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हिमालय के लिए ग्लोबल से ज्यादा लोकल वॉर्मिंग बनी खतरा, प्रदूषण से कैसे बचेगा उत्तराखंड?

Jay singh Rawatजयसिंह रावत Updated Sat, 15 Jun 2019 04:13 PM IST
ग्लोबल वॉर्मिंग को लेकर कितनी चिंता है भारत में?
ग्लोबल वॉर्मिंग को लेकर कितनी चिंता है भारत में? - फोटो : अमर उजाला
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गर्मियों में ठण्डी हवाएं देकर तथा सर्दियों में साइबेरिया से चलने वाली शीत लहरों को रोकने वाला एशिया का जलवायु नियंत्रक हिमालय जब स्वयं ही तप रहा हो तो फिर दिल्ली मेंं पारे का 48 डिग्री तक और राजस्थान के धौलपुर में 51 डिग्री सेल्यिस तक पहुंच कर सारे उत्तर भारत को झुलसाना स्वाभाविक ही है। अभी तो पारा 51 डिग्री तक ही पहुंचा और अगर इसकी उछाल इसी तरह जारी रही तो अनिष्ट की कल्पना सहज ही की जा सकती है।
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दरअसल, इससे जीव-जन्तु वनस्पतियां और आबादी ही नहीं झुलसेगी बल्कि इसका असर हिन्द महासागर और अरब सागर पर भी पड़ेगा तथा वहां वाष्पीकरण बढ़ने से मानसूनी हवाएं नमी का इतना बड़ा बोझ लेकर चलेंगी जिसका परिणाम विनाशकारी बाढ़ों के रूप में सामने आएगा। 

ग्लोबल और लोकल वॉर्मिंग 
इस स्थिति के लिए ग्लोबल वार्मिंग को जिम्मेदार ठहराना तो आसान हो गया है। मजेदार बात तो यह है कि इसके लिए अपने वनों का सर्वाधिक दोहन करने ग्रीन हाउस को नुकसान पहुंचाने वाली गैसों का उत्सर्जन करने वाले अमेरिका और यूरोप के जैसे देशों को सीधे-सीधे जिम्मेदार ठहराया जाता है जबकि इन देशों में इतनी बर्फ गिरने लगी है कि मौसम विज्ञानी वहां हिमयुग के लौटने के संकेत तक देने लगे हैं, इसलिए अब समय आ गया है कि पर्यावरणविदों और हिम विशेषज्ञों का ध्यान जलवायु परिवर्तन के लिए ग्लोबल वार्मिंग से इतर लोकल वार्मिंग की ओर भी जाने लगा है।

हिमालय पर लोकल वॉर्मिंग का ज्यादा असर देखा गया
वैश्विक तापमान वृद्धि या ग्लोबल वार्मिंग पर प्रो. आर.के.पचौरी के नेतृत्व वाली संयुक्त राष्ट्र संघ की इंटर गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आइपीसीसी) की चौथी रिपोर्ट में सन् 2035 तक हिमालयी ग्लेशियरों के लुप्त हो जाने की भविष्यवाणी का सार्वजनिक होना ही था कि भारत ही नहीं बल्कि समूचे एशिया में हलचल मच गई। मचती भी क्यों नहीं अगर हिमालय पर 15 हजार से अधिक ग्लेशियर ही नहीं रहेंगे तो सिन्धु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी महानदियों और उनकी सहायिकाओं की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। जब ये नदियों ही नहीं रहेंगी तो अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, तिब्बत, नेपाल और भूटान के जनजीवन पर इसका क्या असर पड़ता उसकी कल्पना भी भयावह थी।

आइपीसीसी के पैनल की विवादास्पद रिपोर्ट के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा आई.आई.टी. मुम्बई के प्रोफेसर आनन्द पटवर्धन की अध्यक्षता में में एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया जिसमें वाडिया हिमालयी संस्थान और इसरो समेत देश के प्रमुख संस्थानों के विशेषज्ञों के अलावा पर्यावरणविद् चण्डी प्रसाद भट्ट को भी शामिल किया गया।

जून 2010 में भारत सरकार को सौंपी गई इस रिपोर्ट में अध्ययन दल ने भी कुछ ग्लेशियरों के पीछे खिसकने और कुछ के आगे बढ़ने की ओर संकेत कर ग्लोबल वार्मिंग के साथ ही लोकल वॉर्मिंग की ओर इशारा किया है। इस अध्ययन दल की रिपोर्ट में कुछ हिमालयी ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने, कुछ के बहुत धीमी गति से पिघलने और कुछ ग्लेशियरों के आगे बढ़ने की पुष्टि हुई है। अब विशेषज्ञों को लगता है कि ग्लेशियरों पर वैश्विक असर कम और स्थान विशेष की परिस्थितियों का असर ज्यादा पड़ रहा है। 





 
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