कुछ भूल तो नहीं रहे हैं?: हम याददाश्त खो रहे हैं या बस ज्यादा सोच रहे; दिमागी सेहत और बदलती आदतों पर बड़ा सवाल
बात करते-करते या कुछ लिखते-लिखते अचानक शब्द भूल जाना कोई बड़ा मामला हो या न हो, लेकिन यह एक पहेली जैसा तो लगता ही है।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
कई बार की-बोर्ड पर टाइप करते या माइक्रोफोन में बोलते हुए मैं अचानक अटक जाता हूं। जो बात मैं लिखने या कहने वाला होता हूं, वह जेहन से गायब हो जाती है। फिर चाहे मैं उसे कितना भी याद करने की कोशिश करूं, वह लौटकर नहीं आती। पहले मैं इसे सामान्य भूल-चूक मानकर नजरअंदाज कर देता था। पर अब कभी-कभी चिंता होने लगती है कि कहीं यह किसी गंभीर मानसिक समस्या का संकेत तो नहीं है। आजकल दिमागी सेहत की काफी चर्चा हो रही है। पत्र-पत्रिकाओं में कई लेख दिमाग की क्षमता बढ़ाने, याददाश्त मजबूत करने और मानसिक प्रदर्शन को बेहतर बनाने के उपाय बताते हैं। ऐसे टॉनिक, सप्लीमेंट और दवाओं के विज्ञापन भी बढ़ गए हैं, जो दिमाग को तेज बनाए रखने और सोचने-समझने की शक्ति को सुरक्षित रखने का दावा करते हैं।
द वाशिंगटन पोस्ट में पत्रकार एरियाना यूनजंग चा ने बताया कि 50 वर्ष से अधिक उम्र का हर पांच में से एक व्यक्ति याददाश्त, ध्यान और एकाग्रता को बेहतर बनाने के लिए विटामिन या सप्लीमेंट का सेवन करता है। मेरी सहयोगी डाना जी स्मिथ ने छह ऐसी दवाओं की पड़ताल की, जिनसे डिमेंशिया का खतरा कम हो सकता है। फिर, उन्होंने एक दूसरी रिपोर्ट में चार ऐसी दवाओं का विश्लेषण किया, जिनसे यह खतरा बढ़ सकता है।
मस्तिष्क स्वास्थ्य के विशेषज्ञ दावा कर रहे हैं कि सही खान-पान, नियमित व्यायाम और मानसिक सक्रियता के जरिये बौद्धिक क्षमता को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। हालांकि, दिमागी खेल मानसिक क्षमता को बनाए रखने और बढ़ाने में मदद कर सकते हैं। अखबार में छपी शब्द-पहेली हल करके मैं भी अपने दिमाग को और अधिक सक्रिय बना रहा हूं।
अपने शरीर के लगभग हर हिस्से को बेहतर बनाने की कोशिश के बाद अब लोग दिमागी सेहत पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। लेकिन एक तरफ हम अपनी मानसिक ऊर्जा और सोचने-समझने की क्षमता बचाने की बात करते हैं, दूसरी तरफ अपने कई बौद्धिक काम एआई व डिजिटल प्रणालियों को सौंपते जा रहे हैं। मैं चैटबॉट या डिजिटल सहायक पर जरूरत से ज्यादा निर्भर होने से बचता हूं। मुझे याददाश्त बढ़ाने वाली दवाओं पर भी भरोसा नहीं है। फिर भी मैं समझ नहीं पाता कि यह बेचैनी मेरे आसपास बदलती दुनिया का असर है या फिर उम्र के साथ हो रहे बदलावों का परिणाम! उम्मीद है कि मैं इसका हल ढूंढ लूंगा, पर फिलहाल तो यह पहेली है।