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बेंगलुरु का लालबाग: जहां 32 लाख फूलों के बीच जीवंत हो उठे प्रकृति प्रेमी लेखक पूर्णचंद्र तेजस्वी

Mon, 19 Jan 2026 12:50 PM IST
Ajay Bokil अजय बोकिल
Updated Mon, 19 Jan 2026 12:50 PM IST
सार

  • बेंगलुरु के लालबाग बॉटनिकल गार्डन में आयोजित गणतंत्र दिवस पुष्प प्रदर्शनी इस बार कन्नड़ साहित्यकार पूर्णचंद्र तेजस्वी को समर्पित है।
  • फूलों के माध्यम से उनके बहुआयामी जीवन, प्रकृति प्रेम और नव्या साहित्य में उनके योगदान को अद्भुत कलात्मकता के साथ दर्शाया गया है, जिसके बारे में आपको भी जानना चाहिए।

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Bengaluru's Lalbagh Where nature-loving author Poornachandra Tejaswi came alive amidst 3.2 million flowers
2026 Lalbagh Republic - फोटो : Ajay Bokil

विस्तार

Bangalore Republic Day Flower Show: ऐसा विलक्षण दृश्य और समर्पित भाव किसी अहिंदीभाषी प्रदेश में ही शायद ही दिख सकता है। देश की ‘सिलीकान वैली’ कहे जाने वाले और कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु के विख्यात ‘लालबाग बॉटनिकल गार्डन’ में इन दिनों अनोखी ‘गणतंत्र दिवस पुष्प प्रदर्शनी’ चल रही है। इस प्रदर्शनी की खास बात न केवल वहां हजारों रंग बिरंगे फूलों का मुस्कुराना है, बल्कि  इस आयोजन का किसी कन्नड विभूति को समर्पित होना भी है। इस बार की थीम कन्नड़ के नव्या साहित्य (नया साहित्य) के पुरोधा, महान कन्नड लेखक कुवेम्पु  (ज्ञानपीठ विजेता केवी पुटप्पा) के सुपुत्र तथा बहुमुखी प्रतिभा के धनी कथा लेखक, कवि, उपन्यासकार, आलोचक, प्रकृति प्रेमी, पर्यावरणवादी, प्रकाशक, फिल्मकार, नाटककार, शिकारी, चित्रकार, फोटोग्राफर कुप्पली पुटप्पा पूर्णचंद्र तेजस्वी (जिन्हें संक्षेप में पूर्णचंद्र तेजस्वी कहा जाता है) के जीवन, विचार और बहुआयामी अवदान पर केन्द्रित है। 
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यह अद्भुत प्रदर्शनी लालबाग गार्डन के ऐतिहासिक ग्लास हाउस में चल रही है। इसमे चौतरफा खिले रंग बिरंगी फूलों और हरियाली के बीच तेजस्वी अपने रचनात्मक तेज के साथ कई कोणों से झांकते हैं। तेजस्वी की सृजनात्मकता, उनका प्रकृति प्रेम, उनका परिवार, उनका घर, उनकी जीवन शैली और फक्कड़पन को इतने सुंदर और कलात्मक ढंग से प्रदर्शित किया गया है कि जो तेजस्वी के बारे में  न जानता हो, वह भी उनके बारे में जानने पर विवश हो जाए। 
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इस ग्लास हाउस में कई जगह स्क्रीन पर तेजस्वी के पॉडकास्ट प्रसारित हो रहे हैं। तो कहीं उनके रचनात्मक अवदानों का विस्तृत विवरण है। कहीं तेजस्वी के विचारों का सारांश तो कहीं तेजस्वी के बारे में उनके  समकालीन प्रतिभाओं के विचार हैं। सबसे अद्भुत कलाकृति है तेजस्वी का अपने पिता और महान कन्नड साहित्यकार कुवेम्पु को स्कूटर पर पीछे बैठकर हवा से बातें करना। इसे  देखकर लगता है मानों ये दो दोनों विलक्षण बाप-बेटे एक अदद स्कूटर पर सवार होकर पर ही सृजन के आकाश की अनंत सीमाओं को लांघने निकले हों। 
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पूर्णचंद्र तेजस्वी को कन्नड़ साहित्य के नव्या साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षरों गिना जाता है।  कन्नड़ भाषा में नव्या साहित्य आंदोलन का काल 1950 से लेकर 1980 के दरमियान का माना जाता है। जब तत्कालीन युवा पीढ़ी का नेहरू के ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ के स्वप्न से मोहभंग होने लगा था और उसकी मुखर अभिव्यक्ति कन्नड साहित्य में होने लगी थी। तेजस्वी उसी धारा के चमकते नक्षत्र हैं। विचारधारा की दृष्टि से उन पर समाजवादी विचारों का असर था। शायद यही कारण है कि इस समूची प्रदर्शनी में हिंदी कहीं दिखाई नहीं देती, लेकिन हिंदी के बड़े पैरोकार डॉ. राम मनोहर लोहिया की प्रतिमा यहां लगी है। यहां कर्नाटक सरकार की नीति के अनुरूप सभी सूचनाएं और विवरण पहले कन्नड और फिर अंग्रेजी भाषा में हैं। 

कन्न्ड़ साहित्य में तेजस्वी का मुख्य योगदान प्रकृति और पर्यावरण के महत्व की प्रतिष्ठापना है। उन्होंने जीवों, वनस्पति, गांव और पर्यावरण को सरल और प्रभावी भाषा में अपने लेखन का मुख्य विषय बनाया। उनका प्रसिद्ध कथा संग्रह ‘लिंगा बंडा’ पश्चिमी घाट में होने वाली वर्षा को एक लड़कपन की निगाह से देखना है। कॉलेज शिक्षा के बाद तेजस्वी ने पैतृक गांव लौटकर खेती भी की। 

जब भी फुर्सत मिलती वो पश्चिमी घाटों की सैर किया करते थे। उन्होंने कथाओं के साथ, कई यात्रा वर्णन, विज्ञान उपन्यास, विज्ञान कथाएं, आलोचनाएं लिखीं। उनका प्रसिद्ध उपन्यास ‘कारवालो’ पश्चिमी घाट के घने जंगलों  में उड़ती छिपकली की खोज में स्वयं लेखक के शामिल होने की रोमांचक कथा है। उनका प्रसिद्ध कथा संग्रह ‘लिंगा बंडा’ पश्चिमी घाट में होने वाली वर्षा को एक लड़कपन की निगाह से देखना है। कॉलेज शिक्षा के बाद तेजस्वी ने पैतृक गांव लौटकर खेती भी की। जब भी फुर्सत मिलती वो पश्चिमी घाटों की सैर किया करते थे। 

उन्होंने कथाओं के साथ, कई यात्रा वर्णन, विज्ञान उपन्यास, विज्ञान कथाएं, आलोचनाएं लिखीं। उनका प्रसिद्ध उपन्यास ‘कारवालो’ पश्चिमी घाट के घने जंगलों  में उड़ती छिपकली की खोज में स्वयं लेखक के शामिल होने की रोमांचक कथा है। तेजस्वी ने कई प्रसिद्ध अंग्रेजी साहित्यकारों के लेखन का कन्नड में अनुवाद किया। तेजस्वी ने अपना पहला उपन्यास ‘काडु मट्टू क्रौर्या’ 24 साल की उम्र में लिखा था। तेजस्वी को उनके उपन्यास ‘चिदाबंरा रहस्या’ के लिए कन्नड़ साहित्य में असाधारण योगदान के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार, कर्नाटक साहित्य अकादमी पुरस्कार, कर्नाटक राज्य फिल्म अवार्ड आदि कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। 
    
तेजस्वी ने अपने ‘चिदंबरा रहस्या’ और कारवालो’ जैसे उपन्यासों में विज्ञान और दर्शन को ग्रामीण जीवन, सामाजिक मुद्दों और रोमांच के साथ मिलाकर एक आधुनिक, प्रकृति-केंद्रित शैली गढ़कर कन्नड साहित्य को समृद्ध किया। उन्हें उनकी सरल भाषा, पारिस्थितिकीय विषयों, वैज्ञानिक अंतर्दृष्टि, पर्यावरण जागरूकता को अपनी कथा कथन की नवीन शैली में समाहित किया। 

उन्होंने अपनी कहानियों में पश्चिमी घाट, वन्यजीवों, पक्षियों, कीड़ों) और पारिस्थितिकी विषयों को गहराई से एकीकृत किया, जिससे पर्यावरण चेतना को बढ़ावा मिला। उनके साहित्य में जटिल मानवीय और प्राकृतिक विश्वों का अन्वेषण है। इसी के साथ तेजस्वी ने समाज और मनोविज्ञान की जटिलताओं को गहनता से उजागर करने के लिए ग्रामीण परिवेश और प्रासंगिक पात्रों का उपयोग किया। 

उनके हर सृजन के केन्द्र में जीवन है। वे पर्यावरण विनाश के खतरे से समूची मानवता को आगाह करते हैं।  तेजस्वी ने कई प्रसिद्ध अंग्रेजी साहित्यकारों के लेखन का कन्नड में अनुवाद किया। तेजस्वी ने अपना पहला उपन्यास ‘काडु मट्टू क्रौर्या’ 24 साल की उम्र में लिखा था। तेजस्वी को उनके उपन्यास ‘चिदाबंरा रहस्या’ के लिए कर्नाटक साहित्य अकादमी पुरस्कार, कर्नाटक राज्य फिल्म अवार्ड आदि कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। 

 तेजस्वी रूढ़िवादिता के खिलाफ थे। उन्होंने अपनी महिला मित्र राजेश्वरी से जिस पद्धति से विवाह किया, वह अब ‘मंत्र मांगल्य पद्धति’ कहलाती है। इसमें वैवाहिक कर्मकांड को अत्यंत संक्षिप्त कर दिया गया है। कई कन्नड युवा इससे प्रेरित हुए हैं। वैसे लालबाग गार्डन और यहां साल में दो बार लगने वाली पुष्प प्रदर्शनी का भी अपना इतिहास है। 

लालबाग की स्थापना मैसूर के शासन हैदर अली ने 1760 में की थी, वो इसे कश्मीर के मुगल गार्डन की तर्ज पर विकसित करना चाहता था। उसकी मृत्यु के बाद उसके पुत्र मैसूर के शासक टीपू सुल्तान ने इस काम को आगे बढ़ाया। 1799 में टीपू की अंग्रेजों के हाथों हार के बाद लालबाग गार्डन का प्रबंधन अंग्रेजों के हाथ में आया और उन्होंने इसे पेशेवर ढंग से एक वानस्पतिक उद्यान के रूप में विकसित किया। 

1856 में इसे ‘गवर्नमेंट बाॅटनिकल गार्डन’ घोषित किया गया। देश विदेश से लोग इसे देखने और वनस्पति संग्रहण के लिए आते हैं। यह पूरा गार्डन 240 एकड़ में फैला है। यहां का एक और मुख्य आकर्षण है वो प्राचीन चट्टान जो वैज्ञानिकों के अनुसार तीन अरब साल पुरानी है। यहां पेड़ पौधों की 2100 से ज्यादा प्रजातियां हैं, जिनमें कई विदेशी भी हैं। 

गार्डन के जिस हिस्से में यह प्रदर्शनी लगी है, उस ‘ग्लास हाउस’ का निर्माण 1890 में हुआ। यहां सार्वजनिक पुष्प प्रदर्शनी की शुरुआत 1867 में हुई। 1912 से यह प्रदर्शनी नियमित रूप से आयोजित की जा रही है। इसके पीछे प्रेरणा इंग्लैंड की रॉयल हॉर्टिकल्चर सोसाइटी द्वारा वहां के चेल्सिया में होने वाले ‘ ग्रेट स्प्रिंग शो’ से ली गई थी। इसका आयोजन लालबाग बॉटनिकल गार्डन, कर्नाटक उद्यानिकी विभाग, मैसूर हॉर्टिकल्चर सोसाइटी एवं पूर्णचंद्र तेजस्वी फाउंडेशन ने संयुक्त रूप से किया है। 

गौरतलब है कि  1951 से इस प्रदर्शनी को साल में दो बार यानी गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित किया जाता है। पिछले कुछ वर्षों में इस प्रदर्शनी को केवल फूलों की नुमाइश से आगे जाकर एक सांस्कृतिक आयोजन में तब्दील कर दिया है ताकि लोग अपनी सांस्कृतिक परंपरा से भी खुद को जोड़ सकें। इसके तहत यह प्रदर्शनी किसी नामचीन कन्नड विभूति के जीवन और अवदान पर केन्द्रित होती है। पिछले वर्षों में यह प्रख्यात कन्नड फिल्म अभिनेता  डॉ.राजकुमार और बाद में उनके बहुआयामी प्रतिभा के धनी पुत्र पुनीत राजकुमार के जीवन पर केन्द्रित थी। 

अपने नायकों और अपनी भाषा के प्रति  कन्नड़ भाषियों के प्रेम और अपनत्व को इसी बात से समझा जा सकता है कि यह प्रदर्शनी टिकट लेकर देखनी होती है। वयस्कों के लिए इसका टिकट अस्सी रू. प्रति व्यक्ति,  छुट्टी के दिन सौ रुपये) और अवयस्को के लिए प्रति व्यक्ति 30 रू. है। बावजूद इसके लाखों लोग इसे देखने आते हैं। और वो भी पूरी तरह अनुशासित और समर्पित भाव से। पिछले साल हुई इस प्रदर्शनी को 14 लाख से ज्यादा लोगों ने देखा। 

बहरहाल, पुष्प प्रदर्शनियों का आयोजन तो कई शहरों में होता है। लेकिन उसे अपनी संस्कृति और अस्मिता से जोड़ देना तथा उस पर गर्व करना अनोखी और प्रशंसनीय बात है। और यह गर्व भी अत्यंत शालीन सुसंस्कृत और कलात्मकता के साथ करना इस प्रदर्शनी, उसके आयोजक और यहां के नागरिकों को दूसरों से अलग करता है। इस वक्त पूरा लालबाग गार्डन फूलों से सजा है।

एक अनुमान के मुताबिक पूरे गार्डन में करीब 32 लाख फूल खिले हैं, जिनमें 27 लाख फूल उन वनस्पतियों के हैं, जिन्हें लालबाग गार्डन में ही तैयार किया है। फूलों के साथ-साथ यहां विभिन्न किस्म के फलों और लोक कला की प्रदर्शनी भी है। एक प्रकृति प्रेमी लेखक के लिए इससे बेहतर आदरांजलि भला और क्या हो सकती है?   


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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