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आज भी दिलों में उतर जाती हैं बेगम अख्तर की दिलकश आवाज...सब अजनबी हैं यहां, किसको कौन पहचाने

Wed, 07 Oct 2020 01:23 PM IST
Atul sinha अतुल सिन्हा
Updated Wed, 07 Oct 2020 01:23 PM IST
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जब भी गजल, ठुमरी और दादरा की चर्चा होती है, बेगम अख्तर का नाम सबसे पहले जहन में आता है - फोटो : social media

ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया...

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जाने क्यूं आज तेरे नाम पे रोना आया...


बचपन में दूर से कहीं ये आवाज आती और मन मचल उठता...आवाज की ये कशिश कहीं भीतर तक उतर जाती... बेशक ये कलाम शकील बदायूंनी का हो लेकिन बेगम अख्तर ने इसे अपनी आवाज से एकदम अपना बना लिया...ऐसे तमाम शायरों के मतलों, शेरों और गजलों को बेगम साहिबा ने अपनी दिलकश और दर्द भरी आवाज से उस मुकाम तक पहुंचाया और अपनी गायिकी के हुस्न से इतना खूबसूरत बना दिया कि इन्हें लिखने वाले भी हैरत में आ गए।


आज की पीढ़ी के लिए बेशक बेगम अख्तर कुछ अजनबी सी हों, लेकिन संगीत के बदलते मिजाज और नई परिभाषा के बीच भी कुछ फिल्मकार ऐसे हैं जो बेगम अख्तर को किसी न किसी रूप में जीवंत कर देते हैं। विशाल भारद्वाज की फिल्म ‘डेढ़ इश्किया’को ही ले लीजिए।
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आज की पीढ़ी के ज़ुबान पर अगर ‘हमरी अटरिया पे आओ संवरिया, देखा देखी तनिक होई जाए’चढ़ जाता है, तो बेशक इसके लिए विशाल भारद्वाज बधाई के पात्र हैं। ये बेगम के बेहतरीन दादरा में से एक है।
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जब भी गजल, ठुमरी और दादरा की चर्चा होती है, बेगम अख्तर का नाम सबसे पहले जहन में आता है। 106 साल पहले 7 अक्तूबर 1914 को उत्तर प्रदेश के फैजाबाद में अख्तरी बाई ने एक कुलीन परिवार में जन्म लिया। मां-बाप ने बड़े प्यार से नाम रखा, ‘बिब्बी’।

बिब्बी को सात साल की नन्ही उम्र में संगीत से इश्क हुआ, जब उन्होंने थियेटर अभिनेत्री चंदा का गाना सुना। उस जमाने के मशहूर उस्ताद अता मुहम्मद खान, अब्दुल वाहिद खान और पटियाला घराने के उस्ताद झंडे खान से उन्हें शास्त्रीय संगीत की शिक्षा दिलाई गई। बिब्बी बहुत जल्द समान अधिकार से गजल, ठुमरी, टप्पा, दादरा और ख्याल गाने लगीं।

1930 तक आते-आते बिब्बी अख्तरी हो गई थीं। 15 की उम्र में उन्होंने मंच पर पहला कलाम पेश किया तो सामने बैठी मशहूर कवयित्री सरोजनी नायडू फिदा हो गईं और खुश होकर उन्हें एक साड़ी भेंट की। इस गजल के बोल थे,

तूने बूटे ए हरजाई कुछ ऐसी अदा पाई,

ताकता तेरी सूरत हरेक तमाशाई


कैफी आजमी भी अपनी गजलों को बेगम साहिबा की आवाज में सुनकर मंत्रमुग्ध हो जाते थे। 1974 में बेगम अख्तर ने अपने जन्मदिन के मौके पर कैफी आजमी की यह गजल गाई –

‘सुना करो मेरी जान, इनसे उनसे अफसाने,

सब अजनबी हैं यहां, किसको कौन पहचाने’


बाद में उन्हें ‘मल्लिका-ए-गजल’कहा जाने लगा। हिंदुस्तान में शास्त्रीय रागों पर आधारित गजल गायकी को ऊंचाइयों पर पहुंचाने का सेहरा अख्तरी बाई के सिर ही बंधना चाहिए। ‘दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे..’, ‘कोयलिया मत कर पुकार, करेजा लागे कटार..’, ‘ये न थी हमारी किस्मत, जो विसाल-ए-यार होता’, ‘ऐ मुहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया’ बेगम अख्तर की सबसे मशहूर गजलों में से हैं।

अख्तरी के पास सब कुछ था, लेकिन वह औरत की सबसे बड़ी कामयाबी एक सफल बीवी होने में मानती थीं...

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बेगम अख्तर की जिंदगी के अगर पन्ने पलटिए तो उसमें कई शेड्स मिलेंगे - फोटो : social media

बेगम अख्तर की जिंदगी के अगर पन्ने पलटिए तो उसमें कई शेड्स मिलेंगे। कुछ उदासीन, तकलीफों और अभावों से भरी। अपने दम पर मुकाम हासिल करने वाली बेगम की जिंदगी में एक दौर वह भी आया जब पैसे जुटाने के लिए उन्होंने जमीन पर बैठकर नात पढ़ा। हज पर मक्का जाने की उनकी जिद और मदीना पहुंच कर पैसे खत्म होने पर जमीन पर बैठकर उनका नात पढ़ना भी उनके किस्सों में से एक है।

हज से आने के बाद दो साल तक बेगम अख्तर ने शराब को हाथ नहीं लगाया,  मगर धीरे-धीरे फिर से पीना शुरू कर दिया। गजल हो, ठुमरी या फिर दादरा, सुरों की मल्लिका बेगम अख्तर को सुनना आज भी एक अलग दुनिया में ले जाता है।

अख्तरी के पास सब कुछ था, लेकिन वह औरत की सबसे बड़ी कामयाबी एक सफल बीवी होने में मानती थीं। इसी चाहत ने उनकी मुलाकात लखनऊ में बैरिस्टर इश्तियाक अहमद अब्बासी से कराई। यह मुलाकात जल्द निकाह में बदल गई और इसके साथ ही अख्तरी बाई, बेगम अख्तर हो गईं, लेकिन इसके बाद सामाजिक बंधनों की वजह से बेगम साहिबा को गाना छोड़ना पड़ा। 

दुनिया की इनायात ने उनका दिल तोड़ दिया। गायकी छोड़ना उनके लिए वैसा ही था, जैसे एक मछली का पानी के बिना रहना। वे करीब पांच साल तक नहीं गा सकीं और बीमार रहने लगीं। यही वह वक्त था जब संगीत के क्षेत्र में उनकी वापसी उनकी गिरती सेहत के लिए हितकर साबित हुई और 1949 में वह रिकॉर्डिंग स्टूडियो लौटीं। उन्होंने लखनऊ रेडियो स्टेशन में तीन गजल और एक दादरा गाया। 

इसके बाद उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े और उन्होंने संगीत गोष्ठियों और समारोहों का रुख कर लिया। यह सिलसिला दोबारा शुरू हुआ, तो फिर कभी नहीं रुका। उनके योगदान के लिए बेगम अख्तर को 1972 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1968 में पद्मश्री और 1975 में उन्हें मरणोपरांत पद्मभूषण से सम्मानित किया गया।

बेगम अख्तर को उनके जन्मदिन पर जिस तरह गूगल ने एक बेहतरीन डूडल बनाकर याद किया है और सम्मान बख्शा है, बेशक वह काबिले तारीफ है। गूगल के साथ साथ ट्विटर, फेसबुक और सोशल मीडिया के तमाम मंचों पर बेगम को याद किया जाना इस बात का सबूत है कि संगीत की दुनिया कितनी भी बदल जाए लेकिन हमारी मजबूत और सुरीली विरासत हर दौर में महफूज रहेगी।

बेगम ने बेशक कई जगह रहकर अपनी आवाज का जादू बिखेरा हो लेकिन उनका दिल हमेशा लखनऊ के लिए धड़कता रहता था। जब भी लखनऊ में संगीत घराने की बात की जाए तो सुरों की मलिका बेगम अख्तर का नाम लिए बिना यह जिक्र अधूरा है। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 

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