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महात्मा गांधीः बीती सदी के अद्वितीय करुणामय नेतृत्वकर्ता

Wed, 02 Oct 2024 12:30 PM IST
Kailash Satyarthi कैलाश सत्यार्थी
Updated Wed, 02 Oct 2024 12:30 PM IST
सार

महात्मा गांधी 1917 में बिहार के चंपारण गए। वहां उन्होंने ब्रिटिश जमींदारों द्वारा नील की खेती करने वाले किसानों का क्रूर शोषण करीब से देखा। उन्होंने एक नए प्रकार का आंदोलन छेड़ा जिसे सत्याग्रह कहा। उन्होंने किसानों से अहिंसक तरीकों से अपना विरोध जताने को प्रेरित किया और उन्हें स्वच्छता, शिक्षा और आत्मनिर्भरता का महत्व सिखाया।

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Gandhi Jayanti 2024: Mahatma Gandhi was a unique compassionate leader of the last century
1930 का 400 किमी का ऐतिहासिक नमक आंदोलन गांधी के करुणामय प्रतिरोध का एक अन्य उदाहरण था। - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

कोई ज्यादा पुरानी बात नहीं है। पिछली सदी की ही बात है, जब मोहनदास करमचंद गांधी हमारी आपकी तरह इसी धरती पर चलते फिरते थे। उनकी हत्या कर दी गई। लेकिन उनके हत्यारे यह नहीं जानते थे कि कुछ लोग कभी नहीं मरते। उनके जीवन का संदेश काल और भूगोल की सारी सीमाओं को लांघ जाता है। गांधी को निःसंदेह ऐसे ही चिरंजीवियों में गिना जा सकता है।

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आखिर ऐसे लोग अमर क्यों हो जाते हैं? क्योंकि वे उन शाश्वत मानवीय मूल्यों को जीते हैं जो कभी नष्ट नहीं होते। वे उन मूल्यों को जनांदोलनों में बदल देते हैं। महात्मा गांधी ने सत्य, अहिंसा और शांति जैसे मूल्यों के साथ ऐसा ही सफल प्रयोग किया। इसके सहारे उन्होंने उन्होंने भारत की आजादी के लिए सबसे बड़ा जनांदोलन खड़ा किया। इसके अलावा, हर तरह के अन्याय, उत्पीड़न, दमन, भेदभाव और गरीबी के खिलाफ जीवन भर चला उनका संघर्ष भी इन्हीं सिद्धांतों से प्रेरित था।
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हमें याद रखना चाहिए कि करुणा ही अहिंसा, सत्य, शांति, न्याय और समावेश की बुनियाद है। ये सब करुणा के ही बाहरी साकार रूप हैं। करुणा पर आधारित जुड़ाव सबसे गहरे होते हैं। उनसे दूसरों के कष्ट के प्रति सबसे गहरी संवेदनाए. जागृत होती हैं। करुणा दूसरों के कष्ट से जुड़ने, साहस पैदा करने और उस कष्ट को दूर करने के लिए कुछ कर गुजरने को प्रेरित करती है। यह न केवल कष्ट को महसूस करने में मदद करती है, बल्कि घृणा और बदले की वैसी भावनाओं से भी बचाती है, जो पीड़ित और उत्पीड़न करने वाले, दोनों को अमानवीय बना देते हैं। 
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महात्मा गांधी के करुणामय नेतृत्व के कुछ उदाहरण देखते हैं। 1917 में, वे बिहार के चंपारण गए। वहां उन्होंने ब्रिटिश जमींदारों द्वारा नील की खेती करने वाले किसानों का क्रूर शोषण करीब से देखा। उन्होंने एक नए प्रकार का आंदोलन छेड़ा जिसे सत्याग्रह कहा। उन्होंने किसानों से अहिंसक तरीकों से अपना विरोध जताने को प्रेरित किया और उन्हें स्वच्छता, शिक्षा और आत्मनिर्भरता का महत्व सिखाया।

1930 का 400 किमी का ऐतिहासिक नमक आंदोलन गांधी के करुणामय प्रतिरोध का एक अन्य उदाहरण था। उन्होंने नमक के उत्पादन और बिक्री के अंग्रेजों के एकाधिकार को चुनौती दी। उनका प्रतिरोध किसी व्यक्ति के प्रति नहीं, अन्यायपूर्ण कानूनों के खिलाफ था। 

गांधी की करुणा छुआछूत के खिलाफ उनके संघर्ष में अपने सबसे प्रभावशाली रूप में नजर आती है। उन्होंने छुआछूत को एक नैतिक और आध्यात्मिक अभिशाप समझा और इसे खत्म करने का प्रण लिया। 1932 में, उन्होंने ‘अछूतों’ के लिए अलग चुनावी व्यवस्था के ब्रिटिश प्रस्ताव के विरोध में अनशन किया। यह व्यवस्था अछूतों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने के लिए बनाई गई थी, लेकिन गांधी ने इसे एक प्रकार के विभाजन के रूप में देखा, जो भारतीय समाज को और अधिक बांटने वाला साबित होता। 

गांधी अंग्रेजी राज के खिलाफ भारतीय प्रतिरोध के अगुआ थे, फिर भी उन्होंने कभी अंग्रेजों से घृणा नहीं की। उनकी करुणा उन लोगों के प्रति भी दिखी जिन्होंने उन्हें कैद किया या उन पर अत्याचार किया। जेल में रहते हुए, उन्होंने अंग्रेज सिपाहियों और जेल के अधिकारियों के लिए भी दया और सम्मान दिखाया और उन्हें अहिंसा का पाठ पढ़ाया। इसका परिणाम हुआ कि अंग्रेजों की हुकूमत को सख्ती से लागू करा रहे कई जेलरों का हृदय परिवर्तन हो गया और उनमें से कुछ ने तो बाद में उनकी बड़ी प्रशंसा भी की।

अगस्त 1947 में जब भारत अपनी स्वतंत्रता का जश्न मना रहा था, उस बीच सबसे भयानक हिंदू-मुस्लिम दंगे भड़क उठे। साम्प्रदायिक उन्माद को रोकने और शांति बहाल करने के लिए गांधी ने कलकत्ता में एक अनिश्चितकालीन अनशन शुरू किया। गांधी हमेशा हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए लड़े। वे हर व्यक्ति के प्रति करुणा में विश्वास करते थे। यही उनकी हत्या का सबसे बड़ा कारण बना। ये बातें गांधी को आधुनिक युग का शीर्ष करुणामय नेतृत्वकर्ता बनाती हैं। 

गांधी मेरे लिए सबसे बड़े प्रेरणास्त्रोतों में से एक हैं, लेकिन मैं उनकी पूजा नहीं करता। मैं उन्हें एक ऐसे दर्पण की तरह लेता हूं, जो मुझे अपने अंतर्मन को देखने-परखने में मदद करता है, मुझे सत्यनिष्ठा के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है। मेरी यह कोशिश लगातार चलती है। जब हम किसी को पूजा की विषयवस्तु बना देते हैं, तो हमारी शुरुआत अपेक्षाओं, इच्छाओं या भय के साथ होती है और हम उसे स्वयं से दूर कर देते हैं। एक और खतरा यह है कि हम उसे मत-मजहबों और आस्था के विभिन्न रंगों में रंग देते हैं। इस तरह दर्पण धु.धला पड़ता जाता है। सच्चाई की जगह बनावट हावी हो जाती है।

दुनिया इतनी विखंडित, विभाजित, ध्रुवीकृत, नफरत तथा हिंसा से भरी कभी नहीं रही जितनी आज है। मैंने अपने जीवन में साम्प्रदायिक विभाजन और घृणा के इस तरह के व्यवस्थित और आक्रामक फैलाव का अनुभव कभी नहीं किया। आज महात्मा गांधी की शिक्षाएं पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक और आवश्यक हो जाती हैं। यदि हम आज न्याय, समावेश और एकता के प्रति अपनी अंतर्निहित करुणा की चिन्गारी को नहीं सुलगाते, तो उनकी जन्म जयंती एक पारंपरिक उत्सव, एक मजाक भर बनकर रह जाएगी।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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