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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: ग्रीक सिनेमा मतलब यूरोप का हॉलीवुड

Thu, 27 Apr 2023 08:47 PM IST
Dr. Vijay Sharma डॉ. विजय शर्मा
Updated Thu, 27 Apr 2023 08:47 PM IST
सार

आज ग्रीस को यूरोप के नए हॉलीवुड का दर्जा हासिल है। दुनिया भर के सिने-निर्देशक यहां खिंचे चले आते हैं। यहां की फिल्में और यहां के अभिनेता सिने-विश्व में प्रसिद्ध हैं। आइए इस सदी में ग्रीस की कुछ फिल्मों का जायजा लें।

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फिल्म ‘नेवर ऑन ए सनडे’ का दृश्य - फोटो : Twitter

विस्तार

सब लोग प्रसिद्धि से खुद को जोड़ना चाहते हैं। अकादमी पुरस्कृत फिल्म ‘जोरबा द ग्रीक’ का काफी हिस्सा ग्रीस में फिल्माया गया पर यह खालिस हॉलीवुड की फिल्म है। लेकिन इसकी अपार सफलता के कारण यूनानी इसे अपना सिनेमा मानते हैं। जोरबा का चरित्र ग्रीकनेस का प्रतीक बन गया। यह फिल्म विशेषतौर पर यूरोप तथा अमेरिका की औरतों को खूब पसंद आई थी।

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1936-1941 के तानाशाही काल में ग्रीस में फिल्म निर्माण तकरीबन ठप्प हो गया। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ग्रीस में फिल्मों की बहार आ गई। पचास और साठ का दशक अधिकांश समीक्षकों के अनुसार यूनानी सिनेमा का स्वर्ण काल कहलाता है। ‘नेवर ऑन ए सनडे’, ‘स्टेला’, ‘द काउंटरफियेट क्वाइन’, ‘द रेड लैन्टेर्न्स’, ‘फिडोरा’ आदि इसी काल की फिल्में हैं।
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इसी समय ग्रीक के अभिनेताओं, निर्देशकों, लेखकों तथा प्रड्युसरों को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली। इस समय यहां प्रतिवर्ष पचास से अधिक फिल्में बन रही थीं, खासकर फिल्म नॉयर की। 1950 की ‘नेवर ऑन सनडे’ जुल्स दासिन ने अपनी पत्नी के लिए प्रड्यूस की थी। उसकी पत्नी मेलिना मरकर्री इस फिल्म में एक मजबूत इरादों वाली स्वतंत्र वेश्या की भूमिका में है। 

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मेलिना मरकर्री का अभिनय और फिल्मी योगदान

‘स्टेला’ एक आधुनिक ग्रीक ट्रेजडी है जिसे माइकेल काकोयानिस ने लिखा और इसमें भी मेलिना मरकर्री मुख्य भूमिका में है मगर यहां एक स्वतंत्र-चेतना औरत को जबरदस्ती शादी के बंधन में डाल दिया गया है। 1955 की 127 मिनट की फिल्म ‘द काउंटरफियेट क्वाइन’ एक कॉमेडी-ड्रामा है। इस फिल्म में सिक्के बनाने वाला एक ईमानदार आदमी जो बैंकर भी है, तय करता है कि वह नकली सिक्के गढ़ेगा। फिल्म मानवीय दुर्बलताओं यथा लालच, इच्छा, प्रलोभन, भाग्य आदि को चित्रित करती है। इसे योर्गोस जावेलास ने निर्देशित किया है।


‘ओ ड्राकोस’ अपराध की दुनिया, गैंगस्टर्स के जीवन की कहानी है। ‘द रेड लैन्टेर्न्स’ वेश्याओं की नजर से समाज और धर्म को दिखाती है। ‘फिडोरा’ में हम एक बार फिर मेलिना मरकर्री को देखते हैं। इस बार वह एक शिपिंग टाइकून की दूसरी पत्नी बनी हैं। यह दूसरी पत्नी टाइकून के बेटे के प्रेम में पड़ जाती है। 

मेलिना मरकर्री ग्रीस की एक बहुत लोकप्रिय अभिनेत्री रही है। वह वहां की संस्कृति मंत्री बनी और अपने प्रभाव से उसने सरकार से ग्रीक फिल्म उद्योग के लिए खूब आर्थिक सहायता जुटाई। उसने ग्रीक फिल्मों को विश्व में पहुंचाने के लिए भी काफी मेहनत की। वैसे तो ग्रीस का इतिहास युद्ध, सरकारी भ्रष्टाचार, जुल्म-अत्याचार से भरा हुआ है, जिनके कारण फिल्म निर्माण बाधित होता रहा है, फिर भी ग्रीक सिनेमा फलता-फूलता रहा है।

दुनिया के कई अन्य देशों की भांति यूनान में भी सिनेमा प्रारंभ में ही पहुंच गया। यहां के दर्शकों ने 1897 में फिल्म का पहला स्वाद चखा। यानकी तथा मिल्टन मानकीज भाइयों ने ग्रीक फिल्म उद्योग की स्थापना की। उन्होंने सबसे पहले कैमरे से फीचर लेंथ की मोशन पिक्चर बनाई। इन भाइयों ने ‘द वीवर्स’ नाम से एक डॉक्यूमेंट्री बनाई। इस वृतचित्र में उन्होंने अपनी ग्रैंडमदर को केंद्र में रखा, जो स्वयं एक बुनकर थी।

इन भाइयों ने 1906 में मेसिडोनिया में फिल्म बनानी प्रारंभ कर दी थी। ये करंट अफेयर पर फिल्म बनाते थे जिसमें ओटोमन साम्राज्य जैसे विषय चित्रित होते। उनकी पहली फिल्म एक मिनट लंबी थी। उनकी फिल्मों का जबरदस्त स्वागत हुआ। कोस्टास बचाटोरीस ने यूनान की पहली फीचर लेंथ फिल्म ‘गोल्फो’ बनाई जो एक प्रेम कहानी थी। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान यहां ज्यादातर डॉक्यूमेंट्री ही बनीं।
 

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1975 की फिल्म ‘द ट्रेवलिंग प्लेयर्स’ - फोटो : Twitter

1975 की ‘द ट्रेवलिंग प्लेयर्स’ घुमक्कड़ अभिनेताओं के एक दल की नजरों से ग्रीस का इतिहास दिखाती है। ‘वोयज टू कीथिरा’ एंग्लोपौलोस निर्देशित फिल्म एक उम्रदराज यूनानी के जीवन को दिखाती है। गृहयुद्ध के समय उसे प्रवासी होना पड़ा था अब वह अपने देश लौटा है मगर देश का जीवन अब वही नहीं रह गया है।

‘लैंडस्केप इन द मिस्ट’ में दो बच्चे सड़क के रास्ते जर्मनी जा रहे हैं, वे उस आदमी की खोज में हैं जिसे वे अपना पिता मानते हैं। 1983 में 110 मिनट की बायोपिक ‘रेम्बेटिको’ गायकों, संगीतज्ञों की कहानी है यह ब्लूज का ग्रीक संस्करण था। इस म्युजिकल फिल्म के निर्देशक थे कोस्टास फेरिस और पूरी कहानी एक युवा गायिका की नजर से दिखाई गई है। सोटिरिआ लियोनार्डौ ने प्रमुख भूमिका की है, साथ में हैं मिकालिस मैनिआटिस, थेमिस बैजाका आदि। थियोडोरोस एंग्लोपौलोस की 1988 की इस फिल्म में मैलिस जेके, तानिया, एवा आदि ने अभिनय किया है।


यूरोप का नया हॉलीवुड

आज ग्रीस को यूरोप के नए हॉलीवुड का दर्जा हासिल है। दुनिया भर के सिने-निर्देशक यहां खिंचे चले आते हैं। यहां की फिल्में और यहां के अभिनेता सिने-विश्व में प्रसिद्ध हैं। आइए इस सदी में ग्रीस की कुछ फिल्मों का जायजा लें।

योर्गोस लैंथीमोस इस समय यूनान का एक प्रसिद्ध निर्देशक है। आजकल वहां नई तरह की फिल्में बन रही हैं जिन्हें ग्रीक वीयर्ड वेव का नाम दिया गया है। योर्गोस लैंथीमोस की फिल्में इसी श्रेणी में आती हैं। उसकी फिल्म ‘डॉगटूथ’ (2009) से वीयर्ड वेव का प्रारंभ माना जाता है। यह फिल्म एक परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है, परिवार एक टापू में फंस गया है, टापू दुनिया से कटा हुआ है अत: वहां तमाम भयंकर घटनाएं होती हैं। इसी साल फिलिपोज सिटोज ने अपनी फिल्म ‘प्लेटो’स एकडमी’ में राष्ट्रवाद तथा बहुसंस्कृतिवाद के संघर्ष को चित्रित किया।

निकोस ग्रामाटिकोस ने ‘द किंग’ नाम से 2002 में एक फिल्म बनाई इसमें एक पियक्कड़ को अपने ग्रैंडफादर के गांव के भहराते घर में नवजीवन मिलता है लेकिन यह सब इतना सरल नहीं है। इस ग्रामीण समुदाय के अपने अलिखित नियम हैं और उसे उनका पालन करना है जो इतना आसान नहीं है। 130 मिनट की इस फिल्म में वेन्जलिस मौरिकिस, मैरिलिटा, मिनास आदि ने अभिनय किया है।

1893-1972 के बीच ग्रीस का एक महान गीतकार हुआ, उसका नाम था एफ्तिसिआ पापागिअनोपौलौ। उसी की जीवनी पर एंजेलोस फ्रैन्ट्जि ने 2019 में 123 मिनट की ड्रामा-म्युजिकल फिल्म बनाई। यह बायोपिक खूब सफल रही। पिछले साल 2022 में ‘ब्लैक स्टोन’ नाम से एक कॉमेडी आई। 

एक डॉक्यूमेंट्री बनाने वाली टीम एक खोए हुए सिविल सर्वेंट पर काम कर रही है क्योंकि इस सिविल सर्वेंट पर धोखाधड़ी का इल्जाम है। टीम हरौला (एलेनी कोकिडाऊ) नाम की एक ऐसी परेशान मां से टकराती है जो ओवरप्रोटेक्टिव है और अपने बेटे को खोज रही है। सिविल सर्वेंट बेटा पैनोस डोलोग्लौ दो दिन से घर नहीं आया है, उसकी 68 साल की मां चिंता से बीमार हो गई है। उसका बड़ा बेटा लेफ्टेरीज व्हीलचेयर पर है। खोज की पूरी कहानी हास्य से भरपूर है। यह निर्देशक स्पिरोस अजिकविडेस की पहली फिल्म है और इसने कई पुरस्कार बटोरे।

ग्रीक सिनेमा दिन-पर-दिन बेहतर होता जा रहा है।



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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें। 
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