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अंबेडकर भक्ति की होड़ और सियासी लाभांश की कसौटी
सार
पीएम मोदी ने 14 अप्रैल 2016 को मुंबई में ‘मेरीटाइम इन्वेस्टमेंट समिट’ का उद्घाटन कहा था कि बाबासाहेब ने ही जल संसाधन, जल परिवहन और विद्युत से संबंधित दो महत्वपूर्ण संस्थाओं की नींव रखी थी। वे थीं – केंद्रीय जल, सिंचाई व जल परिवहन आयोग और सेंट्रल टेक्निकल पॉवर बोर्ड
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बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा (सांकेतिक तस्वीर)
- फोटो : एएनआई (फाइल)
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विस्तार
संविधान निर्माण में महती भूमिका निभाने वाले भारत रत्न डॉ. बाबा साहब अंबेडकर के अपमान और खुद को ज्यादा बड़ा अंबेडकर भक्त साबित करने की सियासी होड़ में यह सवाल मौजूं है कि क्या इससे सियासी पार्टियों को सच में कोई बड़ा और दीर्घकालीन राजनीतिक लाभांश मिल रहा है या मिल सकता है? या फिर मुद्दा भी वक्त के साथ नए और तात्कालिक मुद्दों की लहर में बह जाएगा? किसी भी मुद्दे के राजनीतिक लाभांश की असली कसौटी यही है कि वह सत्ता दिला सकने में कितना कारगर है।
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अंबेडकर का मुद्दा राजनीतिक शक्ति परीक्षण में कितना मददगार होगा, कहना अभी मुश्किल है। क्योंकि अंबेडकर को भगवान मानने वाले दलित समुदाय का मतदाता के रूप में व्यवहार चुनावों की प्रकृति के अनुसार अलग-अलग रहा है’ वह परिस्थिति व वक्ती तकाजों के हिसाब से बदलता भी रहा है। लेकिन उम्मीद सभी को है। भाजपा भी राज्यसभा में अमित शाह के बयान के बाद अंबेडकर के अपमान के प्रति विपक्ष के हमलावर होने के खतरों को भांप रही है और हर मंच पर कांग्रेस द्वारा अंबेडकर को अपमानित करने तथा उन्हें नेहरू से महान बताकर डेमेज कंट्रोल करने की पूरी कोशिश कर रही है।
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इसी के तहत सभी भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने अंबेडकर को महान बताने और कांग्रेस द्वारा उनके अपमान को लेकर पत्रकार वार्ताएं की। सबसे ज्यादा चर्चा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा बुंदेलखंड, जहां दलितों की संख्या काफी है, के खजुराहो में महत्वाकांक्षी केन-बेतवा लिंक परियोजना का शिलान्यास के दौरान किए गए खुलासे की रही। उन्होंने कहा कि देश में जलशक्ति के महत्व को सबसे पहले बाबा साहब ने ही पहचाना था।
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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस कथन में कितना तथ्य है, इस पर बहस हो सकती है। लेकिन एक पूर्व आईएएस अधिकारी व बी. आर. अंबेडकर विवि मुजफ्फरपुर बिहार के पूर्व कुलपति ए.के.बिस्वास ने ‘फारवर्ड प्रेस’ में लिखे एक लेख में बताया था कि भारत की जल संसाधन नीति की नींव बाबा साहब अंबेडकर ने ही रखी थी। डॉ. अंबेडकर 20 जुलाई 1942 से लेकर 29 जून 1946 तक तत्कालीन वाइसराय कार्यकारी परिषद् के श्रम सदस्य थे।
इस दौरान उन्होंने देश के जल संसाधनों का सभी के हित में समुचित दोहन करने हेतु एक नई जल व विद्युत नीति का खाका तैयार किया था। उनकी मान्यता थी कि इस सन्दर्भ में अमेरिका की टेनेसी वैली परियोजना भारत के लिए आदर्श हो सकती है। बाबा साहब का कहना था कि नदियों पर बहुउद्देशीय परियोजनाओं का निर्माण किया जाना चाहिए, जिससे सिंचाई और विद्युत उत्पादन दोनों हो सके। इस तरह की परियोजनाओं से अकाल और बाढ़ को रोका जा सकेगा और देश की गरीब जनता का जीवन स्तर सुधारने में मदद मिलेगी।
इसके पूर्व पीएम मोदी ने 14 अप्रैल 2016 को मुंबई में ‘मेरीटाइम इन्वेस्टमेंट समिट’ का उद्घाटन कहा था कि बाबासाहेब ने ही जल संसाधन, जल परिवहन और विद्युत से संबंधित दो महत्वपूर्ण संस्थाओं की नींव रखी थी। वे थीं – केंद्रीय जल, सिंचाई व जल परिवहन आयोग और सेंट्रल टेक्निकल पॉवर बोर्ड। डॉ. अंबेडकर भारत की जल संसाधन एवं नदी परिवहन नीति के निर्माता भी हैं। सन् 1944-46 की अवधि में तत्कालीन श्रम विभाग ने जिन नदी घाटी परियोजनाओं को लागू करने पर सक्रियता से विचार किया, उनमें शामिल थीं – दामोदर, सोन, महानदी (हीराकुंड), कोसी, चम्बल व दक्षिण की नदियों से संबंधित परियोजनाएं।
जाहिर है कि केन-बेतवा लिंक परियोजना के जरिए पीएम ने एक नया नरेटिव सेट करने की कोशिश की है, जो भाजपा द्वारा बाबा साहब के अपमान के आरोप के संदर्भ में दूरगामी कहा जा सकता है। भाजपा यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि कांग्रेस व विपक्षी दल कुछ भी आरोप लगाते रहें, हकीकत में बाबा साहब के सपनो को भाजपा और एनडीए ही साकार कर रहे हैं। हालांकि यह तर्क दलित समुदाय की अंबेडकर के प्रति अगाध आस्था को कितना संतुष्ट करेगा, कहना मुश्किल है।
अंबेडकर इस देश के महापुरूष हैं, इसमें दो राय नहीं। इसी के साथ वह महान समाज सुधारक और अर्थ तथा कानून विद भी थे। लेकिन पिछले दिनो राज्य सभा में ‘संविधान पर विशेष चर्चा’ पर बोलते हुएऋ केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने यह कहकर इस मुद्दे को नया और विवादित मोड़ दे दिया कि आप रात दिन अंबेडकर-अंबेडकर जपते हो। इतनी बार भगवान का नाम जपा होता तो स्वर्ग मिल जाता।
अति उत्साह में की गई इस टिप्पणी ने विपक्ष को नया सियासी हथियार दे दिया है। उसे लगता है कि इससे दलितों की भावनाएं आहत हुई हैं और इसी कारण दलित वोट भाजपा से छिटक सकता है, जो व्यापक हिंदू एकता के छाते में कुछ हद तक भाजपा के पास चला गया था। जबकि भाजपा अभी भी अपने इस आरोप पर कायम है कि कांग्रेस ने कभी भी बाबा साहब का सम्मान नहीं किया, उलटे उन्हें अपमानित ही किया। भाजपा के पलटवार से बहस एक नई दिशा में जाती दिख रही है कि क्या अंबेडकर का व्यक्तित्व और कृतित्व भगवान से बड़ा है या फिर भगवान अंबेडकर से बड़े हैं।
अंबेडकर भगवान से बड़े हों या नहीं, लेकिन इतना तय है कि दलित और दमित समाज के लिए वो भगवान के बराबर तो हैं ही। क्योंकि उन्होंने सदियों से शोषित इस समाज को सामाजिक समता और मुक्ति का रास्ता दिखाया। उन्हे मानवीय और संवैधानिक अधिकार दिलवाए। बहरहाल डॉ. अंबेडकर के मान अपमान पर केन्द्रित इस सियासी लड़ाई के दो मुख्य पात्र है। कांग्रेस और भाजपा तथा उनकी सहयोगी पार्टियां। दोनो ही एक दूसरे पर अंबेडकर के प्रति आदरभाव को लेकर कथनी और करनी में अंतर के आरोप लगा रहे हैं।
भाजपा का कहना है कि कांग्रेस ने केवल एक परिवार को उठाने के लिए अंबेडकर के योगदान को बार-बार नकारा तो कांग्रेस का कहना है कि भाजपा अंबेडकर का नाम भले जपती रहे, उसकी असल मंशा देश को हिंदू राष्ट्र बनाने की है, जो दलितों को कभी स्वीकार नहीं होगा। कांग्रेस ने ही दलितों को उनके अधिकार दिए हैं। कांग्रेस की इस उम्मीद का कारण पिछले लोकसभा चुनाव में दलित वोटों की कांग्रेस की तरफ वापसी है। हालांकि विधानसभा चुनाव में यही ट्रेंड नहीं दिखा।
गौरतलब, है कि 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में दलितों की आबादी 16.6 प्रतिशत यानी लगभग 20 करोड़ है। इसमें भी तीन चौथाई दलित गांवों में और एक चौथाई शहर में रहते हैं। कई राज्यों में दलितों के हाथ सत्ता की चाबी है। इसलिए भाजपा और कांग्रेस समेत सभी पार्टियां चाहती है कि दलितों का वोट उनके पक्ष में पड़े। यह बाबा साहब अंबेडकर के प्रति श्रद्धाभाव से ही संभव है। अगर लोकसभा ही बात करें तो कुल 543 सीटों में से दलितों के लिए 84 सीटें आरक्षित हैं।
2019 के लोस चुनाव में भाजपा ने 46 और कांग्रेस ने 6 सीटें जीती थीं। बाकी सीटें अन्य पार्टियों को मिली थीं। लेकिन 2024 में दलित वोट बैंक भाजपा से खिसक गया। भाजपा केवल 29 सीटें जीत पाई तो कांग्रेस की दलित आरक्षित सीटों की संख्या बढ़कर 20 यानी तिगुनी हो गईं। इसका परिणाम यह हुआ कि भाजपा अपने दम पर बहुमत से काफी पीछे रह गई।
कांग्रेस को उम्मीद है कि बाबा साहब अंबेडकर के अपमान का मुद्दा दलितों को बड़े पैमाने पर उद्वेलित कर सकता है और वो आने वाले समय में कांग्रेस और एनडीए के पक्ष में मतदान करेंगे। लेकिन इसमे पेंच यह है कि आज सार्वजनिक तौर पर इस देश में कोई भी पार्टी बाबा साहब के खिलाफ नहीं है। यानी महात्मा गांधी की तरह अब अंबेडकर भी देश में राजनीतिक और सामाजिक रूप से सर्वस्वीकार्य हैं। ऐसे में अंबेडकर भक्ति सभी मुद्दों पर हावी हो और सत्ता संघर्ष में निर्णायक बने, यह जरूरी नहीं है। अगर राजनीतिक लाभांश की कसौटी पर मुद्दे खरे नहीं उतरते तो राजनीति पार्टियां उन्हें दरकिनार करने में भी संकोच नहीं करतीं।
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