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बिरसा मुंडा पुण्यतिथि विशेष: 25 साल का क्रांतिकारी और ऐतिहासिक जीवन

Tue, 09 Jun 2020 12:17 PM IST
Ajay Khemariya अजय खेमरिया
Updated Tue, 09 Jun 2020 12:17 PM IST
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adivasi leader birsa munda death anniversary life history in hindi
बिरसा की आवाज को ब्रिटिश हुकूमत दबा नहीं सकी। - फोटो : Social Media

आज बिरसा मुंडा की पुण्यतिथि है। सामंती राजव्यवस्था के विरुद्ध स्वराज की बलिदानी उद्घोषणा करने वाली ऐसी वनवासी आवाज जिसे गोरी हुकूमत अपने अथाह सैन्य बल से कभी झुका न सकी। जिन महान उद्देश्यों को लेकर इस हुतात्मा ने प्राणोत्सर्ग किया, वनवासी समाज मे राष्ट्रीय चेतना की स्थापना की।

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क्या उस चेतना और बलिदान के जरिये दिखाए गए मार्ग पर हमारी अपनी राजव्यवस्था वंचितों के लिए चलने का नैतिक साहस दिखा पाई है?बिरसा मुंडा के बलिदान दिवस की रस्मी कवायद के बीच ध्यान रखना होगा कि 9 जून 1900 को बिरसा मुंडा की शहादत होती है और 1908 में छोटा नागपुर टेनक्सी एक्ट लागू कर अंग्रेजी हुकूमत ने उन बुनियादी मुद्दों के राजकीय निराकरण की पहल की जिनको लेकर बिरसा ने ब्रिटिश महारानी तक को परेशान कर दिया था।लेकिन आजादी के बाद क्या हमारी हुकूमत ने ऐसी ततपरता वनवासियों के मुद्दों पर दिखाई है?
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पांंचवी,छठवीं अनुसूची के प्रावधानों पर 70 साल में कितना अमल हुआ है क्या इस सवाल का सार्वजनिक जबाब हुकूमतों को जारी नही करना चाहिए? बिरसा की शहादत के आठ  साल बाद जब गोरी सरकार कानून बना सकती है तो  56 साल क्यों लगे आजाद भारत में  वनाधिकार कानून के अस्तित्व में आने को?
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इस कानून के अमल में देश की सभी सरकारों  और न्यायपालिका ने जो ढिठाई और बेशर्मी का आचरण किया है उसने साबित कर दिया है की आज भी हमारी राज और समाज व्यवस्था वनवासियों के मामले में दोयम मानसिकता से ऊपर नही उठ सकी है।2011 की जनसंख्या कहती है कि 104281034 वनवासी भारत में है।
 

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बिरसा की शहादत को देश आज भी याद करता है। - फोटो : @rashtrapatibhvn

नीति आयोग के आंकड़े खुद कहते है कि करीब 60 फीसदी वनवासी शिक्षा,स्वास्थ्य, आवास,जैसी मूलभूत आवश्यकताओं से वंचित है।जिस साहूकारी, जमीदारी,और फारेस्ट एक्ट के विरुद्ध बिरसा मुंडा ने"उलगुलान"महाविद्रोह का नेतृत्व किया था वे तीनों बुनियादी मुद्दे आज भी वनवासियों के सामने खड़े है।

अंग्रेजी राज में वनवासियों की जमीन गैर वनवासी के खरीदने पर रोक का कानून बना लेकिन आज मप्र,छतीसगढ़, महाराष्ट्र यूपी,में लागू अलग अलग भू-राजस्व सहिंताएंं कलेक्टरों को यह अधिकार देती है कि वे अपने विवेक से ऐसी अनुमतियां जारी कर सकते है।

नतीजतन जिन भूमिहीनों को विनोबा भावे के भूदान यज्ञ में पट्टे जारी किए गए अथवा जिन्हें सरकारों ने पट्टे दिए वे अधिकांश दबंगों के पास कलेक्टरों की सांठगांठ से पहुँच गईं। देश में अनेक ऐसे क्षेत्र है जहां वनवासी आबादी पांचवी अनुसूची के दायरे में आनी चाहिए लेकिन संविधान में प्रावधान के बाबजूद इसका दायरा मप्र,गुजरात, तेलंगाना, महाराष्ट्र,हिमाचल,ओड़िसा,राजस्थान, आंध्रप्रदेश, झारखंड, छतीसगढ़ तक ही सीमित है।

संविधान अपेक्षा करता है कि सरकार हर दस वर्ष में अनुसूचित क्षेत्र एवं अनुसूचित जनजाति आयोग(एसएएसटी) का गठन करे लेकिन अभी तक केवल दो ही आयोग बनाये गए और उनकी सिफारिश कहाँ है? ये कभी किसी सियासी विमर्श का हिस्सा नही बन सकी है।

 

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बिरसा मुंडा का जीवन क्रांतिकारी और योद्धा का जीवन था। - फोटो : ट्विटर

भारत में कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य,रोजगार, आतंकवाद , अल्पसंख्यक,सामाजिक न्याय,भ्रष्टाचार जैसे तमाम विषयों पर राष्ट्रीय, क्षेत्रीय नीतियां बनती रही हैंं लेकिन वनवासी नीति क्यों नहींं बनाई गई है?इसे वोट बैंक के नजरिए से भी समझना चाहिए क्योंकि वनवासी करीब 20 राज्यों में भौगोलिक रूप से बिखरे हैंं और उनमें पिछड़ेपन के साथ विविधता बहुत है। वनवासियों की एकीकृत वोट अपील पिछड़ों, दलित, अल्पसंख्यक जैसी नही है। सिवाय झारखंड को छोड़कर।

बिरसा की जन्मभूमि झारखंड के गठन की विधिवत् घोषणा करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इस नए राज्य को बिरसा को समर्पित करने की बात कही थी। लेकिन 20 साल के झारखंड में 15 साल वनवासी सीएम रहने के बाबजूद न जल जंगल जमीन के मसले निराकृत हुए हैैं न ही सरकारों की ऐसी प्रतिबद्धता नजर आई जो देशभर में एक नजीर के रूप में स्थापित होती। रांची औऱ इसके आसपास जिलों के हजारों वनवासियों के साथ बिरसा नारा लगाते थे।

"तुन्दू जाना ओरो अबूझा राज एते जाना"
(ब्रिटिश महारानी का राज ख़त्म हो हमारा राज स्थापित हो).

प्रख्यात लेखिका महाश्वेता देवी ने अपने उपन्यास"जंगल के दावेदार"में जो प्रमाणिक वर्णन बिरसा मुंडा औऱ उनकी राष्ट्रीय प्रतिबद्धता का किया है वह आज के इस पिछड़े वनवासी समाज की तत्कालीन चेतना के उच्चतम स्तर को भी स्वयंसिद्ध करता है।

बिरसा न केवल महान राष्ट्रभक्त योद्धा थे बल्कि वे ईसाई साम्राज्यवाद के भी सख्त विरोधी थे। बचपन में जर्मन मिशनरी स्कूल ने उन्हें बिरसा डेविड नाम देकर मतांतरित किया लेकिन वे जल्द ही वैष्णव मत में लौट आए।

उन्होंने महज 25 साल जीवन गुजारा, लेकिन अपने विभूतिकल्प व्यक्तित्व के चलते वे वनांचल में भगवान के रूप में आज पूजे जा रहे है। यह  एक तथ्य है कि बिरसा को भारतीय लोकजीवन में पाठ्यक्रम में कभी यथोचित स्थान नही दिया गया है।

आताताई मुगलों की सदाशयता पढ़ते हमारे विद्यार्थी बिरसा को भगवान बनाने वाली प्रमाणिक घटनाओं से वंचित क्या सिर्फ वनवासी होने की वजह से है? इन सवालों का जवाब भी आज ईमानदारी से खोजने की आवश्यकता है।

सीएए, कश्मीर,पाकिस्तान,चीन,जैसे मामलों पर दिन रात प्रलाप करने वाले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और उसके विषय विशेषज्ञ कभी वनवासियों के मुद्दों पर बहस करते नहींं देखे जाते हैंं।

दिल्ली और देशभर में तमाम जगह जल,जंगल,जमीन के मुद्दों पर धरने प्रदर्शन होते हैंं लेकिन शाहीन बाग, जामिया,जैसा कवरेज किसी को इसलिए नहींं मिलता क्योंकि ये सतही चुनावी फायदे का विषय नहींं है।

पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने 12 लाख के वनवासियों को उनके घरों से बेदखल करने का आदेश दिया जो वनाधिकार कानून में सुरसा की तरह बनी सरकारी प्रक्रिया में  खुद को वन भूमि पर काबिज नहींं बता पाए।

हालांंकि कोर्ट ने बाद में इस पर स्थगन दे दिया लेकिन राष्ट्रीय विमर्श में यह मुद्दा जगह नहींं बना पाया। केंद्र और राज्यों के स्तर पर इस कानून के क्रियान्वयन की ईमानदारी का नमूना यह है कि 42.2 लाख वनाधिकार पट्टे आवेदन में से 19.4 लाख आवेदन विभिन्न राज्यों में निरस्त कर दिये गए है।

पांचवी सूची में शामिल प्रत्येक राज्य में राज्यपाल की अध्यक्षता में एक निगरानी समिति है जिसकी बैठक कागजों में कर ली जाती है। वनवासी कल्याण के महकमें केंद्र राज्यों में अलग-अलग है लेकिन इनके मामले पंचायत,वन,वित्त, राजस्व,गृह-विभागों के बीच बुरी तरह उलझे रहते हैंं। जाहिर है वनवासी विषय पर भारत में आज भी समेकित नीति और प्रतिबद्धता का इंतजार कर रही है बिरसा की शहादत।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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