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नए साल में इस तरह करें म्यूचुअल फंड में निवेश

Sat, 15 Dec 2012 11:04 AM IST
नई दिल्ली/कारोबार डेस्क
नई दिल्ली/कारोबार डेस्क Updated Sat, 15 Dec 2012 11:04 AM IST
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mutual fund invest in new year

1 जनवरी, 2013 से जो निवेशक सीधे फंड हाउस से स्कीम खरीदेंगे, उन्हें कम खर्च करना होगा और यह डायरेक्ट प्लान कहा जाएगा। इसके अलावा, जो निवेशक डिस्ट्रिब्यूटर से स्कीम लेंगे, वह नॉर्मल प्लॉन होगा। नॉर्मल प्लॉन के अंतर्गत निवेशक को फंड के एसेट साइज के हिसाब से कमीशन के रूप में अतिरिक्त खर्च करना होगा। यह डिस्ट्रिब्यूशन कॉस्ट होगी।

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वर्तमान में जो निवेशक सीधे फंड हाउस से ऑनलाइन स्कीम खरीदते हैं, उन पर कंपनियों को किसी तरह का डिस्ट्रिब्यूशन खर्च उठाना नहीं पड़ता है लेकिन फंड हाउस यह फायदा निवेशकों को नहीं देते हैं। लेकिन, अब ऐसे निवेशक डॉयरेक्ट प्लान के जरिये यह लाभ उठा सकेंगे, जो उनकी बढ़ी हुई एनएवी में दिखाई देगा।
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हालांकि, इस स्थिति में एक ही प्लॉन की दो अलग-अलग एनएवी होंगी। जिसमें लागत नहीं लगेगी, उसकी एनएवी अधिक होगी। 1 अक्टूबर से सेबी म्यूचुअल फंड स्कीम से संबधित नियमों में कुछ बदलाव करने जा रहा है। नए नियमों से कहीं म्यूचुअल फंड्स की मिससेलिंग तो शुरू नहीं हो जाएगी? इन नियमों का निवेशकों पर क्या असर होगा?
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सेबी ने 1 अक्टूबर से म्यूचुअल फंड स्कीम में फ्लेक्सिबल एक्सपेंस रेशो लागू करने की घोषणा की है। अभी कुल एक्सपेंस रेशो 2.25 फीसदी है। उसमें से 1 फीसदी की सब-सीलिंग मैनेजमेंट चार्ज के लिए और बाकी रकम ऑपरेटिंग खर्चों के लिए रखी जाती है, लेकिन अब फंड हाउस अपने हिसाब से इस सीलिंग को घटो-बढ़ा सकते हैं।

इधर फंड हाउसेज को पहले ही अपने एक्सपेंस रेशो 30 बेसिस पॉइंट बढ़ाने की अनुमति दी जा चुकी है। ऐसे में फ्लेक्सिबल एक्सपेंस रेशो कहीं एक बार फिर इंडस्ट्री में मिससेलिंग (धोखे से पॉलिसी बेचना) को बढ़ावा तो नहीं देने लगेंगे।

डिस्ट्रिब्यूटर्स को म्यूचुअल फंड स्कीम बेचने की एवज में मिलने वाला 2.25 फीसदी का कमिशन जब इंडस्ट्री को मिससेलिंग की तरफ ले जाने लगा, तो निवेशकों के हित में सेबी की तरफ से एंट्री लोड को ही हटा दिया गया। इसके बाद जब डिस्ट्रिब्यूटर्स को स्कीम बेचने की एवज में कोई फायदा नहीं दिखा तो उन्होंने अपने हाथ खींच लिए और इंडस्ट्री का बुरा दौर शुरू हो गया।

इस मुश्किल से तारने के लिए सेबी ने फंड हाउसों को फ्लेक्सिबल एक्सपेंस रेशो, निवेशक से एक्सपेंस रेशो के रूप में 30 बेसिस पॉइंट (3 फीसदी) लेने की अनुमति और डायरेक्ट व नॉर्मल प्लान जैसे तुरुप के पत्ते प्रदान किए तो इंडस्ट्री में गहमागहमी शुरू हो गई और डिस्ट्रिब्यूटर्स का रुझान एक बार फिर दिखाई देने लगा।

मुश्किलें हो सकती हैं
सभी फंड हाउसों का खर्च अलग-अलग होगा। वे डिस्ट्रिब्यूशन, ऑपरेटिंग व कमिशन में कितना खर्च करते हैं, यह उनका अपना फैसला होगा। ऐसे में क्या वापस मिससेलिंग का दौर शुरू नहीं हो जाएगा?

आईफास्ट फाइनैंशल इंडिया के एमडी राजेश कृष्णमूर्ति कहते हैं, 'आपको क्लोज-अप भी 50 रुपये में मिल रहा है और पेप्सोडेंट भी 50 रुपये में लेकिन दोनों का एक्सपेंस अलग-अलग है। एक का 17 रुपये है और दूसरे का 15 रुपये। यह कंपनी का अंदरूनी मामला है। बस ठीक ऐसे ही निवेशक की एनएवी पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा, भले ही कंपनी अंदर कैसे भी खर्च करे।

अब कौन सा फंड हाउस अपना खर्च कम करता है या मैनेजमेंट चार्ज बढ़ाता है, यह उसका फैसला होगा। ऐसे में हो सकता है कि वे स्कीमें ज्यादा बिकने लगें, जिनसे डिस्ट्रिब्यूटर्स को ज्यादा फायदा मिल रहा हो इसलिए बेहतर है कि निवेशक स्कीम के रिटर्न पर ध्यान दें। वे देखें कि एक्सपेंस का एनएवी पर क्या प्रभाव हो रहा है।'

एग्जिट लोड का फायदा
सेबी ने यह भी कहा है कि कंपनियां एग्जिट लोड के रूप में जिस रकम को अन्य मदों में खर्च कर देती थीं, उसे अब 1 अक्टूबर से उन्हें उसी स्कीम में लगाकर फायदा निवेशकों को देना होगा। प्रिमेरिका म्यूचुअल फंड के एमडी विजय मंत्री कहते हैं, 'अब वे निवेशक फायदे में रहेंगे जो लंबी अवधि के लिए निवेश करते हैं। मार्केट को देखकर घबराहट में अपनी स्कीम बीच में ही छोड़ घाटा उठाने वाले निवेशकों पर रोक लगेगी और सेंटिमेंट्स में भी सुधार होगा।

एग्जिट लोड में चार्जिंग बैक का फरमान निवेशकों को काफी फायदा देगा, क्योंकि पहले फंड हाउस स्कीम बीच में छोड़ कर जाने वाले निवेशकों से जो लोड लेते थे, उसे अपनी अन्य स्कीमों व अन्य मदों पर खर्च करने की उन्हें छूट थी लेकिन अब यह जरूरी कर दिया गया है कि जिस स्कीम से एग्जिट लोड आया है, उस पैसे को फंड हाउस वापस उसी स्कीम में निवेश करे ताकि जो निवेशक उस स्कीम में बने हुए हैं, उन्हें फायदा हो सके। ऐसे में निवेशकों को एक स्कीम में बने रहने का फायदा मिल सकेगा।'

डायरेक्ट व नॉर्मल प्लान की पहेली
जनवरी 2013 से जो निवेशक सीधे फंड हाउस से स्कीम लेंगे, उन्हें कम खर्च करना पड़ेगा। इसे डायरेक्ट प्लान कहा जाएगा और जो निवेशक डिस्ट्रिब्यूटर से स्कीम लेंगे, उन्हें फंड के असेट साइज के हिसाब से कमिशन के रूप में अतिरिक्त खर्च करना होगा जो कि डिस्ट्रिब्यूशन कॉस्ट होगी। उसे नॉर्मल प्लान कहा जाएगा।

आईफास्ट फाइनैंशल इंडिया के एमडी राजेश कृष्णमूर्ति कहते हैं, 'अभी जो 12 से 15 फीसदी निवेशक सीधे फंड हाउस से ऑनलाइन स्कीम खरीदते हैं, उन पर कंपनियों को किसी तरह का डिस्ट्रिब्यूशन खर्च वहन नहीं करना पड़ता है लेकिन वे यह फायदा निवेशकों को देते ही नहीं है। लेकिन अब ऐसे निवेशक डायरेक्ट प्लान में आकर यह फायदा ले सकेंगे, जो उनकी बढ़ी हुई एनएवी में दिखाई देगा। हां, तब एक ही प्लान की दो अलग-अलग एनएवी होंगी। जिसमें कॉस्ट नहीं लगेगी, उसकी एनएवी ज्यादा होगी।'


निवेशक रिटर्न देखता है, कॉस्ट नहीं
रिलायंस एमएफ के सीईओ संदीप सिक्का कहते हैं, 'अगर सही सलाह के लिए 50-60 पैसे की कॉस्ट देनी पड़ती है और अच्छा रिटर्न मिलता है तो निवेशक ऐसे रूट को ही प्राथमिकता देंगे। आम निवेशक एक्सपेंस चार्ज, लोड और कुछ बेसिस पॉइंट बचाने की जुगत में नहीं रहता, बल्कि उसे तो निवेश का सही व भरोसेमंद तरीका चाहिए, ताकि उसे रिटर्न मिले।'

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