{"_id":"5a108e604f1c1b9f678bc2ce","slug":"rani-lakmi-baii","type":"story","status":"publish","title_hn":"रानी का मायका है मुरली मनोहर मंदिर","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
रानी का मायका है मुरली मनोहर मंदिर
jhansi
Updated Sun, 19 Nov 2017 01:17 AM IST
विज्ञापन
प्रशासन
- फोटो : demo pic
शहर का प्रसिद्ध मुरली मनोहर मंदिर रानी लक्ष्मीबाई का मायका भी कहलाता है। वीरांगना के पिता मोरोपंत तांबे मनु और राजा गंगाधर राव के विवाह के बाद काफी समय यहां रहे। महारानी अक्सर अपने पिता से मिलने और भगवान मुरली मनोहर की पूजा करने के लिए यहां आती थीं। मंदिर को मराठा शासन ने राजकीय सेवाएं भी दी थीं।
प्रमुख प्राचीन मंदिरों में एक मुरली मनोहर मंदिर का निर्माण मराठा शासन के प्रारंभिक काल में हुआ था। महल नुमा इस मंदिर के गर्भगृह में भगवान कृष्ण और राधा के अलावा रुकमणि की भी प्रतिमा विराजमान है। खास बात है कि इस मंदिर का गुंबद नहीं है। मंदिर के पंडित वसंत विष्णु गोलवलकर ने बताया कि मंदिर को रानी का मायका कहने का कारण उनके पिता मोरोपंत तांबे का यहां रहना है। वह मंदिर के ऊपरी हिस्से के एक बडे़ कक्ष में रहते थे। यह कक्ष अब जीर्णशीर्ण हो चुका है। मंदिर के शुरूआती दौर में सिर्फ राज परिवार के सदस्यों को ही प्रवेश की अनुमति थी। लेकिन, बाद में यह आम जनता के लिए खोल दिया गया। रानी अक्सर अपने पिता से मिलने और भगवान के दर्शन को यहां आती थी। बाद में मोरोपंत तांबे किले में ही रहने लगे थे।
प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में मंदिर में अंग्रेज सैनिकों ने लूटपाट भी की थी। झांसी के इतिहास के जानकार मुकुंद महरोत्रा ने बताया कि वर्ष 1942 में मोरोपंत तांबे को रानी लक्ष्मीबाई के विवाह के समय मंदिर में ठहराया गया था। मुरली मनोहर मंदिर से रानी महल के लिए उस समय गुप्त रास्ता भी था।
विज्ञापन
आज जन्मी थीं मणिकर्णिका
रानी लक्ष्मीबाई का विवाह से पहले नाम मर्णिकर्णिका था। उनका जन्म 19 नवंबर 1835 को हुआ था। वाराणसी में जन्म के बाद उनकी मां भागीरथी बाई का निधन हो गया था। पिता मोरोपंत तांबे मणिकर्णिका को लेकर बिठूर चले गए थे। बिठूर में उन्होंने नाना साहब और तात्या टोपे के साथ शस्त्र चलाना और युद्ध की कला सीखी। बचपन की मनु झांसी के राजा गंगाधर राव से विवाह के बाद महारानी लक्ष्मीबाई कहलाने लगीं।
विज्ञापन
प्रमुख प्राचीन मंदिरों में एक मुरली मनोहर मंदिर का निर्माण मराठा शासन के प्रारंभिक काल में हुआ था। महल नुमा इस मंदिर के गर्भगृह में भगवान कृष्ण और राधा के अलावा रुकमणि की भी प्रतिमा विराजमान है। खास बात है कि इस मंदिर का गुंबद नहीं है। मंदिर के पंडित वसंत विष्णु गोलवलकर ने बताया कि मंदिर को रानी का मायका कहने का कारण उनके पिता मोरोपंत तांबे का यहां रहना है। वह मंदिर के ऊपरी हिस्से के एक बडे़ कक्ष में रहते थे। यह कक्ष अब जीर्णशीर्ण हो चुका है। मंदिर के शुरूआती दौर में सिर्फ राज परिवार के सदस्यों को ही प्रवेश की अनुमति थी। लेकिन, बाद में यह आम जनता के लिए खोल दिया गया। रानी अक्सर अपने पिता से मिलने और भगवान के दर्शन को यहां आती थी। बाद में मोरोपंत तांबे किले में ही रहने लगे थे।
विज्ञापन
प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में मंदिर में अंग्रेज सैनिकों ने लूटपाट भी की थी। झांसी के इतिहास के जानकार मुकुंद महरोत्रा ने बताया कि वर्ष 1942 में मोरोपंत तांबे को रानी लक्ष्मीबाई के विवाह के समय मंदिर में ठहराया गया था। मुरली मनोहर मंदिर से रानी महल के लिए उस समय गुप्त रास्ता भी था।
विज्ञापन
आज जन्मी थीं मणिकर्णिका
रानी लक्ष्मीबाई का विवाह से पहले नाम मर्णिकर्णिका था। उनका जन्म 19 नवंबर 1835 को हुआ था। वाराणसी में जन्म के बाद उनकी मां भागीरथी बाई का निधन हो गया था। पिता मोरोपंत तांबे मणिकर्णिका को लेकर बिठूर चले गए थे। बिठूर में उन्होंने नाना साहब और तात्या टोपे के साथ शस्त्र चलाना और युद्ध की कला सीखी। बचपन की मनु झांसी के राजा गंगाधर राव से विवाह के बाद महारानी लक्ष्मीबाई कहलाने लगीं।