स’ या ‘मैजिक लालटेन’ के माध्यम से मूक फिल्म दिखाई गई।
विस्तार
अफगान हमारा पड़ोसी देश है, जिससे हमारा बहुत पुराना संबंध है। अफगान के विषय में फिल्मी जानकारी पहली बार एक फिल्म के माध्यम से हुई। फिल्म का नाम है, ‘एस्केप फ़्रॉम तालिबान’ 2003 की उज्जवला चटर्जी द्वारा निर्देशित फिल्म सत्य घटना पर आधारित है। सुस्मिता बनर्जी ने एक अफगान से विवाह किया और वे वहां बस गई। फिर छ: साल उनके साथ लोमहर्षक घटनाएं हुई और वे किसी तरह वहां से बच निकलीं। मगर बच नहीं पाईं 2013 में उन्हें मार डाला गया।
फिल्म में मनीषा कोइराला, नवाब खान, विनीत मलिक, पृथ्वी जुत्सी एवं अली खान ने बहुत अच्छा अभिनय किया है। इसी फिल्म में पहली बार अफगान का लोकेशन देखा। मगर यह फिल्म अफगानिस्तान की नहीं थी और हम बात कर रहे हैं अफगान सिने-इतिहास की।
1923-24 में लोगों के लिए उपलब्ध हुआ सिनेमा
अमीर हबिबुल्लाह खान ने 1901-1919 तक अफगानिस्तान पर शासन किया और उन्होंने ने ही इस देश का फिल्म से परिचय कराया, मगर यह परिचय दरबार तक सीमित था। आम जनता तब तक इसे न देख सकी। जनता के लिए यह 1923-24 में ही सुलभ हुआ जब पहली बार ‘मैजिक बॉक्स’ या ‘मैजिक लालटेन’ के माध्यम से मूक फिल्म दिखाई गई।
अफगानिस्तान में बहुत बाद में 1946 में जाकर पहली फिल्म ‘लव एंड फ़्रेंडशिप’ का प्रोडक्शन हुआ। एक सूत्र के अनुसार 1949 में पहली अफगान फिल्म भारत में बनी और इसके बाद काबुल में कुछ केंद्र भारतीय फिल्म दिखाने लगे। शाह अमानोल्ला ने 1966 में अमेरिका की सहायता से अफगान फिल्म सिनेमेटिक सेंटर स्थापित किया और इस तरह अफगानिस्तान में सुसंगठित तरीके से फिल्म बनाने का कार्य प्रारंभ हुआ।
मगर 1978 में कम्युनिस्ट तख्तापलट के बाद अमेरिकी सहयोग पूरी तरह रुक गया तथा रूस की सहायता प्राप्त होने लगी। सरकारी फिल्म सेंटर स्थापित होने के साथ वहां डॉक्यूमेंट्री बननी शुरू हुई। शूटिंग के बाद की प्रक्रिया के लिए रील भारत, इंग्लैंड, सोवियत यूनियन भेजी जाती। फिल्में फारसी (दारी) अथवा पश्तो भाषा में बन रही थीं।
1970 में एक बार सरकार ने सिनेमा-त्रयी दिखाई। इसमें ‘तलबगार’, ‘शब ए जुमा’ तथा ‘द स्मगलर्स’ तीन फिल्में ‘द टाइम्स’ शीर्षक के अंतरगत दिखाई गईं। तीनों फिल्मों को बनाने वाले तथा अभिनेता भिन्न थे। पहली ‘तलबगार’ (स सूटर) 39 मिनट लम्बी फिल्म में एक दुष्ट आदमी एक लड़की का शादी के लिए हाथ पाने हेतु तमाम जतन करता है मगर उसका छल लड़की के परिवार के सामने खुल जाता है।
31 मिनट की दूसरी फिल्म एक आदमी तथा उसकी होने वाली पत्नी के परिवार के बीच एक डिनर के इंतजाम को लेकर चलने वाले नाटक से संबंधित है।
तीसरी फिल्म इनमें सबसे लंबी थी और जैसा कि नाम है यह एक स्मगलर गैंग के बारे में है, जो एक बड़ा प्लान बना रहे हैं, लेकिन राष्ट्रीय पुलिस उसे असफल कर देती है। इन फिल्मों की विशेषता थी कि ये अफगानिस्तान सूचना एवं संस्कृति मंत्रालय द्वारा प्रड्यूस की गई थीं।
प्रसिद्ध सिने-निर्देशक अब्दुल लतीफ अहमदी
आठवें दशक में इंजीनियर लतीफ, हुमायूं मोरोवत, सदीग बारमाक, अहद जोवन जैसे सिने-निर्देशक अफगानिस्तान में हुए। इंजीनिरिंग की पढ़ाई करने के कारण लतीफ को यह नाम मिला। उनका असली नाम अब्दुल लतीफ अहमदी है। 1950 में काबुल में जन्मे लतीफ अफगानिस्तान का सर्वाधिक प्रसिद्ध सिने-निर्देशक है। वे निर्देशन के अलावा लेखन तथा सिनेमाटोग्राफ़र हैं। उनकी ‘परिंदे है महाजिर’ तथा ‘सबूर, द सोल्जर’ फिल्म को नामांकन मिला था।
निर्देशक, लेखक हुमायूं मोरोवत की फिल्मों के नाम ‘द ग्रीन कोल’ (1990), ‘एन अप्पल फ़्रॉम पैराडाइज’ (2010) तथा ‘फ़्लाइट विदआउट विंग्स’ (2014) हैं।
अफ़गानिस्तान में भारतीय फिल्म प्रेमी हैं, मगर वहां सिनेमा हाल में भारतीय फिल्म नहीं दिखाई जाती है। हां, लोग अंडरग्राउंड वीडियो पार्लर में इन्हें खूब देखते हैं। दूसरी ओर अफगान संगीत का प्रभाव भारतीय संगीत पर है।
इस सदी की बात करें तो मरियम घानी अफगान सिने-संसार में एक बड़ा नाम है। इस विजुअल आर्टिस्ट, लेखक, लेक्चरर, प्रड्यूसर, फिल्म मेकर ने 2019 में फिल्म ‘व्हाट वी लेफ़्ट अनफिमिश्ड’ बनाई है। एक घंटा ग्यारह मिनट की यह फिल्म उनकी पहली फीचर फिल्म है। यह फिल्म कम्युनिस्ट शासन (1978-1991) के दौरान अफगानिस्तान में फिल्म बनाने की कहानी कहती है, जिसमें पांच ऐसी फिल्मों को लिया गया है, जिनके बनाते समय इन्हें बनाने वालों की जिंदगी पर बन आई थी।
वे सत्ता के निशाने पर थे, मगर फिल्म बनाने का काम पागलपन के साथ कर रहे थे। ये पांच फिल्में हैं, ‘दि एप्रिल रिवोल्यूशन’, ‘डाउनफ़ॉल’, ‘द ब्लैक डाइमंड’, ‘रॉन्ग वे’ तथा ‘एजेंट’। मरियम घानी शॉट फिल्म भी बनाई 22 मिनट की ‘ए ब्रीफ़ हिस्ट्री ऑफ़ कोलाप्सेस’ (2012) एवं ‘द फ़ायर दिस टाइम’ (2022)।
अफगानिस्तान में कभी बड़ी मात्रा में फिल्में नहीं बनीं। फिल्म निर्माण में यहां बार-बार बाधाएं आती रहीं। एक समय यहां ‘द फोरबिडेन रील’, ‘ए फ़्लिकरिंग ट्रुथ’ जैसी फिल्में बनीं। इस सदी की यहां बनने वाली अच्छी और प्रसिद्ध फिल्मों में से एकाध को देखना रोचक होगा।
डॉक्यूमेंट्री ‘चिल्ड्रेन ऑफ काबुल’
2011 में एक डॉक्यूमेंट्री आई ‘चिल्ड्रेन ऑफ काबुल’। 25 मिनट की इस फिल्म को जॉन बौघर ने बनाया था। इसमें युद्ध से क्षत-विक्षत अफगानिस्तान की सड़कों और बाल श्रमिकों की त्रासदी को परदे पर दिखाया गया है। ओमिद, सैनबार, यास्मिन तथा फ़ैयाज को परिवार की आय केलिए कार धो रहे हैं, कचड़ा बीन रहे हैं, लोहा पीट रहे हैं, खाना बेच रहे हैं।
युद्ध और आर्थिक कठिनाइयों को बच्चे झेल रहे हैं। देश का भविष्य कैसा होगा? यही इस फिल्म का प्रतिपाद्य है। रोया सदात निर्देशित 83 मिनट की फिल्म ‘ए लेटर टू द प्रेसीडेंट’ (2017) एक निम्न सरकारी अधिकारी सौरेया को एक स्त्री को गांव के दबंग से बचाने के अपराध में जेल में डाला गया है वह सींकचों के पीछे से अफगान के राष्ट्रपति से सहायता की गुहार का पत्र लिखती है।
2018 की डॉक्यूमेंट्री ‘ए थाउजंड गर्ल्स लाइक मी’ (76 मिनट) में सराह मानी ने एक 23 साल की स्त्री को उसके पिता द्वारा बलत्कृत होते दिखाया है। वह जनता के सामने नेशनल टीवी पर अपने शोषण की बात का खुलासा करती है और शोषणकर्ता को बचाने वाले अफगानी कानून पर प्रकाश डालती है। यह अभिनय नहीं है, अत: शोषिता खैतेर ने स्वयं मुख्य काम किया है। 2020 में ‘द रेड बाइसिकल’ (फ़ाजिला अमीरी) तथा ‘काबुल गर्ल्स’ दो उल्लेखनीय फिल्में यहां बनी हैं।
‘द रेड बाइसिकल’ 13 मिनट की क्राइम शॉर्ट फिल्म है, जबकि ‘काबुल गर्ल्स’ (सैयद मसूद एस्लामी, मासूमा इब्राहिमी) ड्रामा फिल्म की लम्बाई 73 मिनट है।
आज के अफगानिस्तान में अवस्थित पहली फिल्म में एक लाल साइकिल दो अफगानी औरतों के लिए दुनिया की खिड़की खोलती है। जबकि दूसरी फिल्म में चार औरतों में एक बात साझा है, चारों अपने जीवन की कठिनाइयों की मारी हैं। वे काबुल आई हैं और किसी-न-किसी तरह ये चारों एक-दूसरी से जुड़ी हुई हैं।
आशा है अफगानिस्तान जल्द ही ढ़ेर सारी अच्छी फिल्में बनेंगी और सिने-दुनिया में सराही जाएंगी।
-----------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।