दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 : जिस भ्रष्टाचार का नाम लेकर नेता बने, उसी भ्रष्टाचार ने केजरीवाल को डूबा दिया
12 साल बाद दिल्ली में अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी के शासन का अंत हो गया है। 27 साल बाद भाजपा ने सत्ता में वापसी की है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने भले अपना खाता न खोला हो, लेकिन आम आदमी पार्टी की हार में बहुत बड़ा योगदान कांग्रेस पार्टी का रहा है। कांग्रेस ने 6.38 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल किए हैं।
खासकर अरविंद केजरीवाल जिस नई दिल्ली सीट से चुनाव हारे हैं, वहां कांग्रेस प्रत्याशी व पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के सुपुत्र संदीप दीक्षित ने 4531 वोट लिए। आम आदमी पार्टी की हार के तीन प्रमुख कारणों को गिना जाए तो पहला भ्रष्टाचार, दूसरा अरविंद केजरीवाल का बड़बोलापन और तीसरा पार्टी में दूसरी पंक्ति के नेताओं का अभाव रहा।
दरअसल, अन्ना आंदोलन के समय केजरीवाल ईमानदार और भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति का संकल्प लेकर मैदान में उतरे थे। अपने पहले दिल्ली विधानसभा चुनाव में भले उन्हें बहुत अधिक सफलता नहीं मिली थी, लेकिन वर्ष 2015 में जब दोबारा दिल्ली में विधानसभा चुनाव हुए तो उन्होंने एकतरफा सारे समीकरणों को झूठलाते हुए 70 में से 67 सीट जीती थीं। केजरीवाल का करिश्मा यहीं नहीं रुका। 5 साल बाद वर्ष 2020 के चुनाव में उन्होंने 70 में से 62 सीटें हासिल कर बताया कि उनमें काफी दम बाकी है। इतना ही नहीं, आम आदमी पार्टी ने अरविंद केजरीवाल की लीडरशिप में पंजाब में भी जीत का परचम फहराया। पंजाब की जीत ने आम आदमी पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा भी दिला दिया।
लेकिन, पंजाब की जीत के बाद यूं लगने लगा था कि सत्ता का नशा केजरीवाल के सिर पर चढ़ गया है। वो ऐसे मुख्यमंत्री बने हुए थे, जो स्वयं कोई जिम्मेदारी नहीं लेता, लेकिन सारे अधिकार उन्हें चाहिए होते थे। नियमों को तोड़ना जैसे केजरीवाल के लिए आम बात हो गई थी। इसका एक उदाहरण उनका सरकारी बंगला भी रहा, जिसे विपक्ष ने शीशमहल की संज्ञा दी। कभी बंगला और गाड़ी न लेने की घोषणा करने के बावजूद अपने लिए महलनुमा बंगला बनवा लेने ने भी जनता को केजरीवाल की साफ छवि के विषय में सोचने के लिए विवश किया।
भ्रष्टाचार का मुद्दा डुबा ले गया नैया
भ्रष्टाचार ऐसा मुद्दा रहा, जिसे लेकर केजरीवाल सबसे अधिक मुखर रहे हैं। जब वो इंडिया अगेंस्ट करप्शन को लेकर जनांदोलन चला रहे थे तो कांग्रेस के भ्रष्ट नेताओं की लिस्ट जारी करते थे, लेकिन एक समय ऐसा आया कि वो उन्हीं नेताओं के साथ मंच साझा करने लगे। बिना विचारधारा की पार्टी चला रहे केजरीवाल ने भ्रष्टाचार को लेकर कोई भी ठोस कदम नहीं उठाया। उनका बड़ा वादा लोकपाल नियुक्ति का था, जो तीन बार सत्ता में आने के बावजूद वादा ही रह गया। उल्टा शराब घोटाले में न केवल अरविंद केजरीवाल, बल्कि उनके सबसे करीबी मनीष सिसोदिया भी जेल में रहे। केजरीवाल के करीबी सत्येंद्र जैन को भी जेल जाना पड़ा। भ्रष्टाचार में जेल जाने ने अरविंद केजरीवाल की छवि को बहुत गहरा आघात पहुंचा।
वर्ष 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में केजरीवाल ने एक नीति अपनाई थी, वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा हमला करने से बचते थे। लोकसभा चुनाव में दिल्ली में भले अरविंद केजरीवाल को अकेले और बाद में कांग्रेस के साथ जाने के बावजूद कोई सफलता नहीं मिली, लेकिन उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा हमला नहीं बोला था। यह नीति कहीं न कहीं उनके लिए कारगर साबित हो रही थी, लेकिन इस बार विधानसभा चुनाव में उनका बड़बोलापन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमले उन्हें भारी पड़े। जनता को कहीं न कहीं यही लगा कि यह नेता काम कम करता है, लेकिन बोलता अधिक है।
कभी करीबी रही स्वाति मालीवाल प्रकरण ने भी केजरीवाल की छवि खराब की है। पूरे चुनाव में जिस तरह से स्वाति मालीवाल ने अरविंद केजरीवाल के खिलाफ अभियान चलाया, वो उनके लिए घातक साबित हुआ। दिल्ली में करारी हार के बाद और स्वयं की सीट हारने के बाद केजरीवाल के लिए आगे का रास्ता बेहद कठिन साबित होने वाला है। पहले ही एसीबी उनके दरवाजे पर खड़ी है। अब न केवल आम आदमी पार्टी पर टूट का खतरा रहेगा, बल्कि पंजाब में भी पार्टी को दो तिहाई बहुमत के बावजूद संघर्ष करना पड़ सकता है। कभी भ्रष्टाचार के खिलाफ झंडा बुलंद करने वाले केजरीवाल को भ्रष्टाचार ही ले डूबा है।
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