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खत्म नहीं हुआ है कोरोना से युद्ध, सावधान रहें और मोर्चे पर डटे रहें

Mon, 15 Mar 2021 10:36 AM IST
Arvind Kumar yadav अरविंद कुमार
Updated Mon, 15 Mar 2021 10:36 AM IST
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Coronavirus in India The last stop of the fight with Covid 19 that we all have to fight together
भारत में कोरोना वायरस शुरुआत में तेजी से फैला। - फोटो : PTI

कोरोना दबे पांव अपने पैर फिर पसार रहा है। महाराष्ट्र से आ रही खबरें देश के लिए चिंता का सबब बन रही हैं। रविवार के दिन ही 20 हजार से ज्यादा मामलों का सामने आना कई तरह के संकेत दे रहा है। हालांकि बीते साल की तुलना में एक ओर जहां हम इस महामारी के बारे में बहुत कुछ जानते हैं और इससे दो-दो हाथ करने के लिए हमारे पास वैक्सीन के रूप में हथियार मौजूद है, बावजूद इसके सावधानी बरतना जरूरी है।  

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एक समय तो भारत में रोज लगभग 1 लाख के करीब नए केस आ रहे थे और रोज़ाना मौतों का आंकड़ा भी 1000 को पार कर गया था। हालांकि अब रोज आ रहे केस और मौतों की संख्या में कुछ कमी देखी जा रही है लेकिन इस बीमारी का प्रकोप अब भी जारी है। 
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भारत में कोरोना की शुरुआत जब मार्च में हुई तो शायद हम सबने कभी सोचा भी नहीं होगा की आने वाले दिनों में इसका इतना भयंकर प्रभाव हमारे जन जीवन पर होगा। सरकार ने कोरोना से लड़ाई की शुरआत जनता कर्फ्यू लगा कर की जिससे आम लोग जागरूक हो और इस बीमारी को रोका जा सके और उसके बाद ही लॉकडाउन की घोषणा कर दी गई। शहर से ले कर गांव तक हर जगह हम सब सजग हो कर सावधानी से रहने लगे और मुश्किलों के होते हुए भी बहुत ही सावधानी से बताए गए नियमों का पालन करने लगे, हालांकि कोरोना के केस धीरे-धीरे बढ़ते रहे। 
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लॉकडाउन लगाने के कारण, जहां एक तरफ सारी आर्थिक गतिविधियां रुक गईं तो धीरे-धीरे उसका असर नौकरियों, उद्योग धंधों पर पढ़ने लगा, लेकिन तब भी सरकार ने लॉकडाउन को चरणों में बढ़ा कर कोरोना से लड़ने के लिए आधारभूत ढांचे को मजबूत किया, कोरोना के लिए खास अस्पताल बनाए गए, कोरोना टेस्टिंग के लिए लैब्स स्थापित किए गए और लोगों को जागरूक किया गया। 

लेकिन धीरे-धीरे जब आर्थिक गतिविधियों के रुकने से सरकार के सामने गिरती अर्थव्यवस्था और करोड़ों लोगों की आजीविका का सवाल खड़ा हो गया तो जान भी और जहान भी की बात करते हुए लॉकडाउन को चरणबद्ध तरीके से खोलना शुरू किया गया। जब 5 जून को  सरकार ने गाइडलाइन्स के साथ अनलॉक डाउन के पहले चरण की घोषणा की तो उस समय भारत में लगभग 2.5 लाख के करीब कोरोना के केस थे जबकि जब मार्च में जब जनता कर्फ्यू लगाया गया था तो पूरे भारत में सिर्फ 173 केस थे। लॉकडाउन के बाद की यह लड़ाई कोरोना के साथ साथ अर्थव्यवस्था और रोजगार की समस्या से भी थी। 

जहां एक तरफ सभी राज्य और केंद्र सरकारों ने इस बीमारी से लडने में पूरी जान झोंकी, वहीं दूसरी तरफ उन्हें जनता से भी भरपूर सहयोग मिल रहा था। मास्क लगाना, हाथ मुंह धोना, सामाजिक दूरी जैसे नियमों का लोगों ने बखूबी पालन किया। इसका परिणाम यह हुआ की भारत जैसे विविधताओं वाले देश ने जहा एक बड़ी आबादी गांव में रहती है, स्वस्थ सेवाओं का हाल भी कुछ खास नहीं है और अब तक एक बड़ी आबादी स्तरीय स्वास्थ सेवाओं से वंचित है, ने कोरोना की रफ्तार को काफी हद तक थाम लिया।

शहर के साथ साथ गांव गांव में लोग जागरूक हो कर सहयोग करने लगे, आए दिन खबर आती थी कि कोई शहर से लौटा तो उसको गांव के बाहर क्वारंटीन कर दिया तो कहीं किसी गांव में बाहरी लोगों के आने जाने पर भी मनाही हो गई। जमीनी स्तर पर हो रहे इन छोटे-छोटे प्रयासों से कोरोना को रोकने में बहुत मदद मिली और सरकार को पर्याप्त समय मिला की वो आधारभूत इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर सके। 

लेकिन अनलॉक डाउन के होने के साथ साथ धीरे धीरे हम सब में जिस तरह से मानसिक बदलाव आया, उसने अभी तक कि लड़ाई के अस्तितव पर ही एक प्रश्न खड़ा कर दिया। अब मास्क पहनना कोरोना से बचाव काम, चालान से बचने की वजह बनती जा रही है, सामाजिक दूरी की भी परवाह कम ही लोग कर रहे हैं।

अगर आप बाहर निकल जाएंगे किसी मार्केट में तो एक बार को भूल भी जाएंगे की हम सब अब भी कोरोना से लड़ रहे हैं जो की एक लाइलाज बीमारी है। जहां एक तरफ दुनियाभर के वैज्ञानिक और डॉक्टर मिल कर इसके वैक्सीन पर काम कर रहें हैं कि लाखों करोड़ों जिंदगियों को बचाया जा सके तो वही दूसरी तरह हम सब बेफिक्र हो कर उनके प्रयासों पर पानी फेर रहे हैं। 

Coronavirus in India The last stop of the fight with Covid 19 that we all have to fight together
कोरोना को लेकर लापरवाह भी हुए लोग। - फोटो : Pixabay

इसका जीता जगता उदहारण है दिल्ली, लॉकडाउन खुलने के साथ ही लोगों ने नियमों के प्रति एक बेफिक्री दिखाई और दीवाली के आस पास तो अति हो गई। जब दिल्ली के बाजारों में ऐसी भीड़ उमड़ी कि उसकी चर्चा विश्व भर में हुई और इसी का परिणाम है कि आज हम दिल्ली में कोरोना की तीसरी लहर के भयंकर रूप को देख रहें हैं।

एक दिन में कोरोना के नए केसों का आंकड़ा जहां 8000 से भी आगे निकल गया तो दूसरी तरफ एक दिन में सबसे ज्यादा 131 मौतों का आंकड़ा डराने लगा। एक हफ्ते से ज्यादा समय तक रोज 100 से ज्यादा लोग अपनी जान से हाथ धो रहे हैं और पिछले दो दिनों से मरने वालों की संख्या 90-100 के बीच में है।

जहां सरकार को अस्पतालों में कोरोना मरीजों के लिए बेड़ों की संख्या बढ़ाई जा रही है तो शमशान घाटों पर भी भारी भीड़ सी लग गई है और उनकी क्षमता भी बढ़ानी पर रही है, जिससे मरने वालों का जल्दी से जल्दी अंतिम संस्कार हो सके।    

यह बात हम सब को माननी होगी की कोरोना को रोकने में सरकारी व्यवस्थाएं हों, डॉक्टर्स हों या दवाइयां, यह सब तभी असरदार होंगी जब लोग जागरूक होंगे और सहयोग करेंगे। आप किसी भी विशेषज्ञ से पूछेंगे तो सबकी आम राय यही है कि जो सावधानियां हम अब तक बरतते आ रहे हैं वो कोरोना की वैक्सीन आने के कई साल बाद तक अपनानी पड़ेंगी। मास्क पहनना, सामाजिक दूरी बनाए रखना जितना लॉकडाउन लगाते समय उपयोगी और प्रभावकारी था, उससे कहीं ज्यादा जरूरी आज और आने वाले समय में होगा। 

यह कोरोना से लड़ाई का हमारा आखिरी पड़ाव है जहां हमें सबसे ज्यादा सावधानी बरतनी है, अगर जिंदगी की रोजमर्रा की मजबूरी की भाग-दौड़ है तो वह सुरक्षित रह कर करनी है। सामाजिक दूरी और मास्क लगाना हमारी चॉइस नहीं बल्कि आज के समय में हमारी जिंदगी को बचाने के लिए वैक्सीन से भी ज्यादा जरुरी कदम है।

सरकार और संस्थाएं अपना काम कर रही हैं, लेकिन जरुरी है की हम एक जिम्मेदार नागरिक की तरह मास्क लगा कर और सामाजिक दूरी रख कर खुद को नहीं अपने परिवार और आस पास के लोगों को इस बीमारी से बचाएं। खासतौर पर लड़ाई के इस मुकाम पर जब पैसे कमाने के लिए बाहर निकलना भी है और बीमारी से खुद को बचाना भी है। 

अगर हम समय पर भीड़ इकट्ठी करने या भीड़ में जाने से खुद को रोक सके तो शायद अस्पताल और शमशान में लगने वाली भीड़ से खुद को बचा लेंगे। फैसला हमें करना है कि क्या हमें सच में इस भीड़ का हिस्सा बनना है या खुद को और अपने परिजनों को बचाना है। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।


 

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