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छात्र आंदोलन: संवेदनशीलता, संवाद और सकारात्मक सोच से समाधान निकाले सरकार

Tue, 21 Jul 2026 08:54 AM IST
Vinod Patahk विनोद पाठक
Updated Tue, 21 Jul 2026 08:54 AM IST
सार

यह घटना केवल एक व्यंग्य नहीं है, बल्कि यह इस बात का संकेत है कि देश का युवा वर्ग तंत्र की उदासीनता से कितना आहत है। 20 जुलाई को दिल्ली के हृदय स्थल जंतर-मंतर और संसद मार्ग पर जुटी विशाल भीड़ ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केंद्र सरकार इस समय रणनीतिक और भावनात्मक रूप से बैकफुट पर दिखाई दे रही है।

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government should resolve the student movement through sensitivity dialogue and a positive approach
दिल्ली में 20 जुलाई को हुआ प्रदर्शन। - फोटो : पीटीआई

विस्तार

पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव नतीजों और राजनीतिक सफलताओं के बाद भारतीय जनता पार्टी में उत्साह और विजय का माहौल देखा गया। चुनावी जीत किसी भी राजनीतिक दल के कार्यकर्ताओं और शीर्ष नेतृत्व के लिए नई ऊर्जा का संचार करती है, लेकिन इस राजनीतिक जीत की खुशी के समानांतर, राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की सड़कों पर एक ऐसा असंतोष आकार ले चुका है, जिसने केंद्र सरकार को एक गंभीर और अत्यंत संवेदनशील मोड़ पर ला खड़ा किया है।

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मेडिकल में प्रवेश के लिए आयोजित होने वाली नीट (नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट) परीक्षा में कथित धांधली, पेपर लीक, उत्तर पुस्तिकाओं (ओएमआर) में गड़बड़ी और अंक आवंटन को लेकर उभरे विवादों ने देश के लाखों अभ्यर्थियों, उनके अभिभावकों तथा युवाओं को गहरी चिंता में डाल दिया है।
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यह असंतोष केवल परीक्षा केंद्रों या कक्षाओं तक सीमित नहीं रहा, यह जंतर-मंतर से लेकर संसद मार्ग की सड़कों तक एक व्यापक जन आंदोलन के रूप में फैल गया है।

हाल में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश द्वारा एक सुनवाई के दौरान की गई 'कॉकरोच' वाली विवादास्पद टिप्पणी ने जलती आग में घी का काम किया। इस टिप्पणी से युवाओं और न्यायप्रिय नागरिकों के बीच भारी निराशा और असंतोष देखा गया। सोशल मीडिया के इस दौर में जन-आक्रोश ने व्यंग्य और डिजिटल प्रतिरोध का रूप ले लिया, जिसके परिणामस्वरूप इंटरनेट पर 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) जैसे नाम तेजी से ट्रेंड करने लगे।
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यह घटना केवल एक व्यंग्य नहीं है, बल्कि यह इस बात का संकेत है कि देश का युवा वर्ग तंत्र की उदासीनता से कितना आहत है। 20 जुलाई को दिल्ली के हृदय स्थल जंतर-मंतर और संसद मार्ग पर जुटी विशाल भीड़ ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केंद्र सरकार इस समय रणनीतिक और भावनात्मक रूप से बैकफुट पर दिखाई दे रही है।

पूरे घटनाक्रम और युवाओं के आक्रोश को गहराई से समझने के लिए हमें भारत के जनसांख्यिकीय परिवर्तन और नई पीढ़ी के सामाजिक-राजनीतिक मनोविज्ञान का निष्पक्ष विश्लेषण करना होगा। वर्ष 2014 में जब केंद्र में सत्ता परिवर्तन हुआ था, उस समय जो बच्चे मात्र 4 या 5 वर्ष के थे, वे आज वर्ष 2026 में 16 से 18 वर्ष के नवयुवक बन चुके हैं।

यह वह पीढ़ी है, जो पूरी तरह से वर्तमान शासनकाल की नीतियों, व्यवस्थाओं और वादों के बीच बड़ी हुई है। इस युवा पीढ़ी के पास वर्ष 2014 से पहले के राजनीतिक, सामाजिक या प्रशासनिक दौर की कोई जीवंत स्मृति नहीं है। उन्हें तत्कालीन यूपीए-1 या यूपीए-2 सरकारों के कार्यकाल की खामियां, भ्रष्टाचार या प्रशासनिक शिथिलता का व्यक्तिगत अनुभव नहीं है।

इसलिए, जब भी कोई प्रशासनिक विफलता या परीक्षा में धांधली सामने आती है, तो यह तर्क देना कि '2014 से पहले भी ऐसा होता था' या 'पूर्ववर्ती सरकारों के समय भी पेपर लीक होते थे', इस नई पीढ़ी के गले नहीं उतरता।

उनके लिए वर्तमान व्यवस्था ही उनकी दुनिया है। वे सीधे तौर पर आज की सरकार, आज की परीक्षा एजेंसियों और वर्तमान प्रशासनिक तंत्र से जवाब मांग रहे हैं। आज का युवा बीती बातों या ऐतिहासिक तुलनाओं के आधार पर अपनी वर्तमान समस्याओं को नजरअंदाज़ करने को तैयार नहीं है।

वर्तमान समय में सूचना के आदान-प्रदान की व्यवस्था पूरी तरह बदल चुकी है। एक समय था, जब मुख्यधारा के मीडिया ही जनमत का निर्धारण करते थे। आज मुख्यधारा के मीडिया से भी बड़ी और प्रभावशाली आवाज सोशल मीडिया की बन चुकी है।

एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, फेसबुक, टेलीग्राम जैसे मंचों ने हर नागरिक और विशेषकर युवाओं को अपनी बात खुलकर रखने का एक असीमित मंच प्रदान कर दिया है। जब मुख्यधारा का मीडिया युवाओं के मुद्दों और परीक्षा धांधली को पर्याप्त जगह नहीं देता तो यह आक्रोश सोशल मीडिया पर दावानल की तरह फैलता है।

हालांकि, सोशल मीडिया की इस असीम शक्ति के साथ एक बड़ा संकट भी जुड़ा है, सत्य और असत्य के बीच भेद करने की बढ़ती जटिलता।

नीट परीक्षा के हालिया परिणामों और विवादों के दौरान सोशल मीडिया पर आरोपों और दावों की बाढ़ आ गई। कई ऐसे वीडियो, स्क्रीनशॉट और दस्तावेज साझा किए गए, जिनमें आरोप लगाया गया कि परिणाम पूरी तरह से गलत हैं। अभ्यर्थियों ने अपनी ओएमआर शीट दिखाकर भारी अनियमितता के दावे किए।

जब नेशनल टेस्टिंग एजेंसी और जांच एजेंसियों ने इन दावों की तकनीकी जांच की तो एक बेहद चौंकाने वाला तथ्य सामने आया। कई दावों में प्रयुक्त की गई ओएमआर शीट पूरी तरह से नकली थीं, जिन्हें आधुनिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल्स और एडिटिंग सॉफ्टवेयरों की मदद से तैयार किया गया था, ताकि भ्रम फैलाया जा सके।

डिजिटल युग की इस त्रासदी ने मामले को और अधिक उलझा दिया है। एक तरफ जहां वास्तविक पीड़ित अभ्यर्थी न्याय के लिए गुहार लगा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ एआई-जनरेटेड सामग्री व फर्जी अफवाहों के कारण सच और झूठ का अंतर समझ पाना बेहद मुश्किल हो गया है। इस फर्जीवाड़े से आम जनता और छात्रों के मन में भ्रम और गहरा जाता है, जिससे स्थिति और अधिक विस्फोटक हो जाती है।

नीट प्रकरण का सबसे दुःखद और हृदयविदारक पहलू यह है कि इस गतिरोध और अनिश्चितता के बीच लगभग 20 अभ्यर्थियों द्वारा आत्महत्या जैसा अत्यंत घातक कदम उठाया गया।

17-18 साल की उम्र के मासूम युवाओं का इस तरह असमय जीवन समाप्त कर लेना केवल उनके परिवारों के लिए ही नहीं, बल्कि संपूर्ण राष्ट्र की चेतना के लिए एक गहरा सदमा है। यद्यपि, किसी भी परिस्थिति में आत्महत्या जैसे कदम को कभी भी सही या जायज नहीं ठहराया जा सकता। असफलता या किसी अन्याय के खिलाफ संघर्ष करने के लिए जीवित रहना और लड़ना आवश्यक है।

जीवन किसी भी परीक्षा, डिग्री या पद से कहीं अधिक अमूल्य है, लेकिन केवल छात्रों को मानसिक रूप से मजबूत होने की सलाह देकर हम अपनी सामाजिक जिम्मेदारी से भाग नहीं सकते। हमें उन कारणों की गहराई में जाना होगा जो एक युवा को इस चरम कदम तक धकेलते हैं।

जैसे, भारत में डॉक्टर या इंजीनियर बनना केवल एक करियर विकल्प नहीं, बल्कि पूरे परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़ा प्रश्न बना दिया जाता है। माता-पिता द्वारा अपनी जमा-पूंजी और उम्मीदें बच्चे पर लगा देना अनजाने में एक भारी मानसिक दबाव पैदा करता है। 

रिश्तेदारों और समाज द्वारा बच्चों की तुलना करने की विषैली संस्कृति युवाओं के आत्मविश्वास को पूरी तरह तोड़ देती है। राजस्थान के कोटा से लेकर देश के विभिन्न कोचिंग हब तक, बच्चों को 14-16 घंटे की पढ़ाई और निरंतर प्रतिस्पर्धा के ऐसे दबाव में रखा जाता है, जहां असफलता के लिए कोई सहानुभूति नहीं होती।

जब साल भर कड़ी मेहनत करने के बाद बच्चे को यह पता चलता है कि जिस परीक्षा के आधार पर उसका भविष्य तय होना था, उसमें धांधली या पेपर लीक हो गया है, तो उसका व्यवस्था से विश्वास उठ जाता है।

सरकार को यह समझना होगा कि केवल परीक्षाओं का आयोजन कर देना ही काफी नहीं है। देश में करोड़ों प्रतियोगी छात्रों की मानसिक मजबूती और स्वास्थ्य के लिए एक समर्पित राष्ट्रीय नीति और व्यापक कार्यक्रम तुरंत लागू किया जाना चाहिए। हर स्कूल, कॉलेज और कोचिंग संस्थान में प्रशिक्षित काउंसलर, हेल्पलाइन और तनाव-मुक्त वातावरण सुनिश्चित करना सरकार और समाज की साझा प्राथमिकता होनी चाहिए।

20 जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर और संसद मार्ग पर जो नजारा देखने को मिला, वह इस आंदोलन के बदलते स्वरूप को रेखांकित करता है।

शुरुआत में यह विरोध-प्रदर्शन केवल नीट से प्रभावित परीक्षार्थियों, उनके अभिभावकों और सामान्य छात्रों का एक स्वतःस्फूर्त और भावनात्मक आंदोलन था, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया और संसद का सत्र शुरू हुआ, इस आंदोलन में विभिन्न राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता, वामपंथी छात्र संगठनों के सदस्य और कई विपक्षी नेता प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से शामिल हो गए।

लंबे समय से चुनावी पराजयों से जूझ रहे और किसी बड़े राष्ट्रीय मुद्दे की तलाश में जुटे विपक्ष को नीट प्रकरण ने एक तैयार 'ईंधन' प्रदान कर दिया है। विपक्ष इस मौके का उपयोग सरकार को प्रशासनिक रूप से घेरने और युवा मतदाताओं के बीच अपनी पैठ बनाने के लिए कर रहा है।

हमें राजनीतिक बयानबाजी से हटकर एक निष्पक्ष दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। यदि इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें तो कांग्रेस और पूर्ववर्ती सरकारों के कार्यकाल में भी दर्जनों राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय भर्ती व प्रवेश परीक्षाओं में धांधली, पेपर लीक और फर्जीवाड़े के बड़े मामले सामने आए थे।

यह तर्क भी सच्चाई से दूर है कि प्रदर्शनकारी छात्रों पर लाठीचार्ज या आंसू गैस के गोले केवल वर्तमान सरकार में दागे जा रहे हैं। राज्यों में चाहे किसी भी दल की सरकार रही हो, चाहे कांग्रेस हो, वामपंथी हों या अन्य क्षेत्रीय दल, प्रदर्शनों और आंदोलनों को नियंत्रित करने के लिए राज्य पुलिस प्रशासन द्वारा लाठीचार्ज और बल प्रयोग का इतिहास पुराना रहा है।

लेकिन, इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि अतीत की कमियों या अन्य राज्यों की विफलताओं का हवाला देकर वर्तमान केंद्र सरकार अपनी जिम्मेदारी से बच सकती है।

"पहले भी ऐसा होता था" यह तर्क उन अभ्यर्थियों के लिए कोई राहत नहीं है, जिन्होंने वर्षों तक रात-दिन एक करके परीक्षा की तैयारी की है। परीक्षा में शत-प्रतिशत पारदर्शिता, निष्पक्षता और पवित्रता सुनिश्चित करना वर्तमान सरकार का नैतिक और प्रशासनिक दायित्व है।

सड़क पर उतरकर विरोध दर्ज कराना और न्याय की मांग करना लोकतंत्र में हर नागरिक का मौलिक अधिकार है, लेकिन जब आंदोलनों का रुख भटकने लगता है तो इससे देश की सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था के सामने नई चुनौतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। नरेंद्र मोदी सरकार के समक्ष पूर्व में भी सड़क पर होने वाले कई बड़े आंदोलन आए हैं।

शाहीन बाग का महीनों लंबा धरने से लेकर दिल्ली की सीमाओं पर चला ऐतिहासिक किसान आंदोलन इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। उन आंदोलनों को सरकार ने अपनी राजनीतिक दृढता, वार्ताओं और रणनीतिक धैर्य से संभाला।

हालांकि, नीट आंदोलन का चरित्र उन आंदोलनों से काफी अलग है। शाहीन बाग या किसान आंदोलन मुख्य रूप से नीतिगत और वैचारिक मुद्दों से प्रेरित थे।

इसके विपरीत, नीट आंदोलन सीधे तौर पर आम मध्यम वर्गीय और गरीब परिवारों के बच्चों के करियर, सपनों और मेहनत से जुड़ा हुआ है। जब छात्रों के साथ उनके माता-पिता और अभिभावक सड़कों पर उतरते हैं, तो यह एक बेहद संवेदनशील और भावनात्मक मुद्दा बन जाता है।

इसके बावजूद, सरकार और पुलिस प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि छात्रों की आड़ में दिल्ली में किसी भी प्रकार की अराजकता, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान या राष्ट्र-विरोधी तत्वों द्वारा स्थिति का दुरुपयोग करने की अनुमति न दी जाए।

वामपंथी संगठनों या राजनीतिक दलों द्वारा इस छात्र आंदोलन को हिंसक या व्यवस्था-विरोधी मोड़ देने के किसी भी प्रयास पर कड़ी नजर रखनी होगी। न्याय की मांग का समर्थन होना चाहिए, लेकिन कानून-व्यवस्था को हाथ में लेने की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती।

चूंकि, वर्तमान में संसद का सत्र चल रहा है, इसलिए केंद्र सरकार के पास इस गतिरोध को सुलझाने और देश के करोड़ों युवाओं के मन में दोबारा विश्वास जगाने का एक सुनहरा अवसर है। सरकार को रक्षात्मक रवैया छोड़कर आक्रामक रूप से सुधारात्मक कदम उठाने होंगे।

सरकार को तुरंत एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और शक्ति-संपन्न उच्चस्तरीय समिति का गठन करना चाहिए। इस समिति में केवल नौकरशाह या शिक्षाविद ही न हों, बल्कि निष्पक्ष विशेषज्ञ, न्यायविद और छात्रों के प्रामाणिक प्रतिनिधि भी शामिल किए जाएं। जब छात्र स्वयं प्रक्रिया का हिस्सा बनेंगे तो पारदर्शिता पर उनका विश्वास बहाल होगा।

नेशनल टेस्टिंग एजेंसी की कार्यप्रणाली, इसके सर्वर सुरक्षा, प्रश्नपत्र निर्माण की प्रक्रिया और सेंटर आबंटन के पूरे सिस्टम की कैग या साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों द्वारा गहन समीक्षा होनी चाहिए। यदि आवश्यक हो तो परीक्षा तंत्र का पूर्ण पुनर्गठन किया जाए।

हाल में पारित हुए सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम के तहत पेपर लीक और धांधली में शामिल भू-माफिया, कोचिंग सिंडिकेट और भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ ऐसी कठोर कार्रवाई की जाए जो एक मिसाल बन सके।

सोशल मीडिया पर फर्जी ओएमआर शीट और अफवाहें फैलाकर माहौल खराब करने वाले तत्वों के खिलाफ तेजी से साइबर जांच की जाए और जनता के सामने सच लाया जाए।

सरकार को विपक्ष के आरोपों से भागने के बजाय संसद के पटल पर इस विषय पर खुली और तथ्य-आधारित बहस करनी चाहिए, ताकि देश के सामने स्पष्ट संदेश जाए कि सरकार युवाओं के साथ खड़ी है।

भारत विश्व का सबसे युवा देश है। हमारी जनसांख्यिकी लाभांश ही हमारी सबसे बड़ी राष्ट्रीय ताकत है। यदि देश का युवा हताश, निराश और व्यवस्था से ठगा हुआ महसूस करेगा, तो विकसित भारत का सपना अधूरा रह जाएगा। देश की परीक्षा प्रणाली की गरिमा को बचाना और युवाओं के टूटते भरोसे को जोड़ना इस समय सरकार के सामने सबसे बड़ी राष्ट्रीय चुनौती है।

राजनीतिक रस्साकशी, आरोप-प्रत्यारोप और आंदोलनों के बीच सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन लाखों ईमानदार अभ्यर्थियों को न्याय मिले जिन्होंने अपना पसीना बहाया है। सरकार को संवेदनशीलता, पारदर्शिता और दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय देते हुए इस संकट का स्थाई समाधान निकालना होगा।

परीक्षाओं की निष्पक्षता केवल एक प्रशासनिक काम नहीं है, बल्कि यह इस देश के युवाओं के भविष्य और भारतीय लोकतंत्र की नीव को सुरक्षित रखने का संकल्प है। समय रहते उठाया गया सही और पारदर्शी कदम ही इस जनाक्रोश को शांत कर सकता है। देश के भविष्य को सही दिशा दे सकता है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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