Budget 2020: मोदी सरकार का लोक मनभावन बजट? या सुधार के कड़े फैसले वाला बजट?
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भारतीय गणतंत्र, अपना 70वां साल, मोदी सरकार सातवां और दूसरी पारी के दूसरे बजट की प्रतीक्षा, भारत का जनमानस अनंत संभावनाओं, भविष्य की कल्पनाओं और आर्थिक आवष्यकताओं के बीच मंथन करता, फरवरी की प्रतीक्षा कर रहा है।
क्या यह 2020 का बजट 135 करोड़ की आबादी को मानवीय संसाधन का माध्यम बनाते हुए वैश्विक मंदी के दौर में भारत के आर्थिक परिदृश्य को रोजगार एवं चतुर्दिक विकास उन्मुख बना पाएगा? ऐसे ढेर सारे संशय प्रश्न बुद्धिजीवियों के मन में आगामी बजट को लेकर कौंध रहे हैं।
दावोस, स्वीट्जरलैण्ड में वर्ल्ड बैंक की अर्थशास्त्री सुश्री गीता गोपीनाथ और विश्व विख्यात एनजीओ ऑक्सफैन इण्डिया के भारत प्रमुख अमिताभ बेहरा जो स्वयं विख्यात अर्थशास्त्री हैं, भारत के बजट को लेकर तरह-तरह की शंकाओं-आशंकाओं और असीम संभावनाओं की चर्चा कर रहे हैं। तो दूसरी ओर खेत-खलिहान, गांव-गली-गलियारों में रहने वाले बजट विमर्श को लेकर चिंतित हैं।
ई-काॅमर्स के बढ़ते मकड़जाल से मुक्ति की चाह रखने वाला भारत का छोटा व मंझोला व्यापारी बेबाक ढंग से आने वाले बजट के प्रति अपनी अपेक्षाओं का समाधान बजट में देखने को आतुर है। तो किसान-मजदूर की छटपटाहट भी जगजाहिर है।
इन सब के बीच बजट अपने हलवा संस्कार के साथ आरंभ होकर अपनी तैयारी के निर्णायक दौर में पहुंच चुका है। चर्चा इस बात की है कि 2020 का बजट कैसा होगा ? क्या बजट प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दिशा की 5 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था की झांकी होगा?
प्रबंधन में ‘‘कैरेट और स्टिक’’ का सिद्धान्त है। अर्थात् छड़ी और प्रोत्साहन के बीच किस प्रकार समन्वय बने कि आर्थिक रूप से सम्पन्न भारत विश्व गुरु बन सके। अब तक नोटबंदी और जीएसटी की कसावट झेलता हुआ भारत का उद्योग व्यापार और व्यवसाय जगत मोदी सरकार से कुछ राहत की उम्मीद लगाना स्वाभाविक है।
अर्थव्यवस्था में गतिरोध व सुस्ती दूर करने के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता है कि आवश्यक वस्तुओं पर कर निर्धारण की सीमा कम करके राहतकारी दिखाई दे। ऐसी ही अपेक्षाएं आयकर के क्षेत्र में भी जनता के मन में परवान चढ़ रही हैं। विशेष रूप से टैक्स स्लैब में परिवर्तन व राहत का क्रम इस टैक्स स्लैब में विस्तार की भी अपेक्षा कर रहा है, जिससे स्लैब का दायरा बढ़ने से मध्य वर्ग के स्लैब पर टैक्स का मलहम लग सके।
यह भी समझना जरूरी है कि जनता के टैक्स का पैसा ही किसी भी देश के सपनों की आधार शिला होता है। जितना अधिक टैक्स आएगा, उतना ही अधिक खर्च मूलभूत ढांचे के निर्माण पर सरकार खर्च करने की स्थिति में होगी। मोदी सरकार का लक्ष्य 5 ट्रिलियन इकोनाॅमी का देश निर्माण का है। अतः बहुत अधिक रियायत की उम्मीद करना इस बड़े लक्ष्य को देखते हुए व्यवहारिक नहीं लगता।
अंततः देश को प्रतीकात्मक राष्ट्रवाद से आगे बढ़कर आर्थिक राष्ट्रवाद की ओर बढ़ना ही होगा। इसके लिए स्वदेशी चिंतन, स्वदेशी उत्पादन, स्वदेशी प्रबंधन की आवश्यकता है। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए देश सक्षम है। नेतृत्व सबल है, सशक्त और निर्णायक भी है। आवश्यकता केवल राष्ट्रीय संकल्प की है। जिसमें विकल्प के लिए कोई जगह नहीं है।
एक ओर ऑटो सेक्टर के क्षेत्र में जो उहापोह की स्थिति दिख रही है। उससे निपटना भी भारत सरकार के बजट 2020 के लिए बड़ी चुनौती है। एक ओर नए मोटर वेहिकल एक्ट के आने के बाद पैट्रोल, डीजल, एलपीजी, सीएनजी के क्षेत्र में बीएस-4 से बीएस-6 मानक की लंबी कूद है।
यह कैसे प्रभावी हो, यह सुनिश्चित करना और समय सीमा के भीतर करना अति आवश्यक है, क्योंकि देश में पेट्रोल पंप से लेकर रिफाइनरी तक अभी बीएस-4 अर्थात् यूरो-3 मानको के अन्र्तगत ही संचालित हैं। बढ़ते प्रदूषण के दौर में सरकार को देखना होगा कि कैसे हम इस कार्य को पूरा कर सकेंगे। उसकी आधारशिला रखना व बढे़ खर्च की व्यवस्था बेहद जरूरी है।
दूसरे सरकार को इस बजट के माध्यम से भविष्य के ईंधन विकल्प को लेकर भी स्पष्ट नीति की है। एक ओर हम इलेक्ट्रिकल लीथियम बैट्री के क्षेत्र में संभावनाण्ं तलाश रहे हैं। दूसरी ओर हाईब्रिड तकनीक का समानांतर विकास कार्यक्रम चल रहा है, वहीं नई ऊर्जा के स्त्रोत भी वाहन एवं बडे़ उद्योग मशीनरी संचालन के लिए तलाश रहे हैं। ऐसे में बहुविकल्पीय व्यवस्था के स्थान पर एकल संकल्पीय ईंधन व्यवस्था नीति की दरकार देश की अर्थव्यवस्था को बेहतर दिशा दे सकती है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।