भारतीय समुद्री सीमा में है दुर्लभ धातुओं का भारी भंडार- डॉ. सुनील कुमार सिंह
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निकेल, कोबाल्ट और तांबा जैसे कीमती और भारत में कम उपलब्धता वाले धातुओं के आयात पर निर्भरता को घटा कर उसका यहीं उत्पादन किया जा सकता है। इन धातुओं की उपलब्धता भले ही देश के खदानों में ज्यादा नहीं हो, लेकिन ये भारतीय समुद्री सीमा के दायरे में ही समुद्र तल पर पर्याप्त मात्रा में विद्यमान हैं।
इस बात की पुख्ता जानकारी भारतीय समुद्र विज्ञानियों ने दी है। यही नहीं, समुद्र विज्ञानियों ने समुद्र तल में गैस हाइड्रेट की उपस्थिति का भी पता लगाया है, जिससे जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता को कम किया जा सकता है।
इन्हीं मसलों पर शिशिर चौरसिया ने सीएसआईआर-भारतीय समुद्र विज्ञान संस्थान (एनआईओ), गोवा के निदेशक प्रोफेसर डॉ. सुनील कुमार सिंह से विस्तृत बातचीत की। पेश है इस बातचीत के मुख्य अंश :
प्रश्न- समुद्र तल में कीमती और दुर्लभ धातुओं के भंडार छिपे होने की बात हम किस्से कहानियों में सुनते रहे हैं। इस बात में कितनी सच्चाई है?
उत्तर- एक समुद्र विज्ञानी होने के नाते मैं यह कह सकता हूं कि हम किस्से-कहानियों में जो समुद्र तल में दुर्लभ चीजें छुपी होने की बातें सुनते रहेे हैं, वह काफी हद तक सच साबित हो रही हैं। मैं सिर्फ भारतीय समुद्र विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा संपादित सफल अभियानों के आधार पर आपसे कह रहा हूं कि भारतीय समुद्र सीमा के दायरे में ही समुद्र तल पर निकेल, कोबाल्ट, कॉपर, मैगनीज, लीथियम आदि का अपार भंडार है।
आर्थिक शब्दावली में कहेें, तो भारत के स्पेशल इकनॉमिक जोन (एसईजेड) में समुद्र तल से लेकर 5,000 मीटर तक की गहराई में न सिर्फ उक्त उल्लिखित धातुएं, बल्कि गैस हाइड्रेट और अन्य धातुओं के पिंड मौजूद हैं। इन धातुओं के पिंड को वैज्ञानिक पॉली मेटालिक नोडुल्स कहते हैं। इन्हें पॉली मेटालिक नोडुल्स इसलिए कहते हैं, क्योंकि जब इन्हें संसाधित किया गया, तो इनमें एक से अधिक धातुओं की उपस्थिति पाई गई।
प्रश्न- आपने निकेल, कोबाल्ट और तांबा जैसी धातुओं का जिक्र किया है, जिनमें निकेल और कोबाल्ट तो भारत में हैं ही नहीं। तो क्या यहां इसका खनन हो सकता है?
उत्तर- बिल्कुल सही कहा आपने। भारत में निकेल नहीं के बराबर है कोबाल्ट तो है ही नहीं। पूरी दुनिया में देखें, तो निकेल का भंडार 7.1 करोड़ टन का है, जबकि कोबाल्ट का भंडार 66 लाख टन का ही है। ऐसे में समुद्र तल से इन खनिजों की उपस्थिति का पता चलना वास्तव में हमारे लिए सुकूनदेह बात है।
जहां तक आपने इसके खनन हो सकने की बात पूछी है, तो ऐसा हो सकता है। इसमें कोई रोक नहीं है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक अनुमान के मुताबिक, समुद्र तल में जितने दुर्लभ धातु हैं, उसे यदि हर साल 15 लाख टन भी निकाला जाए तो यह 20 वर्षों तक चलेगा। यह करीब 20 अरब डॉलर के बराबर है।
प्रश्न- जब इसका खनन हो सकता है, तो हम करते क्यों नही हैं?
उत्तर- विश्व के कई देश इस दिशा में काम कर रहे हैं और वर्ष 2019 से इसका वाणिज्यिक खनन करने की कई देशों की योजना है। आपने पूछा कि हम ऐसा क्यों नहीं करते तो मैं बताना चाहूंगा कि हमारे पास विशेषज्ञता व सूचनाएं हैं, लेकिन हम खुद ऐसा नहीं कर सकते।
इसके लिए किसी और को ही आगे आना होगा। या तो सरकार या सरकारी एजेंसी खुद ऐसा करे या फिर किसी को अधिकृत कर ऐसा करा सकती है। एनआईओ कोई खनन कंपनी नहीं है जो इस काम को करे।
प्रश्न- ऊर्जा जगत में इन दिनों गैस हाइड्रेट की काफी चर्चा हो रही है। इस दिशा में क्या संभावना है?
उत्तर- आप जिसकी चर्चा करते है, वैज्ञानिक उसे मिथेन गैस हाइड्रेट कहते हैं। यह समुद्र तल से 200-300 मीटर नीचे पाया जाता है। यह करीब-करीब समुद्र तल ही माना जाएगा। इसे बर्निंग आई भी कहा जाता है, जो क्रिस्टलाइज्ड सॉलिड होता है और इसमें वाटर मॉलिकुल के पिंजड़े में मिथेन गैस बंद रहता है।
इसमें दिक्कत यह है कि जैसे ही गैस हाइड्रेट समुद्र तल पर आता है, उससे गैस निकलने लगता है। इसलिए इसे निकालने के लिए एक सिस्टम चाहिए। जैसे ही गैस वाटर मॉलिकुल केज से फ्री हो, उसे फ्रीज कर दिया जाए। ऐसी तकनीक दुनिया भर में उपलब्ध है। इस समय जिस तरह से कच्चे तेल का उत्पादन गिर रहा है और इसकी कीमत पर दुनिया भर में राजनीति हो रही है, ऐसे में गैस हाइड्रेट जीवाश्म ईंधन का बेहतर विकल्प बन कर उभर सकता है।
प्रश्न- गैस हाइड्रेट को निकालने की दिशा में क्या काम चल रहा है?
उत्तर- जी हां! इसके लिए सरकार ने नेशनल गैस हाइड्रेट प्रोग्राम बनाया है। हम मान कर चल रहे हैं कि वर्ष 2018-19 में इसका पायलट परीक्षण हो सकता है। उसी समय पता चलेगा कि इसका सतत उत्पादन कैसे हो सकता है, साथ ही इसे निकालने में कितनी लागत आएगी या यह लाभप्रद है या नहीं।
यह वाणिज्यिक रूप से संभव है या नहीं। इन सब सवालों का जवाब तब मिल जाएगा। इस दिशा में दुनिया के अन्य देशों में भी कुछ खास नहीं हुआ है। कनाडा और जापान ने इस दिशा में कुछ काम शुरू किया था, पर उन्होंने भी महज सात दिनों में ही इसे बंद कर दिया। लेकिन भारत इस दिशा में आगे बढ़ रहा है।