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वसंत ऋतु विशेष: बागों में छाया बावरा वसंत और मन में छा रहीं हरी-भरी स्मृतियां

Sat, 05 Feb 2022 02:20 PM IST
Swati sharma स्वाति शैवाल
Updated Sat, 05 Feb 2022 02:20 PM IST
सार

हम भारतवासी वाकई धन्य हैं जो हमने इसे विविधता से परिपूर्ण देश मे जन्म लिया है। यहाँ हर ऋतु एक उत्सव है, उल्लास है, नए के आने का और रचनात्मकता व सृजनात्मकता का। वसंत के आगमन और वसंत पंचमी के अवसर पर इस ऋतु का स्वागत करने की परंपरा भी इसी कड़ी का हिस्सा है।

जब प्रकृति अपना रंग बदल रही होती है, जब पौधों पर नई कोंपलें फूटकर निखर रही होती हैं और जब हवा में घुलने लगता है संगीत तो वसंत आत्मा तक महसूस होता है।

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बागों में छाया बावरा वसंत और मन में छा रहीं हरी-भरी स्मृतियां - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

स्वाति शैवाल

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वसंत इस बार तुम और भी बौराना,
अपने सारे बाण चलाना।
तुम आओगे तो इस बार,
केसर बिखरेगा आसमान तक।
सेवंती और भी इतरा जाएगी,
गुलाब थोड़े और गर्वीले हो जाएंगे।
तुम्हारी आहट पाकर,
नन्हीं सी कोपलें झट से निकल आएंगी बाहर।
जैसे कुल्फी वाले की आवाज़ सुनकर,
घरों से बाहर आ जाते हैं बच्चे। 
बीते वक्त ने बहुत पतझड़ बिछाए हैं,
तुम आओगे तो मलहम सा लगेगा।
तितलियों और चिड़ियों ने,
तुम्हारे लिए स्वागत गान भी तैयार किया है।
रोज होता है आजकल उसका अभ्यास,
उन्हें भी बेसब्री से है तुम्हारा इंतज़ार।
इस बरस तुम्हारा झूमकर आना,
और भी जरूरी है।
ताकि फूलते-फलते रहें,
पौधे, पानी, हवाएं और प्रेम। 


एक बहुत पुराने बंगाली गीत/कविता की पंक्तियां हैं-

"एमोन देष्टि कोथाओ खुजे पाबे नाको तुमि"
अर्थात् ऐसा देश तुम्हें कहीं खोजने पर भी नहीं मिलेगा।


हम भारतवासी वाकई धन्य हैं जो हमने इस विविधता से परिपूर्ण देश मे जन्म लिया है। यहां हर ऋतु एक उत्सव है, उल्लास है, नए के आने का और रचनात्मकता व सृजनात्मकता का। वसंत के आगमन और वसंत पंचमी के अवसर पर इस ऋतु का स्वागत करने की परंपरा भी इसी कड़ी का हिस्सा है।

जब प्रकृति अपना रंग बदल रही होती है, जब पौधों पर नई कोंपलें फूटकर निखर रही होती हैं और जब हवा में घुलने लगता है संगीत तो वसंत आत्मा तक महसूस होता है। कितना कुछ हमको सिखाती है प्रकृति, कितना कुछ हमको दे जाती है प्रकृति। बिना लाग-लपेट, बिना किसी पूर्वाग्रह के।

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हर बार मां की तरह हमारे अपराधों को क्षमा करते हुए। तो इस वसंत पंचमी यह प्रण लीजिये कि अपनी इस प्रकृति मां का संरक्षण भी आपकी नैतिक जिम्मेदारी होगी। ताकि आने वाली पीढियां इस उत्सव को उसी उल्लास के साथ मनाती रहें और प्रकृति से इंसान के प्रेम का नाता हमेशा जुड़ा रहे।
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वसंत, एक खुशनुमा याद है। हालांकि स्कूल के दिनों में इसके साथ जुड़ी होती थी परीक्षा के आने की आहट भी। हवा में ठंड और गर्मी दोनों, दिन में किताब खोलते ही सो जाने की इच्छा जो हिस्ट्री की क्लास में तमाम प्रोटोकॉल्स को भूलकर आंखों पर हावी होने की कोशिश करती थी और इतने में हमारी बेंच पर टन्न से बजती थी सिंह सर की चॉक। जो वहीं से मुस्कुराते हुए कहते- मेरी मुन्नी, मेरी गुड़िया। अभी सो जाओगी तो परीक्षा में लड्डू खाओगी।" वसंत की यह आहट आज भी हवा की परीक्षा वाली खुशबू को मन मे जिंदा रखे हुए है।
 

basant panchami 2022 know vasant ritu memories and life
बागों में छाया बावरा वसंत और मन में छा रहीं हरी-भरी स्मृतियां - फोटो : अमर उजाला

वसंत पंचमी के दिन स्कूल और घर दोनों जगह पर मां सरस्वती का पूजन होता। स्कूल में मिलता चने-चिरौंजी और गुड़ के लाई (परमल) वाले लड्डू का प्रसाद या तिल्ली-मूंगफली की चिक्की। साथ में होती सरस्वती वंदना जो अब भी याद है। घर आते ही मां थाली में परोसती गरम-गरम केसर भात। आज भी घर में ये परम्परा जारी है और उस भात की खुशबू यादों में बसी हुई है। 

बंगाली समुदाय में भी इस पर्व का खास महत्व होता है। इस दिन को सरस्वती पूजन के रूप में मनाया जाता है। कुछ साल पहले एक परिचित परिवार ने मुझे इस अवसर पर आमंत्रित किया था। पीले वस्त्रों के साथ मां सरस्वती की पूजन के अवसर पर आती धूप की खुशबू ने पूरे माहौल को पवित्र बना दिया।

लोग खुशी से एक दूसरे को बधाइयां दे रहे थे। पूजा के बाद मिली खिचुरी (दाल-चावल की खिचड़ी) और पायेश (खीर) का प्रसाद। बहुत सात्विक तरीके से खड़े मसालों से बनी इस खिचुरी और गोविंदभोग नामक चावल व गुड़ से बनी उस पायेश का स्वाद आज भी मन में ताजा है क्योंकि वह जुबान से उतरकर सीधे मन मे बस गया था।

बाद में पता चला कि वो सारा भोग पुरुषों ने मिलकर बनाया था और यह उनका हर सरस्वती पूजन का विधान था ताकि महिलाओं को भी एक दिन रसोई की जिम्मेदारी से निवृत्त होकर आनंद से उत्सव मनाने का मौका मिल सके। साथ ही पुरुषों को यह समझने का अवसर मिले कि महिलाएं किस प्रकार हर रोज रसोई में बिना शिकायत किये काम करती हैं।
 

बंगाली समाज में देवी पूजन सबसे अधिक महत्वपूर्ण अवसर होता है। इसी तरह कला और विद्या की देवी सरस्वती के प्रति आभार प्रकट करने के लिए भी वसंत पंचमी का त्योहार बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। 


कुछ साल पहले घर में सरस्वती पूजन का आयोजन था। यह मेरे बेटे के लिए पहला अवसर था माँ शारदा की पूजन का। हमने उसे प्रथम अक्षर लिखवाया और पुस्तकों व पेन के साथ ही पेड़-पौधों को भी प्रणाम करने को कहा। प्रश्न आना लाजमी था कि सरस्वती देवी तो विद्या की देवी हैं उनका पूजन और कॉपी-पेन को प्रणाम समझ आता है लेकिन ये पौधों और फूलों को प्रणाम क्यों?

जब उसको समझाया गया कि वसंत ऋतु का क्या अर्थ है और क्यों प्रकृति के प्रति हमारा सम्मान दर्शाना जरूरी है, तो उसने झट से कहा-"अच्छा मतलब आज फ्लॉवर्स और ट्रीज़ का भी बर्थडे है।" और उसकी इस बात ने बहुत बड़ा सन्देश दे दिया। चाहे जिस भी रूप में हो, प्रकृति का यह जन्मदिन प्रकृति के संरक्षण की भावना ऐसे परिपूर्ण होना चाहिए। नई पीढ़ी अगर इस तरह से भी प्रकृति से जुड़ी रहे तो यह एक सकारात्मक परम्परा होगी।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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