किसान आंदोलन: जब इस वैज्ञानिक ने खोज कर पूरी दुनिया को बताया, जैविक खेती सीखने भारत आइए
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देश में जो किसान आंदोलन चल रहा है उसे धर्म और राजनीति के परे देखा जाना चाहिए, क्योंकि इस आंदोलन के लिए किसान नहीं वो शासन की व्यवस्था जिम्मेदार है जिसने सदियों से किसानों को और गांवों को उजाड़ा है।
मजे की बात यह है कि जिस अंग्रेज शासन ने नील,कपास और गन्ने जैसी फसलेंं हमारे किसानों से उगवाकर और उनके खेतों से अनाज की खेती लूटकर उन्हें लाखों की तादाद में मरने को मजबूर किया उसी इंग्लैंड के एक कृषि वैज्ञानिक सर अलबर्ट हॉवर्ड ने इंदौर में 4 साल भारतीय जैविक खेती पर वैज्ञानिक खोज कर पूरी दुनिया को बताया कि खेती सीखने यहां आइए।
अंग्रेज हमारे किसानों को गंंवार और अनपढ़ और उनकी खेती को दकियानूसी और पिछड़ी मानते थे। जर्मन रसायनशास्त्री जस्टस वॉन लाइबेक ने 1840 में एनपीके नाम के रासायनिक तिरखूट खाद की खोजकर पूरे यूरोप को भ्रमित कर दिया था और उसी के आधार पर अंग्रेज शासन ने हॉवर्ड को भारत के किसानों को रासायनिक खेती सिखाने सन् 1905 को भारत भेजा था। लेकिन यहां के किसानों की बहुफसलीय जैविक खेती देखकर हॉवर्ड दंग रह गए और सिखाना छोड़ वो हमारे किसानों के ही शिष्य बन गए।
हॉवर्ड पति- पत्नी ने पूरे 15 साल तक पूरे देश का भ्रमण कर जैविक खेती की बारिकियां देखींं। अपनी खोज को वैज्ञानिक जामा पहनाने उन्हें स्वतंत्र रूप से काम करने के खेत चाहिए था। इंदौर के महाराजा श्रीमंत तुकोजीराव होल्कर ने उन्हे 99 साल की लीज पर 120 हैक्टर जमीन दे दी और हॉवर्ड ने सन् 1931 को इंदौर में इन्स्टिट्यूट ऑफ प्लांट इंडस्ट्री की स्थापना की, जो आज इंदौर कृषि महाविद्यालय नाम से जाना जाता है।
यहां हॉवर्ड ने 1931 तक फसल अवशेष गोबर गोमूत्र मिलाकर जो जैविक खाद बनाई वो पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो गई। होल्कर नरेश की दानशूरता को नवाजने हॉवर्ड ने अपने शोध को नाम दिया ‘इंदौर मेथड ऑफ कंपोस्ट मेकिंग’।
सन् 1931 को निवृत्त होकर हॉवर्ड इंग्लैंड वापस लौट गए। सन् 1940 में उनकी पत्नी ने पुस्तक प्रकाशित की ‘An agricultural testament’। लेकिन उन दिनों रॉकफेलर और फोर्ड फॉउंडेशन के चक्कर में और बाद में हरित क्रांति की सुगबुगाहट के कारण ये बहुमूल्य पुस्तक अंधेरे में चली गई।
हरित क्रांति देश में आई और प्रदूषण फैलाकर चली गई। तब गोवा के पर्यावरणविद डॉ.क्लॉड अल्वारिस ने 1996 में फिर से एन एग्रीकल्चरल टेस्टामेंंट प्रकाशित की जिसका मैंने मराठी में पुणे की एक मासिक पत्रिका बऴीराजा में लेख लिखा और पाठकों के आग्रह पर 14 किश्तों में लेख लिखे। उन्होंने ही बाद में पुस्तक प्रकाशित की मेरे मित्र प्रभाकर पंडित ने उसका हिंदी अनुवाद ‘हमारी खेती का वसीयतनामा’ से किया और मैंने उसे सन् 2004 में प्रकाशित किया।
2014 तक कृषि रसायनों ने पूरी दुनिया की मिट्टी प्रदूषित कर दी थी...
2014 तक कृषि रसायनों ने पूरी दुनिया की मिट्टी प्रदूषित कर दी थी। इस कारण विश्व राष्ट्र संगठन ने सन 2015 को सॉइल इयर घोषित किया और मिट्टी के सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक सर अलबर्ट हॉर्वर्ड की भूरि भूरि प्रशंसा करी (हॉर्वर्ड के गुरु हमारे अनपढ़ किसान)।
पर्यावरणविद वंदना शिवा 20 विदेशी वैज्ञानिकों,किसानों,और समाजसेवियों को लेकर सर हॉवर्ड का कार्यस्थल देखने 4 अक्तूबर 2015 के दिन इंदौर कृषि महाविद्यालय आईं थीं। हॉवर्ड की प्रयोगशाला और वो जहां काम करते थे वे खेत देखकर सब भावविभोर हो गए। उसी दिन उस प्रयोगशाला का नया नाम रखा गया और एक स्मरणपट्टिका लगाई गई।
अपनी पुस्तक में सर हॉवर्ड ने जो मुख्य बातें लिखी है वे गौर करने लायक है:-
1. रोमन साम्राज्य का पतन ही इसलिए हुआ क्योंकि उसने पूंजीपतियों को खेत सौंप दिए थे।
2. किसी भी देश की लोकसंख्या उस देश का गौरव होता है और उनकी मूलभूत आवश्यकताओं की यदि पूर्ति हो जाती है तो उस देश की समृद्धि कोई रोक नहीं सकता है लेकिन यदि इसके विपरीत हुआ तो बड़ी से बड़ी पूंजी भी उस देश को बचा नहीं सकेगी।
3. बहुफसलीय खेती भारत की विशेषता है क्योंकि इससे अन्न सुरक्षा स्थिति गांवों की महिलाएं संभाल लेंगी।
4. भारत का मौसम ऐसा है कि यहां फसलों का प्रसंस्करण संभव नहीं है। वे जल्द सड़ जाती हैं, इसलिए ताजा माल खेत से निकालो और उपभोग करो।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।